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निर्वाचन आयोग की निगरानी में रहती है ईवीएम: वी एस संपत

रंजीता गणेशन /  03 19, 2017

बीएस बातचीत

हालिया विधानसभा चुनावों में पराजय के बाद बहुजन समाज पार्टी और आम आदमी पार्टी ने आरोप लगाया है कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) से छेड़छाड़ की गई है। उनका यह भी कहना था कि दोबारा मतदान पत्रों पर चुनाव कराए जाएं। पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त वी एस संपत ने इस बारे में रंजीता गणेशन से बात की। पेश हैं संपादित अंश:

ईवीएम मशीनों से छेड़छाड़ के आरोपों में बारे में आपका क्या कहना है?
ईवीएम का इस्तेमाल करते काफी वक्त बीत चुका है। उनके साथ किसी तरह की छेड़छाड़ इसलिए नहीं हो सकती है क्योंकि यह मशीन किसी और मशीन से जुड़ी नहीं होती। उसका कोई नेटवर्क नहीं होता। इसके अलावा चुनाव प्रक्रिया के दौरान वह जितनी सुरक्षा में रखी जाती है उसकी बदौलत भी छेड़छाड़ मुश्किल है। वर्ष 2010 में या उसके आसपास अमेरिका के एक प्रोफेसर ने हरि प्रसाद नामक एक व्यक्ति के साथ मिलकर एक मशीन चुराई और उसमें ब्लूटूथ उपकरण लगा दिया। इसके बाद उन्होंने टेलीविजन पर दिखाया कि कैसे मोबाइल फोन से संकेत भेजकर उसके नतीजे बदले जा सकते हैं।

हमने उनको और पूरे देश को यह बताया कि चुनाव में इस्तेमाल होने वाली मशीन को कोई हाथ नहीं लगा सकता। कोई भी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण यदि किसी व्यक्ति के हाथ लग जाए तो उससे छेड़छाड़ संभव है लेकिन जहां तक हमारे यहां इस्तेमाल होने वाली ईवीएम की बात है वे पूरी तरह निर्वाचन आयोग के कब्जे में रहती है। अगर कोई उसे चुरा भी ले तो वह वापस चुनाव प्रक्रिया में शामिल नहीं हो पाएगी। उस स्थिति में भी मशीन के डिस्प्ले को ही छेड़ा जा सकता है डाटा को नहीं। वह एक मशीन थी। आखिर ऐसी कितनी मशीनें चुरा कर चुनाव परिणाम को प्रभावित किया जा सकता है?

निर्वाचन आयोग क्या उपाय अपनाता है?
सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की गई है। वर्ष 2010 तक चुनावी मौसम के अलावा मशीनों की सशस्त्र सुरक्षा नहीं की जाती थी लेकिन अब उस वक्त भी सशस्त्र बल उनकी सुरक्षा करते हैं। कई तरह की जांच की जाती है और सील लगाई जाती है। ईवीएम कंपनियों के तकनीकी जानकार आते हैं और पुराने डाटा को साफ कर जाते हैं। यह सारा काम राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में किया जाता है। उसके बाद वे उन प्रतिनिधियों से उसकी जांच करने को कहते हैं। मशीन और उसे रखने की जगह दोनों को सील बंद कर दिया जाता है। जिस समय मशीन में प्रत्याशी का नाम डाला जाता है उस वक्त प्रत्याशी के प्रतिनिधि वहां मौजूद रहते हैं। इसके बाद मशीनों को अलग-अलग मतदान केंद्रों पर ले जाया जाता है।

मतदान की शुरुआत के 30 मिनट पहले राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में एक बार फिर छद्म मतदान करके मशीनों को जांचा जाता है। इसके बाद यह पूरा आंकड़ा मिटाकर मशीनों को दोबारा सील कर मतदान के लिए तैयार कर दिया जाता है। मतदान के बाद मशीन के बटन साील कर दिए जाते हैं। मतगणना स्थल पर ईवीएम ले जाते वक्त भी सील की जांच की जाती है। अगर वह टूटी हो तो उस मशीन की गिनती नहीं की जाती।

अपने कार्यकाल में क्या आपको कभी ऐसा लगा  कि मशीन की सील टूटी है या कोई गड़बड़ है?
स्टोर रूम सील रहते हैं और वहां सीसीटीवी कैमरे लगे रहते हैं ताकि उनकी दिन रात निगरानी की जा सके। इस बात की बहुत कम संभावना है कि जानबूझकर की गई गड़बड़ी सामने आए। उदाहरण के लिए मशीन को पहाड़ी इलाकों में लाते ले जाते वक्त सील टूट सकती है।

ईवीएम ने चुनाव प्रक्रिया को कैसे बदला है? क्या मतपत्र की तुलना में सुरक्षित बनाया है?
पहले मतदान अधिकारी डरते थे इसलिए ऐसी घटनाओं की रिपोर्टिंग ही नहीं होती थी। ऐसे में बाहुबल वाले प्रत्याशी चुनाव जीत जाते थे। ईवीएम में अगर मतदान केंद्र पर कोई नहीं है तो भी अगर आप मशीन में वोट डालेंगे तो उसकी तेज आवाज 100 गज दूर से सुनी जा सकती है। इतना ही नहीं हर वोट डालने में एक निश्चित समय लगता है इसलिए 10 मिनट में 500 वोट डालने जैसा काम भी नहीं हो सकता। ऐसे में बूथ लूटने या थोक में मतदान करने जैसी घटना नहीं हो सकती।

ऐसी शिकायत आने पर आयोग किस तरह की कार्रवाई करता है?
हर चरण पर कई सुरक्षा उपाय अपनाए जाते हैं इसलिए ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि आज किसी बात की जांच हो और तत्काल एक प्रमाणपपत्र जारी कर दिया जाए। भंडारण, निर्वाचन क्षेत्र में ले जाए जाने, मतदान और मतगणना कार्यालय के स्तर पर तमाम सुरक्षा उपाय सुनिश्चित किए जाते हैं। इसके बाद ही प्रमाणपत्र जारी होता है। अगर कोई एक चुनाव किसी की उम्मीदों के मुताबिक नहीं गया तो इसका यह मतलब नहीं है कि ईवीएम में गड़बड़ी है।

Keyword: विधानसभा चुनाव, ईवीएम, मतदान, वीएस संपत, टेलीविजन, मोबाइल फोन, निर्वाचन आयोग,
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