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उत्तर प्रदेश की नई सरकार के लिए कृषि ऋण माफी की चुनौतियां

दिल्ली डायरी
एके भट्टाचार्य /  03 20, 2017

चुनाव में प्रचंड जीत के साथ ही मतदाताओं की उम्मीदों पर खरा उतरने और चुनावी वादों को पूरा करने की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है। हम उत्तर प्रदेश का जिक्र कर रहे हैं जहां भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 403 सदस्यों वाली विधानसभा में तीन-चौथाई से भी अधिक सीटों पर जीत दर्ज की है। ऐसे में स्वाभाविक है कि उत्तर प्रदेश की नई सरकार को भी इस बड़ी जिम्मेदारी का गंभीरता से अहसास होगा। ऐसे में सवाल यह है कि नई सरकार के सामने सबसे बड़ी आर्थिक चुनौतियां क्या होंगी?
भाजपा ने अपने घोषणापत्र में किसानों के सभी कृषि ऋण माफ करने का जो वादा किया है, वह इस सरकार की सबसे बड़ी चुनौती होगी। इससे भी बुरी बात यह है कि भाजपा ने किसानों को शून्य ब्याज दर पर कृषि ऋण देने की भी बात कही है। उत्तर प्रदेश में किसानों पर बकाया कर्ज के बारे में नवीनतम आंकड़े तो उपलब्ध नहीं हैं लेकिन दो साल पहले यह आंकड़ा करीब 75,000 करोड़ रुपये का था। इनमें से 8,000 करोड़ रुपये का कर्ज राज्य सहकारी बैंकों ने दिया हुआ था जबकि बाकी कर्ज ग्रामीण बैंकों और वाणिज्यिक बैंकों ने जारी किया था। 
चुनौती केवल यह नहीं है कि राज्य सरकार कितने बड़े आकार वाले कृषि ऋण को माफ करेगी, बल्कि यह भी है कि भाजपा सरकार अपने लुभावने वादे पूरा करने के लिए कौन सा तरीका अपनाएगी? किसानों का कर्ज माफ किए जाने का सबसे ज्यादा असर किस पर पड़ेगा? इतना तो तय है कि इसका बोझ वाणिज्यिक बैंक, सहकारी या ग्रामीण बैंक पर नहीं पड़ेगा। ऐसे में लगता है कि नई सरकार को अपने कार्यकाल की शुरुआत में ही सरकारी खजाने पर बड़ा आर्थिक बोझ डालना होगा।
निस्संदेह इस कदम का उत्तर प्रदेश की पहले से ही खस्ताहाल आर्थिक स्थिति पर और भी बुरा प्रभाव पड़ेगा। राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) के अनुपात में राजकोषीय घाटा वर्ष 2013-14 में 2.7 फीसदी रहा था जो 2014-15 में बढ़कर 3.4 फीसदी पर पहुंच गया था। वर्ष 2015-16 में तो राजकोषीय घाटा जीएसडीपी के 5.85 फीसदी तक पहुंच गया। चालू वित्त वर्ष में इस घाटे को चार फीसदी तक सीमित रखने की बात कही गई थी लेकिन चुनावी साल होने के कारण विभिन्न योजनाओं और सरकारी कर्मचारियों के वेतन में हुई बढ़ोतरी पर खर्च बढऩे से यह लक्ष्य हासिल कर पाने की उम्मीदें कम ही हैं।
हालांकि कुछ लोग उत्तर प्रदेश के देश की तीसरी बड़ी राज्य अर्थव्यवस्था होने के चलते हालात बेकाबू न होने की उम्मीद जताते हैं लेकिन उन्हें यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि यह देश के सबसे निम्न विकास दर वाले राज्यों की श्रेणी में शामिल है। देश के केवल छह राज्यों की ही विकास दर उत्तर प्रदेश से कम है। इसकी प्रति व्यक्ति आय भी राष्ट्रीय स्तर की करीब आधी है। इसके अलावा करीब 30 फीसदी गरीबों की आबादी के साथ उत्तर प्रदेश बीसवें पायदान पर खिसका हुआ है। देश के सकल घरेलू उत्पाद में उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी महज सात फीसदी है जबकि देश की आबादी में उसका हिस्सा 17 फीसदी है। ये आंकड़े उत्तर प्रदेश के निवासियों की हालत सुधारने की जरूरत को रेखांकित करते हैं। इनसे यह भी पता चलता है कि किसानों के मौजूदा कर्ज माफ करने और आगे चलकर शून्य दर पर कर्ज देने से स्थिति कितनी खौफनाक हो सकती है।
इस तरह की स्थिति में सवाल यह खड़ा होता है कि राज्य की नई सरकार आखिर क्या कर सकती है? राजनीतिक नजरिये से देखें तो किसी चुनावी वादे को पूरी तरह नजरअंदाज कर पाना व्यावहारिक नहीं कहा जा सकता है। उसी के साथ यह भी सच है कि नई सरकार को किसानों का कर्ज माफ करने से खजाने पर पडऩे वाले दुष्प्रभावों को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसी स्थिति में एक विकल्प तो यह है कि कर्ज माफी वादे को इस तरह पूरा किए जाए कि राज्य की वित्तीय स्थिति पर शुरुआत में कम-से-कम बोझ पड़े और उसके असर को झेलने के लिए लंबी समय सीमा रखी जाए। दूसरा विकल्प यह है कि शून्य ब्याज दर पर दिए जाने वाले कृषि ऋण के पैमानों को नए सिरे से परिभाषित किया जाए। ऐसा करने से इस तरह का कर्ज ले सकने वाले लोगों की संख्या को सीमित किया जा सकेगा और सरकारी कोष पर पडऩे वाले प्रतिकूल असर को भी कम किया जा सकेगा।
उत्तर प्रदेश की नई सरकार के सामने एक और विकल्प यह हो सकता है कि वह किसानों का कर्ज माफ करने के बजाय अपना ध्यान चुनाव के दौरान किए गए कुछ खास वादों को पूरा करने पर लगाए। राज्य के हरेक घर में शौचालय बनवाना, सभी लोगों को 24 घंटे बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित करना, हरेक घर को गैस कनेक्शन देना और हरेक गांव तक बस चलवाने के वादों को पूरा करने पर सरकार ध्यान केंद्रित कर सकती है। अगर सरकार इन चारों वादों को पूरा करने की दिशा में जल्द काम शुरू कर देती है तो वह भाजपा के लिए फायदेमंद होने के साथ ही राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए भी मुफीद रहेगा। दरअसल सरकारी कार्यों में तेजी आने से उत्तर प्रदेश में निवेश को प्रोत्साहन मिलेगा, आधारभूत ढांचा मजबूत बनेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी सशक्त हो सकेगी। इसी तरह हरेक गांव तक बस चलवाने के लिए बड़े पैमाने पर अच्छी सड़कों की जरूरत होगी जबकि हरेक घर में शौचालय बनने से न केवल साफ-सफाई बेहतर होगी बल्कि स्वास्थ्य में भी सुधार आएगा।
निश्चित रूप से इन वादों को पूरा करने के लिए राज्य सरकार को अधिक आर्थिक संसाधन जुटाने पड़ेंगे। लेकिन इन परियोजनाओं पर खर्च करना किसानों का कर्ज माफ करने से कहीं अधिक परिणामदायक साबित होगा। कर्ज माफी से तो नया कर्ज देने और कर्ज की वसूली की समूची व्यवस्था पर गहरा असर पडऩे की आशंका है।

Keyword: UP, BJP, Agri loan,
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