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कालिखो पुल के पत्र की हो निष्पक्ष जांच

जैमिनी भगवती /  March 19, 2017

सरकार और न्यायपालिका को अरुणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कालिखो पुल के उन आरोपों की जांच करनी चाहिए जो उन्होंने आत्महत्या से पहले एक पत्र में लगाए। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं जैमिनी भगवती

गत वर्ष 9 अगस्त को अरुणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कालिखो पुल ने मुख्यमंत्री पद छोडऩे  के तकरीबन 20 दिन बाद आत्महत्या कर ली। उन्होंने राजधानी इटानगर में मुख्यमंत्री के आधिकारिक आवास में ही फांसी लगा ली। वह महज 47 वर्ष के थे। पुल ने 60 पन्नों का एक नोट छोड़ा है। मेरे विचार शीर्षक वाला यह नोट हिंदी में लिखा गया है और इसके हर पन्ने पर उनके हस्ताक्षर हैं। इस नोट में प्रदेश, केंद्र सरकार और यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय के उच्चपदस्थ लोगों पर भ्रष्टïाचार के आरोप लगाए गए हैं। पुल के नोट में जिस तरह बातें लिखी गई हैं, उसे मृत्यपूर्व बयान भी कहा जा सकता है।
वित्तीय गड़बडिय़ों के आरोपों के बारे में देश के टेलीविजन और अखबारों में काफी चर्चा हो चुकी है लेकिन आश्चर्य की बात है कि मीडिया में 60 पन्नों के इस नोट के बारे में तथा प्रदेश की राजनीति से इसके संबंध के बारे में कुछ खास चर्चा देखने को नहीं मिली। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि सबसे पहले अरुणाचल प्रदेश के बारे में और उसके पुराने मुख्यमंत्रियों की राजनैतिक निष्ठïा और कार्यकाल के बारे में चर्चा की जा सके।
अरुणाचल प्रदेश की कुल आबादी 13 लाख है और यह सन 1987 में पूर्ण राज्य बना। राज्य विधानसभा में 60 सीटें हैं और राज्यसभा और लोकसभा में उसके खाते में क्रमश: एक और दो सीट हैं। अरुणाचल प्रदेश सामरिक महत्त्व का राज्य है। चीन के साथ उसकी 1,030 किलोमीटर लंबी सीमा है। म्यांमार के साथ उसकी सीमा 440 किमी और भूटान के साथ 160 किमी लंबी है। प्रदेश के सत्ताधारी दल समय-समय पर बदलते रहे हैं क्योंकि विधायक अपनी निष्ठïा बदलते रहते हैं। उदाहरण के लिए अगस्त 2003 से अप्रैल 2007 तक गेगांग अपांग राज्य के मुख्यमंत्री रहे। इस दौरान उन्होंने यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट, भाजपा और कांग्रेस की सरकार संभाली। अपांग समय-समय पर एक दल से दूसरे दल में जाते रहे। उनकी निष्ठïा केंद्र में सत्तारूढ़ दल के मुताबिक बदलती रही।
इसके विपरीत अप्रैल 2007 से जनवरी 2016 तक करीब नौ वर्ष की अवधि में तीन मुख्यमंत्री बने और ये सभी कांग्रेस से ताल्लुक रखते थे। इनमें से अंतिम मुख्यमंत्री थे नबाम तुकी जो नवंबर 2011 से जनवरी 2016 तक सत्ता में रहे। 2016 के शेष 11 महीनों के दौरान कई बार विधायक इधर से उधर हुए। इसके चलते सत्ताधारी दल भी बार-बार बदलते रहे। यह पूरा सिलसिला हास्यास्पद हो गया था।
26 जनवरी 2016 के बाद राष्टï्रपति शासन के कुछ दिन के भीतर ही पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल प्रदेश के नेता पुल प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। वह फरवरी से जुलाई तक करीब पांच माह तक इस पद पर रहे। उसके बाद पेमा खांडू जुलाई से सितंबर तक कांग्रेस के मुख्यमंत्री रहे। इसके पश्चात खांडू ने कांग्रेस छोड़ दी और सितंबर से दिसंबर 2016 तक वह पीपीए के मुख्यमंत्री रहे। 31 दिसंबर 2016 को खांडू 33 विधायकों के साथ भाजपा में चले गए और तब से वह भाजपा के मुख्यमंत्री हैं।
पुल हिंदी के अच्छे जानकार थे और अब तक किसी आधिकारिक स्रोत ने उनके पत्र पर कोई आशंका जाहिर नहीं की है। खुद पुल के लिखे शब्दों के मुताबिक वह एक गरीब परिवार में जन्मे अनाथ थे। धीरे-धीरे वह ठेकेदार बन गए। वह पहले भी मंत्री रहे थे और अपने नोट में उन्होंने लिखा कि फरवरी 2016 में उन्होंने मुख्यमंत्री पद संभाला क्योंकि उनको लगा कि वह राज्य के लिए कुछ कर सकते हैं।
इस नोट में पुल ने पूर्व मुख्यमंत्रियों दोरजी खांडू (पेमा खांडू के पिता), नबाम तुकी और पेमा खांडू पर वित्तीय भ्रष्टïाचार के विस्तृत इल्जाम लगाए। पुल के मुताबिक जब तुकी और खांडू के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में चल रहे मामलों में अंतिम निर्णय आएगा तो उनके लगाए आरोप सही साबित होंगे। कुछ अन्य आरोप मौजूदा विधायकों पर भी लगाए गए हैं। पुल के मुताबिक उन्हें जुलाई 2016 के बाद भी मुख्यमंत्री के पद पर बने रहने देने के लिए उनसे भारी भरकम धनराशि की मांग की गई।
पुल ने दिल्ली के कुछ पूर्व वरिष्ठï कांग्रेसी मंत्रियों और पार्टी नेताओं पर भी आरोप लगाया कि उन्होंने 2008 में या तो रिश्वत ली या 2009 में पैसे मांगे। पुल ने आरोप लगाया कि सर्वोच्च न्यायालय ने पक्षपात करते हुए गौहाटी  उच्च न्यायालय के एक निर्णय को पलट दिया जिसने तुकी के खिलाफ सार्वजनिक वितरण प्रणाली घोटाले में सीबीआई जांच की बात कही थी।
पुल के नोट में तमाम आरोपों के बीच उनके बेदाग रिकॉर्ड का भी जिक्र है। बहरहाल उनकी बात हमें तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय जयललिता और शशिकला नटराजन के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला याद दिलाती है। उस मामले में कर्नाटक उच्च न्यायालय ने विशेष परीक्षण न्यायालय के एकदम सही प्रतीत हो रहे फैसले को पलट दिया था। इस मामले को तकरीबन 20 साल पहले शुरू किया गया था। आखिरकार 14 फरवरी 2017 को सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि स्वर्गीय जयललिता और शशिकला नटराजन इस मामले में दोषी हैं।
24 फरवरी 2017 को द टाइम्स ऑफ इंडिया ने एक खबर में कहा कि पुल की विधवा दांगविमसाई पुल ने 17 फरवरी का अपना पत्र वापस ले लिया। उक्त पत्र देश के प्रधान न्यायाधीश को भेजा गया था और उसमें उन दो न्यायाधीशों के खिलाफ जांच की मांग की गई थी जिनका जिक्र पुल के आत्महत्या पत्र में था। खबर में यह भी कहा गया था कि श्रीमती पुल के वकील ने यह सवाल भी उठाया था कि आखिर सर्वोच्च न्यायालय ने उनके पत्र को आपराधिक रिट में क्यों तब्दील किया? इस बारे में यह दलील दी गई कि अगर सर्वोच्च न्यायालय रिट याचिका को खारिज करता है तो इस मामले में किसी भी तरह की प्रशासनिक जांच लगभग असंभव हो जाएगी।
द टाइम्स ऑफ इंडिया ने 1 मार्च 2017 को कहा कि श्रीमती पुल ने 28 फरवरी 2017 को उपराष्टï्रपति कार्यालय को एक पत्र लिखकर उच्चतम न्यायालय के पदस्थ न्यायाधीशों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की थी। खबरों के मुताबिक श्रीमती पुल ने उपराष्टï्रपति कार्यालय को पत्र इसलिए लिखा क्योंकि पुल ने मौजूदा राष्टï्रपति के खिलाफ भी आरोप लगाए हैं।
लब्बोलुआब यह कि पुल ने परेशानी की मनोदशा में आत्महत्या की। हो सकता है उनके नोट में लगाए गए आरोप सिरे से गलत हों। फिर भी पुल ने उन लोगों के खिलाफ आरोप लगाए हैं जो सरकार और न्यायपालिका में सर्वोच्च पदों पर आसीन हैं। ऐसे में उनके आरोपों की एक निष्पक्ष और पारदर्शी जांच आवश्यक है। संसद को भी इस बारे में पूरी जानकारी दी जानी चाहिए।

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