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शहरी व्यवस्था के चुनिंदा मानकों पर देश के शहरों का प्रदर्शन

मुद्रा मंत्र
सुबीर रॉय /  March 19, 2017

देश की शहरी व्यवस्था से जुड़े चौथे सालाना सर्वेक्षण (2016) के निष्कर्ष पिछली रिपोर्टों से मिलते जुलते लेकिन काफी जानकारीपरक हैं। ये सर्वेक्षण बेंगलूरु के संस्थान जनाग्रह द्वारा कराए जाते हैं। उनकी मदद से यह समझा जा सकता है कि हमारे प्रमुख शहर किस दिशा में जा रहे हैं। क्या प्रमुख भारतीय शहरों (21 शहरों का सर्वेक्षण कर उनकी लंदन और न्यूयॉर्क से तुलना की गई) के पास अपने आप में बेहतरी लाने की क्षमता है, क्या उनके पास ऐसी योजनाएं हैं?
क्या आपके शहर में विकेंद्रीकृत स्थानिक विकास योजना है? इस प्रश्न के उत्तर में 21 में से 18 शहरों का प्रदर्शन बहुत खराब रहा। एक से 10 के मानक पर उन्हें 3-4 अंक मिले। जबकि इस मानक पर लंदन और न्यूयॉर्क को 9.8 अंक मिले। ऐसा इसलिए है क्योंकि कमोबेश किसी भी शहर में स्थानिक विकास योजनाओं के क्रियान्वयन की क्षमता ही नहीं है।
बिना किसी खास योजना के क्या किसी शहर के पास इतना फंड होता है कि वह सार्वजनिक सेवाओं और बुनियादी ढांचे में निवेश कर सके? अहमदाबाद, मुंबई, सूरत, रांची और दिल्ली ने इस मानक पर 4-5 अंक हासिल किए। जबकि बेंगलूरु, भोपाल, देहरादून, लुधियाना और रायपुर को दो से भी कम अंक मिले। ये अंक कई कारकों पर आधारित हैं। एक तो यही कि उसके अपने संसाधन कुल व्यय का कितना हिस्सा हो सकते हैं। इस मानक पर हैदराबाद 7.7 अंकों के साथ शीर्ष पर है। मुंबई 6.6 अंकों के साथ दूसरे और पुणे 6 अंक के साथ तीसरे स्थान पर है। पटना 1.7 अंक और लखनऊ 1.8 अंक के साथ खासे पीछे हैं। लंदन इस मानक पर केवल 4.6 अंक जबकि न्यूयॉर्क महज 6.8 अंक हासिल कर सका है। अगर कोई शहर अहम है तो इसके लिए संसाधन मिल ही जाएंगे। प्रति व्यक्ति व्यय से हमें यह पता चलता है कि क्या शहर भी खर्च करता है? इस मानक पर मुंबई के 10 जबकि तिरुवनंतपुरम के 9.4 अंक हैं। चेन्नई, पुणे, सूरत और अहमदाबाद इस मानक पर 4-5 अंक पाने वाले शहर हैं।
किसी शहर के व्यय के अलावा एक अहम मुद्दा यह भी है कि क्या वह अपने खर्च को लेकर जवाबदेह, किफायती और पारदर्शी है? किफायत उसके बजट की निरंतरता में दिखती है। इस मोर्चे पर अहमदाबाद, दिल्ली, मुंबई, पुणे और सूरत 10 अंकों के साथ सबसे आगे हैं। जवाबदेही के मोर्चे पर देखें तो देश का कोई शहर बाहरी अंकेक्षण नहीं कराता। केवल 3 शहर भुवनेश्वर, कानपुर और रांची अपना सालाना लेखा सार्वजनिक करते हैं। व्यय के मोर्चे पर किफायती प्रदर्शन के लिए मानव संसाधन अहम है। इस मामले में मुंबई सबसे आगे है। उसके बाद कोलकाता, पुणे और दिल्ली आते हैं। एक अहम मुद्दा यह भी है कि क्या शहरी निकाय कुशल अधिकारियों को ऐसे काडर से चुन सकते हैं जिसे स्थानीय निकायों को चलाने में विशेषज्ञता हो। कम से कम 10 शहर- बेंगलूरु, भोपाल, भुवनेश्वर, चेन्नई, हैदराबाद, कोलकाता, मुंबई, पटना, पुणे और रांची ऐसा करते हैं। ऐसे में बेहतर स्थानीय शासन सुनिश्चित हो सकता है।
स्मार्ट सिटी को लेकर मचे सारे कोलाहल से दूर अध्ययन शहरों की सूचना प्रौद्योगिकी के बेहतर इस्तेमाल की क्षमता पर भी ध्यान देता है। सात शहरों की इस सूची में पुणे अव्वल है। उसके बाद बेंगलूरु, भोपाल, चेन्नई, दिल्ली, मुंबई और सूरत हैं। हालांकि आईटी के इस्तेमाल का स्तर अलग-अलग है। केवल चंडीगढ़ में डिजिटल प्रशासन का खाका है। जबकि केवल पुणे ही अपनी योजनाओं और सेवाओं को वेबसाइट पर डालता है। शहरी प्रशासन में नागरिक भागीदारी भी एकदम न्यूनतम है।
शहरी क्षेत्र के स्थानीय शासन की सफलता निर्धारित करने वाला एक अन्य अहम तत्त्व यह है कि वे लोकतांत्रिक हैं या नहीं और क्या निर्वाचित प्रतिनिधियों के पास पर्याप्त अधिकार हैं। सभी राज्यों में राज्य निर्वाचन आयोग हैं और शहरी स्थानीय निकाय के चुनाव अधिकांश जगह हर पांचवें साल होते हैं। बेंगलूरु और हैदराबाद इनके अपवाद हैं। शहरी प्रशासन की बात करें तो इसके मुख्य तत्त्व ये हैं कि क्या मेयर का सीधा निर्वाचन है और क्या उसके पास पांच साल का कार्यकाल है? 14 शहरों में पांच साल के कार्यकाल वाले मेयर हैं। लेकिन 7 महानगरों और बड़े शहरों- बेंगलूरु, दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, चंडीगढ़, पुणे और सूरत इस सूची से नदारद हैं। इन 21 शहरों में से केवल छह में ही सीधे चुने हुए मेयर हैं। ये शहर हैं- भोपाल, देहरादून, कानपुर, लखनऊ, रायपुर और रांची। कोई भी मेट्रो इस सूची में नहीं आता। किसी भी मेयर के पास यह अधिकार नहीं है कि वह नगर निकाय आयुक्त अथवा स्थानीय निकाय के मुख्य कार्याधिकारी तक को चुन सके।
ऐसे अध्ययन से तयशुदा अवधि में शहरों की प्रगति को मापा जा सकता है। वर्ष 2014-16 की तीन साल की अवधि में 21 शहरों में से जिसकी रैंकिंग सबसे अधिक सुधरी वह है हैदराबाद (12 स्थान) इसके बाद भुवनेश्वर (10 स्थान), कानपुर (7 स्थान), पुणे (6 स्थान), मुंबई (5 स्थान), चेन्नई (4 स्थान), बेंगलूरु और रांची (दोनों दो स्थान) और लखनऊ (एक स्थान)। जिन शहरों को नुकसान हुआ है वे हैं सूरत (10 स्थान), रायपुर और जयपुर (दोनों नौ स्थान), पटना (7 स्थान), दिल्ली और अहमदाबाद (दोनों चार स्थान), भोपाल (तीन स्थान) और कोलकाता और देहरादून (दो स्थान) तथा लखनऊ एक स्थान।
भुवनेश्वर इस सूची में सफलता की दास्तान लिख रहा है जबकि चंडीगढ़ तीनों साल 21वें स्थान पर रहा। पहले पहल यह अजीब लगता है। लगे क्यों न? आखिर चंडीगढ़ स्वतंत्र भारत की पहली नियोजित ढंग से बसी नगरी जो है। उसे ली कॉरबुजिये ने डिजाइन किया था। देखने में वह व्यवस्थित और पॉश दिखता है लेकिन स्थानिक विकास नियोजन के विकेंद्रीकरण में वह विफल है। वहीं भीड़ भरा और तंग कोलकाता सशक्त एवं वैध राजनीतिक प्रतिनिधित्व समेत तमाम मानकों पर बढिय़ा है। तिरुवनंतपुरम सभी मानकों पर बेहतर है। उसके बाद हैदराबाद और चेन्नई आते हैं।

Keyword: Cities, Surveys, शहर,
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