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नौकरी के क्षेत्र में महिलाओं की स्थिति पर विचार की दरकार

इंसानी पहलू
श्यामल मजूमदार /  March 16, 2017

देश के कॉर्पोरेट जगत के जोरशोर से अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने से महज एक दिन पहले भारतीय स्टेट बैंक की चेयरपर्सन अरुंधती भट्टाचार्य ने एक संजीदा टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि देश के सबसे बड़े बैंक में शुरुआती स्तर पर 33 फीसदी महिला कर्मचारी हैं। अलबत्ता शीर्ष प्रबंधन स्तर पर यह संख्या महज 4 फीसदी है। देश के सबसे बड़े निजी बैंक आईसीआईसीआई में भी स्थिति बेहतर नहीं है। आईसीआईसीआई ग्रुप द्वारा किए गए एक अध्ययन के मुताबिक कनिष्ठï प्रबंधन स्तर पर जितने कर्मचारी नौकरी छोड़ते हैं उनमें महिलाओं की संख्या उनके प्रतिनिधित्व से दो फीसदी ज्यादा है। दूसरे शब्दों में कहें तो इस स्तर पर महिलाओं की संख्या 25 फीसदी है जबकि नौकरी छोडऩे वाले कर्मचारियों में उनकी संख्या 27 फीसदी है। इससे ऊपरी स्तर पर उनकी आपूर्ति लाइन प्रभावित होती है। 

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बैंक में माध्यमिक प्रबंधन स्तर पर भी महिलाओं के नौकरी छोडऩे की दर इसी अनुपात में है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कनिष्ठï प्रबंधन स्तर पर अधिकांश महिलाओं की उम्र 26 से 30 के बीच होती है। यह वह उम्र होती है जब उनकी शादी होती है और वे परिवार शुरू करती हैं। अध्ययन में कहा गया है कि इस स्तर पर महिलाओं के नौकरी छोडऩे की दर दो फीसदी ज्यादा होने के बीच यही एकमात्र नहीं हो सकता है लेकिन यह स्पष्टï है कि यह एक अहम कारण है। 
 
एसबीआई और आईसीआईसीआई दोनों ने महिला कर्मचारियों के अनुकूल नीतियां बनाकर उनके नौकरी छोडऩे पर लगाम लगाने की कोशिश की है। उदाहरण के लिए एसबीआई ने इस सप्ताह महिला कर्मचारियों के लिए दो साल की छुट्टïी और घर से काम करने की सुविधा की घोषणा की। आईसीआईसीआई बैंक ने महिलाओं के लिए आईवर्कएटहोम योजना शुरू की है जिसमें उन्हें एक साल तक घर से काम करने की इजाजत दी गई है। इस अवधि को आगे भी बढ़ाया जा सकता है। 
 
इसके साथ ही उनके लिए कुछ और सुविधाएं भी शुरू की गई हैं। जैसे कारोबार के सिलसिले में यात्रा करने वाली महिला प्रबंधकों को यात्रा भत्ता देना, उनके छोटे बच्चों और उनकी देखभाल करने वालों के ठहरने की सुविधा। बैंकिंग क्षेत्र को अमूमन महिलाओं के लिए अच्छा माना जाता है (दस में एक कंपनी की अगुआई ही महिलाओं के हाथों में है) लेकिन यहां उनके नौकरी छोडऩे की दर चिंताजनक है। दूसरे क्षेत्रों में तो हालत बदतर है। 
 
उदाहरण के लिए विश्व बैंक के मुताबिक भारत के कामगारों में केवल एक चौथाई ही महिलाएं हैं जो दुनिया के औसत 50 फीसदी से बहुत कम है। देश की कामकाजी महिलाओं में करीब 63 फीसदी खेतों में काम करती हैं। कृषि क्षेत्र के इतर दूसरे क्षेत्रों में महिलाओं की हिस्सेदारी 20 फीसदी से भी कम है। वास्तव में परेशान करने वाली तस्वीर है। पिछले कुछ दशकों से शिक्षा तक महिलाओं की पहुंच बढ़ी है लेकिन करीब 78 फीसदी पात्र स्नातक महिलाएं संगठित कार्यबल का हिस्सा नहीं बनती हैं। ये वे महिलाएं होती हैं जो केवल सामाजिक कारणों से अपनी पढ़ाई पूरी करती हैं, न कि संगठित कार्यबल में भागीदार बनने की इच्छा के कारण। यही कारण है कि अधिकांश स्तरों पर महिलाओं के नौकरी छोडऩे की स्थिति में उनकी जगह पुरुषों को ही रखा जाता है। 
 
इस पारंपरिक सोच में शायद ही कोई सच्चाई है कि देश के शहरी इलाकों में महिलाओं के लिए स्थिति बेहतर है। उदाहरण के लिए राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (68वां दौर) के मुताबिक 2011-12 में ग्रामीण इलाको ंमें प्रत्येक 100 महिलाओं में से 24.8 काम करती हैं। पुरुषों के मामले में यह संख्या 54.3 थी। शहरी क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी बेहद कम थी। वहां प्रत्येक 54.6 फीसदी कामगार पुरुषों पर केवल 14.7 कामकाजी महिलाएं थीं। इसके बहुत कारण हैं। महिलाओं को महिला होने के कारण कुछ नौकरियों में नजरअंदाज किया जाता है और उन्हें पुरुषों के बराबर वेतन नहीं दिया जाता है। साथ ही कार्यस्थलों पर उनके साथ कई तरह से भेदभाव होता है। कंपनियों का कहना है कि पुरुषों एवं महिलाओं के वेतन में अंतर इसलिए मौजूद है क्योंकि महिलाओं की जिम्मेदारी काम और परिवार के बीच बंटी होती है। महिलाओं को परिवार पर ध्यान देने के लिए नौकरी छोडऩी पड़ती है। जब तक वे फिर से नौकरी पर लौटती हैं तब तक गाड़ी उनके हाथ से निकल चुकी होती है। 
 
ऐसे साक्ष्य मौजूद हैं कि अनुभवी होने के बाद करियर के मध्य में महिलाओं के स्वैच्छिक रूप से नौकरी छोडऩे की दर पुरुषों से दो से तीन गुना ज्यादा होती है। लेकिन महिलाओं के साथ नौकरी के किसी भी स्तर पर भेदभाव हो सकता है। भर्ती से लेकर, पारिश्रमिक, व्यावसायिक पृथक्करण और छंटनी तक। महिलाओं और पुरुषों की अर्थव्यवस्था के अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने की प्रवृत्ति होती है और वे एक ही व्यावसायिक समूह में अलग-अलग पदों पर काम करते हैं। महिलाओं को पुरुषों की अपेक्षा सीमित काम दिया जाता है और उनके पार्ट टाइम या शॉर्ट टाइम काम करने की ज्यादा संभावना होती है। प्रोन्नति और करियर विकास में भी उन्हें कई तरह की बाधाओं का सामना करना पड़ता है। काश महिला दिवस पर होने वाली चर्चा और बेहतर होती।
Keyword: women, सवैतनिक मातृत्व अवकाश,
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