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उपभोक्ता कानून के दायरे में ट्रस्ट नहीं

अदालत से
एम जे एंटनी /  03 15, 2017

चैरिटेबल ट्रस्ट को उपभोक्ता कानून संरक्षण अधिनियम के तहत उपभोक्ता के तौर पर वर्गीकृत नहीं किया जा सकता है जिसकी वजह से ट्रस्ट को किसी उपभोक्ता अदालत में अपील करने का अधिकार नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने प्रतिभा प्रतिष्ठान बनाम केनरा बैंक मामले में सुनाए अपने फैसले में यह टिप्पणी की है। बॉम्बे चैरिटेबल ट्रस्ट अधिनियम के तहत पंजीकृत इस ट्रस्ट ने राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग के फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में अपील की थी। लेकिन न्यायालय ने उपभोक्ता आयोग के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि ट्रस्ट न तो उपभोक्ता और न ही किसी शिकायतकर्ता की श्रेणी में आता है। उपभोक्ता संरक्षण आयोग के तहत शिकायतकर्ता वही हो सकता है जो कोई फर्म हो, हिंदू अविभाजित परिवार हो, सहकारी सोसाइटी हो या व्यक्तियों का कोई अन्य समूह हो।

 
कंपनी कर्मचारियों को सुनने के लिए रिजर्व बैंक बाध्य नहीं
 
जब भारतीय रिजर्व बैंक किसी वित्त कंपनी को खास तरह का कामकाज रोकने का निर्देश देता है तो वह उस कंपनी के कर्मचारियों की आशंकाओं को सुनने के लिए बाध्य नहीं है। कलकत्ता उच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में कहा है कि रिजर्व बैंक नौकरी गंवाने के डर से परेशान कर्मचारियों की बात सुनने के लिए बाध्य नहीं है। रिजर्व बैंक अधिनियम का हवाला देते हुए न्यायालय ने कहा है कि किसी प्रभावित कंपनी के कर्मचारी उसे लिखित प्रतिवेदन तो भेज सकते हैं लेकिन मौखिक रूप से उनकी बात सुनना जरूरी नहीं है। उच्च न्यायालय ने पियरलेस जनरल फाइनैंस कंपनी और उनसे कर्मचारी संगठन की याचिकाओं को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की है। रिजर्व बैंक ने पियरलेस को अवशिष्ट गैर-बैंकिंग कंपनी (आरएनबीसी) कारोबार से अलग होने का निर्देश दिया था। कंपनी ने इस आदेश को कई बिंदुओं पर न्यायालय में चुनौती दी थी जिसमें एक बिंदु यह भी था कि कर्मचारियों का पक्ष नहीं सुना गया है। न्यायालय ने इसे नकारते हुए कहा है कि कई सांसदों ने भी इस मुद्दे को लिखित प्रतिवेदन में उठाया है जिस पर रिजर्व बैंक ने संज्ञान भी लिया है। ऐसे में मौखिक रूप से बात सुनने का कोई औचित्य नहीं है। न्यायालय ने यह भी कहा कि रिजर्व बैंक ने समाज के व्यापक हित को देखते हुए आरएनबीसी कारोबार रोकने का निर्णय लिया है। वैसे भी रिजर्व बैंक ने पियरलेस कंपनी को नहीं बल्कि उसकी एक कारोबारी इकाई को बंद करने का निर्देश दिया है। इस स्थिति में कंपनी अपने कर्मचारियों को अन्य कार्यों में लगा सकती है। 
 
विस्थापितों को अधिक मुआवजे का ऐलान
 
बम्बई उच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह नीरा देवघर सिंचाई परियोजना के चलते बेघर हुए लोगों को पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करे। इन लोगों की जमीन 1996 में मामूली मुआवजे के एवज में अधिग्रहीत कर ली गई थी। बाद में सरकार ने इन लोगों के पुनर्वास के लिए मुआवजे की रकम का 65 फीसदी हिस्सा वापस भी मांग लिया था। लेकिन उच्च न्यायालय ने गेन्बा लक्ष्मण बनाम महाराष्ट्र सरकार वाद पर अपना फैसला सुनाते हुए इस पर कड़ी आपत्ति जताई है। 
 
न्यायालय ने कहा कि पुश्तैनी जमीन और घरों से उजाड़ दिए लोगों की पीड़ा के प्रति असंवेदनशीलता दिखाते हुए सरकार उनके लिए समुचित पुनर्वास भी मुहैया नहीं करा पाई है। विस्थापितों को सातारा जिले में जो जमीन दी गई है वह बंजर है और वहां पर सिंचाई की भी सुविधाएं नहीं हैं। राज्य सरकार ने दलील दी थी कि वह विस्थापितों को वैकल्पिक जमीन देने के लिए बाध्य नहीं है। लेकिन न्यायालय ने विस्थापित लोगों की दलील स्वीकार करते हुए कहा कि राज्य सरकार ने इन लोगों के जीवन के बुनियादी अधिकार का भी ख्याल नहीं रखा है। इसके साथ ही न्यायालय ने मुआवजे की दर को भी बढ़ाने का फैसला सुनाया।
 
पैकेट डिजाइन पर आईटीसी की अर्जी खारिज
 
कलकत्ता उच्च न्यायालय ने सिगरेट बनाने वाली कंपनी आईटीसी लिमिटेड की उस अपील को खारिज कर दिया है जिसमें उसने फिलिप्स मॉरिस प्रोडक्ट्स के पैकेट डिजाइन को लेकर आपत्ति जताई थी। आईटीसी ने डिजाइन अधिनियम का हवाला देते हुए कहा था कि विरोधी कंपनी के पैकेट के डिजाइन में कुछ भी नया नहीं है लिहाजा उसके पंजीकरण की मंजूरी नहीं दी जा सकती है। लेकिन न्यायालय ने उसके दावों को नकारते हुए कहा है कि डिजाइनों के एकसमान होने को लेकर अंतिम फैसला तो न्यायाधीश की आंख ही करेगी। इस मामले में डिजाइन कंट्रोलर ने आंखों से परीक्षण कर ही यह पाया है कि दोनों पैकेट अलग-अलग हैं। इसके अलावा विवाद उठने के छह साल बाद अपील करने पर भी न्यायालय ने एतराज जताया है। 
 
हादसे में मौत पर कम मुआवजे पर आश्चर्य 
 
उच्चतम न्यायालय ने एक सड़क हादसे में मौत के बाद मुआवजे की गणना में गलत सिद्धांत अपनाने के लिए मोटर दुर्घटना मुआवजा न्यायाधिकरण और आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के रवैये पर क्षोभ और आश्चर्य जताया है। हादसे में 52 साल के एक शख्स की मौत हो गई थी जिसके बाद न्यायाधिकरण ने मुआवजे की गणना इस आधार पर की कि उसकी कमाई करने की उम्र छह साल ही बाकी रह गई थी। बाद में उच्च न्यायालय ने बोगीरेड्डïी बनाम मणि मुतुपांदी वाद में इस उपार्जन उम्र को बढ़ाकर आठ साल कर दिया था। लेकिन उच्चतम न्यायालय ने उसे बढ़ाकर 11 साल करते हुए कहा है कि न्यायाधिकरण और उच्च न्यायालय ने उपार्जन उम्र की गणना करते समय गलत सिद्धांत अपनाया था। उच्चतम न्यायालय ने विधवा महिला को एक लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश देते हुए कहा है कि आर्थिक नुकसान का आकलन करते समय किसी व्यक्ति की उम्र और आर्थिक स्थिति के अलावा भविष्य में उसकी प्रोन्नति और वेतन वृद्धि के पहलू पर भी ध्यान देना चाहिए। 
 
सराफेसी कानून के नोटिस प्रावधान की व्याख्या 
 
उच्चतम न्यायालय ने संपत्ति के एवज में लिया गया कर्ज नहीं चुका रहे कर्जदार और उसके गारंटर के खिलाफ सराफेसी कानून के तहत कार्रवाई के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया को स्पष्ट किया है। न्यायालय ने केनरा बैंक बनाम अमरेंदर वाद का निपटारा करते हुए कहा है कि कर्ज में फंसी संपत्ति की बिक्री के बारे में कर्जदार को सूचना देने के साथ ही समाचारपत्रों में सार्वजनिक नीलामी की सूचना प्रकाशित कराना सही है। इससे पहले आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने कहा था कि दोनों सूचनाओं में एक महीने का अंतराल रखना होगा। लेकिन उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के फैसले को खारिज करते हुए कहा है कि कर्जदार को निजी स्तर पर जानकारी देने के 30 दिनों बाद सार्वजनिक नीलामी की सूचना देने का कोई औचित्य नहीं है। 
Keyword: supreme court, high court,,
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