बिजनेस स्टैंडर्ड - उतरी चुनाव की खुमारी ... अब आई काम की बारी
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उतरी चुनाव की खुमारी ... अब आई काम की बारी

अरूप रॉयचौधरी, संजीव मुखर्जी, शुभायन चक्रवर्ती, मेघा मनचंदा और इंदिवजल धस्माना /  03 15, 2017

पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के कारण अधिकांश फैसले रुके पड़े थे। अब चुनाव प्रक्रिया खत्म होने के बाद बिज़नेस स्टैंडर्ड के संवाददाताओं ने केंद्र सरकार की नीतियों, राजनीतिक एजेंडे और अगले छह महीने की योजनाओं पर नजर डाली

प्रसार भारती के अध्यक्ष ए सूर्य प्रकाश ने विवेकानंद इंटरनैशनल फाउंडेशन के लिए लिखे ब्लॉग में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कुछ सलाह दी है। यह सलाह नोटबंदी के संदर्भ में है। प्रकाश ने ढर्रे से हटकर सोचने के लिए प्रधानमंत्री की सराहना की लेकिन साथ ही कहा कि उनकी योजनाओं को अमली जामा पहनाने के लिए अलग तरह की नौकरशाही की जरूरत है।

प्रकाश ने लिखा, 'चूंकि मोदी मौजूदा व्यवस्थाओं के कारगर होने की क्षमता पर सवाल उठाते हैं, इसलिए वह प्रबंधन विशेषज्ञों के लिए सरकार के दरवाजे खोलने की संभावना पर विचार कर सकते हैं, खासकर राष्ट्रीय कार्यक्रमों के प्रबंधन के लिए। यह तभी हो सकता है जब वह भारतीय नौकरशाही की सफाई करें जिसकी छवि ऐसी है कि वह बाहरी लोगों को व्यवस्था में आने से रोकती है और उनकी सृजनशीलता की हत्या करती है।' वह इस बात का रोना रोते हैं कि सरकार में ऐसे लोगों का दबदबा है जो सोचते हैं कि जिनके पास बताने के लिए बैच, सर्विस और साल नहीं है उन्हें सरकार में रहने का कोई अधिकार नहीं है।

प्रकाश ने कहा, 'इस स्थिति को बदलना होगा। मोदी जिस नए भारत को बनाने की बात कर रहे हैं, उसे एक नई प्रशासनिक व्यवस्था की जरूरत होगी। भारत में बड़ी संख्या में लोग अब भी गरीबी रेखा से नीचे हैं और साक्षर नहीं हैं, आकांक्षाओं से भरा एक मध्य वर्ग है जो बेहतर जिंदगी से लिए जल्द से जल्द बदलाव चाहता है, केंद्र और कई राज्यों में एक सार्थक सरकार है जो अचूक व्यवस्था के साथ असली लाभार्थियों तक योजनाओं का लाभ पहुंचाना चाहती है। भारत की वास्तविकता को देखते हुए नई प्रशासनिक व्यवस्था में नौकरशाह और प्रबंधन विशेषज्ञ शामिल होने चाहिए। ऐसे नौकरशाह होने चाहिए जो जमीनी स्तर पर लोगों की समस्या से निपटते हैं और ऐसे प्रबंधन विशेषज्ञ चाहिए जिन पर नौकरशाही का बोझ न हो। दूसरे शब्दों में इसमें पुराने और नए यानी परंपरागत और नई सोच का संगम होना चाहिए।'

प्रमुखों का फैसला

विधानसभा चुनाव अब खत्म हो चुके हैं और नौकरशाही में बदलाव सरकार का अगला कदम हो सकता है। संभवत: यह प्रकाश के सुझाव के मुताबिक हो सकता है। नौकरशाहों के कई वरिष्ठï पद खाली हो रहे हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यकाल जून में समाप्त हो रहा है। यह एक प्रतिष्ठिïत नियुक्ति है। इसी तरह नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक का कार्यकाल भी जून में समाप्त हो रहा है। कैबिनेट सचिव पी के सिन्हा ने 13 जून 2015 में पदभार संभाला था और उनका कार्यकाल दो साल का है। अप्रैल से ही सरकार को इस बात पर माथापच्ची करनी होगी कि उनका कार्यकाल बढ़ाया जाए या फिर उनका उत्तराधिकारी नियुक्त किया जाए।

भारतीय प्रशासनिक सेवा की सबसे वरिष्ठ अधिकारी अंजली छिब दुग्गल 1981 बैच की हैं और फिलहाल वित्तीय सेवा विभाग में सचिव हैं। लेकिन वह 1 सितंबर को सेवानिवृत्त हो रही हैं। कैबिनेट सचिव बनने पर उनकी सेवा में तुरंत विस्तार करना होगा। दूसरा सवाल यह है कि क्या वित्त मंत्रालय उन्हें वास्तव में मुक्त कर देगा? आर्थिक मामलों के सचिव शक्तिकांत दास को 23 जनवरी में तीन महीने का विस्तार दिया गया था। अप्रैल में उनके उत्तराधिकारी की नियुक्ति होनी है। वित्त सचिव अशोक लवासा अक्टूबर में सेवानिवृत्त होंगे और वह भी कैबिनेट सचिव की होड़ में शामिल हैं। बिजली सचिव सहित कई सचिव आने वाले दिनों में सेवानिवृत्त हो रहे हैं।

वित्त मंत्रालय

सरकार को हाल फिलहाल सबसे पहले वित्त मंत्रालय की सुध लेनी है। काले धन के खिलाफ प्रधानमंत्री की पहल दो मोर्चों पर जारी रहेगी। 31 मार्च वित्त वर्ष 2016-17 का आखिरी दिन है। उसी दिन प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना भी समाप्त हो रही है। केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के भी उसी दिन नोटबंदी के दौरान जमा हुई अघोषित संपत्ति की घोषणा कर सकता है। इस तरह केंद्र के पास नोटबंदी को जायज ठहराने के लिए ठोस सबूत होगा और उसे कर चोरों के पीछे पडऩे का अधिकार मिल जाएगा। उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों को नोटबंदी पर जनमत माना जा रहा था और इसके परिणाम से भाजपा सरकार इस मुद्दे पर और मुखर हो जाएगी। लंदन में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने भाषणों में इस बात को जोर देकर कहा कि जिन्होंने भारत में कर नहीं दिया है उनके पास कानून के सामने झुकने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। फिर राजनीतिक चंदे की व्यवस्था को भी साफ करने के प्रस्ताव हैं जिनकी घोषणा जेटली ने 2017-18 के आम बजट में की थी।

इसमें सबसे प्रमुख प्रस्ताव इलेक्टोरल बॉन्ड का है। चंदा देने वाला घोषित संपत्ति से ही ये बॉन्ड खरीद सकता है और राजनीतिक पार्टियां चुनाव आयोग के पास घोषित बैंक खातों में ही ये बॉन्ड भुना सकते हैं। इसके बारे में इस महीने के अंत में वित्त विधेयक में विस्तार से जानकारी दी जाएगी। घाटे में चल रहे और मुनाफा कमा रहे सरकारी उपक्रमों के विनिवेश और निजीकरण के मामले को भी सरकार के जोरशोर से आगे बढ़ाने की संभावना है। सरकार ने 2017-18 के लिए 72,500 करोड़ रुपये का लक्ष्य रखा है जो अब तक का सर्वाधिक है। इनमें से 46,500 करोड़ रुपये अल्पांश भागीदारी और शेयर पुनर्खरीद के जरिये जुटाए जाने हैं। यह सबसे आसान रास्ता है।

सभी संकेत बताते हैं कि दो साल की योजना और देरी के बाद सरकार घाटे में चल रही सरकारी कंपनियों को बेचने जा रही है या फिर उनका मुनाफा कमा रही सरकारी कंपनियों में विलय किया जाएगा। इससे सरकारी खजाने में 15,000 करोड़ रुपये आएंगे। सरकार ने विनिर्माण, रेलवे और बीमा क्षेत्र की कई गैर सूचीबद्ध सरकारी कंपनियों कोसूचीबद्ध  करने या फिर इनमें अपनी पूरी हिस्सेदारी बेचने की तैयारी कर ली है। पांच सरकारी साधारण बीमा कंपनियों को सूचीबद्ध करने से सरकार को वित्त वर्ष 2017-18 में 11,000 करोड़ रुपये जुटाने की उम्मीद है।

इसी तरह खासकर तेल एवं गैस क्षेत्र की कंपनियों में विलय एवं अधिग्रहण की भी योजना है। विधानसभा चुनाव खत्म होने के बाद अब इन योजनाओं के बारे में घोषणा होने की संभावना है। बैंकिंग व्यवस्था में फंसे हुए कर्ज की समस्या का भी समाधान किया जाएगा। छह लाख करोड़ रुपये के फंसे कर्ज से निपटने के लिए सरकार इसके लिए संपत्ति प्रबंधन कंपनी स्थापित करने पर विचार कर रही है। साथ ही मौजूदा संपत्ति पुनर्गठन कंपनियों को भी मजबूत किया जाएगा। 

विदेशी निवेश


विदेशी निवेश का संचालन करने वाले नीतिगत ढांचे की समीक्षा करने की जरूरत है। सरकार ने विदेशी निवेश संवद्र्घन बोर्ड (एफआईपीबी) को खत्म कर दिया है। इसके पीछे तर्क यह दिया गया कि अधिकांश विदेशी प्रत्यक्ष निवेश अब स्वत: अनुमोदन के रास्ते से आ रहा है। सभी क्षेत्रों में केवल 6 या 7 फीसदी विदेशी निवेश ही अनुमोदन के रास्ते आता है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री निर्मला सीतारामन ने संकेत दिया है कि एफआईपीबी की गैर मौजूदगी में विभागीय नियामक इस पर फैसला लेने के लिए पर्याप्त हैं। औद्योगिक संवद्र्घन सचिव रमेश अभिषेक का मानना है कि प्रशासनिक विभागों को अंतिम फैसले लेने की अनुमति दी जा सकती है। 

अहम क्षेत्रों में एफडीआई में बढ़ोतरी हुई है और 2016-17 की पहली छमाही में कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 30 फीसदी बढ़त के साथ 21.6 अरब डॉलर पहुंच गया है। 2015-16 में एफडीआई उससे पिछले साल की तुलना में 29 फीसदी बढ़कर 40 अरब डॉलर पहुंच गया। बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में यह लगातार तीसरा साल है जब सरकार इसमें रिकॉर्ड पूंजी खर्च कर रही है। यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब निजी क्षेत्र संकट से गुजर रहा है और फंसे कर्ज की मात्रा बहुत ज्यादा पहुंच गई है। इस क्षेत्र में सबसे बड़ा विवाद सड़क बनाने वाली निजी कंपनियों के साथ है जो परियोजनाओं से निकलना चाहती हैं लेकिन वे ऐसा नहीं कर पा रही हैं। निजी-सरकारी भागीदारी से जुड़े विवादों के संदर्भ में मध्यस्थता एवं सुलह कानून में बदलाव की जल्दी ही घोषणा होने की संभावना है।

रेलवे, सड़क, जहाजरानी और वायु यातायात को आपस में जोडऩे के लिए सरकार बड़े कदम उठाने की योजना बना रही है। इसके लिए आगामी वित्त वर्ष में 3.1 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है जो वित्त वर्ष 2016-17 के संशोधित अनुमान से करीब 11 फीसदी अधिक है। पिछले साल उत्तर प्रदेश और पंजाब में दो लाख करोड़ रुपये से अधिक की सड़क परियोजनाओं की घोषणा की गई थी लेकिन चुनाव के कारण इन का काम रुका पड़ा था। अब चुनाव खत्म होने के बाद इन परियोजनाओं पर काम आगे बढ़ेगा। इन परियोजनाओं की घोषणा सितंबर 2016 में की गई थी।

सड़क मंत्री नितिन गडकरी ने कई एक्सप्रेसवे बनाने की घोषणा की थी। इनमें दिल्ली-अमृतसर-कटरा एक्सप्रेसवे भी शामिल है जिसका मकसद पंजाब और जम्मू-कश्मीर स्थित वैष्णो देवी जाने वाले श्रद्धालुओं की राह आसान बनाना है। कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे भी सरकार की प्राथमिकता सूची में है। 1500 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले इस एक्सप्रेसवे से दो शहरों के बीच का सफर एक घंटे से घटकर 35 मिनट रह जाएगा। इसी तरह वडोदरा-मुुंबई, चेन्नई-बेंगलूरु और अहमदाबाद-धोलेरा (गुजरात में प्रस्तावित स्मार्ट औद्योगिक शहर) भी सरकार की प्राथमिकता सूची में है।

जीएसटी


वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के मामले में सरकार आगे बढ़ेगी। जीएसटी परिषद की 16 मार्च को होने वाली बैठक के बाद सरकार जीएसटी और उससे जुड़े मुआवजा विधेयकों को मंत्रिमंडल की मंजूरी दिलाएगी और केंद्र शासित प्रदेशों से जुड़े जीसटी विधेयक पर फैसला करेगी। मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद केंद्रीय जीएसटी, एकीकृत जीएसटी और यूटीजीएसटी के साथ-साथ मुआवजा विधेयकों को बजट सत्र के दूसरे चरण में संसद में पेश किया जाएगा। इस बैठक में परिषद साथ ही राज्य जीएसटी विधेयक पर भी चर्चा करेगा लेकिन इसे राज्य विधानसभाओं में पेश किया जाएगा।  

परिषद की 4 मार्च की बैठक में सीजीएसटी और आईजीएसटी विधेयको को मंजूरी दी जा चुकी है। इससे पहले उसने मुआवजा विधेयक को भी मंजूरी दे दी थी। इससे जीएसटी को जुलाई से लागू किए जाने की संभावना बढ़ी है। संसद और संबंधित विधानसभाओं से इन विधेयकों को मंजूरी मिलने के बाद जीएसटी से जुड़े नियम बनाए जाएंगे। राजस्व सचिव हसमुख अधिया की अगुआई में अधिकारियों की एक समिति विभिन्न वस्तुओं पर जीएसटी दरों का निर्धारण करेगी। जीएसटी परिषद ने चार दरों 5, 12, 18 और 28 को मंजूरी दी है। तंबाकू, शीतल पेय और बड़ी कारों जैसे विलासितापूर्ण सामान के लिए सबसे ज्यादा कर पर उपकर को भी मंजूरी दी है। 

कृषि


सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र पर भी बहुत जोर दिए जाने की संभावना है। अधिकारियों का कहना है कि चुनावों के बाद तीन प्रमुख क्षेत्रों में तेजी से काम आगे बढ़ाया जाएगा। केंद्र सरकार की योजना कृषि उत्पादों की मार्केटिंग के नियमों को बदलने, ठेके पर खेती और पट्टे पर खेती को आसान बनाने के लिए तीन आदर्श कानून बनाने की है। कृषि से संबंधित योजनाओं और कार्यक्रमों की उचित योजना और क्रियान्वयन के लिए वित्त वर्ष 2017-18 के आम बजट से फंड आना शुरू होगा। ऐसा इसलिए संभव हुआ है क्योंकि इस बार बजट एक माह पहले पेश कर दिया गया था और संसद ने समय पर इसे मंजूरी दे दी।

कृषि उपज मंडी कानून सं संबंधित आदर्श मसौदे को पक्षकारों के सुझाव के लिए रखा गया था। अब इसमें जरूरी बदलाव कर मंत्रिमंडल की मंजूरी के लिए भेजा सकता है। ठेके पर खेती के लिए आदर्श कानून बनाने के वास्ते नीति आयोग के तहत एक समिति का गठन किया गया है। पट्टे पर खेती के लिए एक आदर्श कानून बनाया गया है और इस पर राज्यों के साथ चर्चा चल रही है। सरकार बीज विधेयक पर भी कदम बढ़ाएगी। यह बीजों पर नियमन मुहैया कराएगा, आयात को सुगम बनाएगा और किसानों के हितों का संरक्षण करेगा। इससे जीन संवर्धित फसलों की राह भी आसान होगी। मृदा स्वास्थ्य कार्ड के वितरण की प्रक्रिया भी तेज होने की संभावना है। इसके लिए राज्यों में प्रयोगशालाएं बनाने के लिए ज्यादा फंड जारी किया जाएगा।

सरकार ने 2017 तक 14 करोड़ नमूनों की जांच का लक्ष्य रखा है। अगले वित्त वर्ष के दौरान प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का दायरा बढ़ाया जाएगा। अभी यह कुल फसल क्षेत्र का 30 फीसदी है जिसे बढ़ाकर 40 फीसदी किया जाएगा। साथ ही सरकार का जोर लंबित सिंचाई योजनाओं को पूरा करने पर रहेगा। राशन कार्ड का डिजिटलीकरण और उन्हें आधार से जोडऩे तथा राशन की दुकानों में नकदीरहित व्यवस्था को भी आगे बढ़ाया जाएगा। 

कोयला


एक साल से रुकी कोयला खदान नीति को बहाल किया जा सकता है। मंत्रिमंडल तीन बार इसे टाल चुका है। पिछले सप्ताह उसने तीसरी बार इसे ठंडे बस्ते में डाला था। इसकी मसौदा नीति लंबे समय से अटकी पड़ी है। कोयला खदानें राज्यों सरकारों की वितरण कंपनियों को दी जानी हैं। फिर ये कंपनियां इन खदानों को राज्य या केंद्र सरकार की बिजली उत्पादन कंपनियों को देंगी। कोयला खदान नीलामी से 30,000 मेगावॉट बिजली उत्पादन क्षमता बहाल होगी। इससे पहले कोयला एवं बिजली मंत्रालय इस बात को लेकर पशोपेश में थे कि खदानें कैसे दी जाएं। पिछले साल जुलाई में मंत्रिमंडल की बैठक से नीति पर फैसले को हटा दिया गया था ताकि इस पर और विचार विमर्श किया जा सके। बाद में कोयला मंत्रालय ने बिजली वितरण क्षेत्र को बहाल करने के लिए उदय योजना के तहत खदानों को नीलामी के जरिये राज्य की बिजली कंपनियों को देने का फैसला किया था। 
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