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योगी की नई भूमिका

संपादकीय /  March 19, 2017

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) कभी चौंकाने से नहीं चूकती। पार्टी ने 11 मार्च को उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में अभूतपूर्व जीत हासिल की और अब उसने योगी आदित्यनाथ को देश की सबसे अधिक आबादी वाले राज्य का मुख्यमंत्री बना दिया है। आदित्यनाथ का नाम मीडिया की चर्चा में शामिल नहीं था क्योंकि मीडिया यह मानकर चल रहा था कि पार्टी उनके कट्टïर हिंदुत्व के एजेंडे से दूरी बनाकर चलेगी। उनका एजेंडा उनकी बातों और गतिविधियों में झलकता रहा है। वह 15 वर्ष पुराने संगठन हिंदू युवा वाहिनी के प्रमुख हैं जिसका नाम हिंसा की कई घटनाओं से भी जुड़ा है। उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री का रिकॉर्ड अल्पसंख्यकों के खिलाफ रहा है। वह मुस्लिमों के खिलाफ द्वेषपूर्ण भाषण देते रहे हैं जिनका पूर्ण दस्तावेजीकरण है। योगी आदित्यनाथ राजनेता ही नहीं हैं बल्कि वह गोरखनाथ मठ के मुखिया भी हैं। वह सन 1998 से ही गोरखपुर संसदीय सीट जीत रहे हैं लेकिन उनको प्रशासन का जरा भी अनुभव नहीं है। इसे इस बात से भी समझा जा सकता है कि गोरखपुर प्रदेश के सबसे पिछड़े इलाकों में से एक है। ऐसे में यह धारणा जोर पकड़ रही है कि उनको मुख्यमंत्री बनवाने में राष्टï्रीय स्वयंसेवक संघ की अहम भूमिका रही है। उसे शायद यह लगा होगा कि विधानसभा में मिला प्रचंड बहुमत योगी आदित्यनाथ को बहुसंख्यक एजेंडा आगे बढ़ाने में मदद करेगा। एक विचार यह भी है कि भाजपा ने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की लहर पर सवार होने का मन बना लिया है ताकि वह वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रदेश की 80 में से अधिकांश सीटें जीत सके।
निश्चित रूप से यह चुनाव आसान नहीं रहा होगा। भाजपा को इतना भारी बहुमत जरूर मिला लेकिन वह पूरे एक सप्ताह तक प्रत्याशी चयन नहीं कर पाई। परदे के आगे-पीछे काफी कुछ चल रहा था और आखिरकार एक मुख्यमंत्री और दो उपमुख्यमंत्रियों पर सहमति बनी। दोनों उपमुख्यमंत्रियों में से एक केशव प्रसाद मौर्य पिछड़ा वर्ग से जबकि अन्य दिनेश शर्मा ब्राह्मïण हैं। मौर्य पार्टी की प्रदेश इकाई के अध्यक्ष रहे हैं और शर्मा लखनऊ के मेयर। इससे पता चलता है कि अंतिम चयन के दौरान जाति और धर्म के समीकरण का पूरा ध्यान रखा गया। खुद आदित्यनाथ के भाजपा के साथ अच्छे रिश्ते नहीं रहे हैं। अपने कट्टïर ङ्क्षहदुत्ववादी एजेंडे के चलते वह पार्टी से बगावत करते रहे हैं।
अब जबकि वह सत्ता में हैं तो क्या आदित्यनाथ यह सुनिश्चित करेंगे कि उनका अतीत राज्य में उनकी नई भूमिका पर हावी न हो। वह एक ऐसे राज्य के मुख्यमंत्री हैं जहां 19.3 फीसदी आबादी मुस्लिम है। ऐसे में कट्टïर अल्पसंख्यक विरोधी एजेंडा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समावेशी विकास के कथन के अनुरूप नहीं बैठता। मोदी का अधिकांश प्रचार अभियान इसी बयान के इर्दगिर्द बुना गया है। हकीकत में उत्तर प्रदेश में भाजपा की जबरदस्त जीत ने मोदी को ऐसी राजनीतिक पूंजी दी है जो आर्थिक सुधार करने में मददगार हो सकती है। मीडिया के साथ अपने सीमित संवाद में आदित्यनाथ ने प्रधानमंत्री का सबका साथ, सबका विकास का नारा दोहराया और संकेत दिया कि वह उत्तर प्रदेश को सुशासन के जरिये उत्तम प्रदेश बनाने की हर कोशिश करेंगे। परंतु समस्या यह है कि कई लोग इसे एक ऐसे नेता का जबानी जमाखर्च मानेंगे जिसने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की मदद से तेजी से अपना मुकाम बनाया है। मोदी ने उत्तर प्रदेश में जीत के तत्काल बाद भाजपा मुख्यालय में कहा था कि सरकारें भले ही बहुसंख्यक मिलकर बनाते हैं लेकिन शासन हर किसी के लिए होता है। अब यह सवाल सबके मन में होगा कि कहीं न्यूनतम सरकार के नारे की तरह यह भी केवल एक कथन बनकर तो नहीं रह जाएगा।

Keyword: BJP, UP, yogi adityanath,
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