बिजनेस स्टैंडर्ड - औपचारिक अर्थव्यवस्था में रोजगार का सृजन
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औपचारिक अर्थव्यवस्था में रोजगार का सृजन

आकाश प्रकाश /  March 15, 2017

 सरकार को आगामी राजस्व सुधार को रोजगार निर्माण में लगाकर असंगठित क्षेत्र में हुए रोजगार के नुकसान की भरपाई करने का तरीका तलाश करना होगा। विस्तार से बता रहे हैं आकाश प्रकाश 

 
नोटबंदी यकीनी तौर पर एक विवादास्पद कदम था। आलोचक कहेंगे कि इसकी बदौलत कोई काला धन उजागर नहीं हुआ। सारी नकदी बैंक में जमा हो गई और भ्रष्टाचार पर भी इसका कोई दूरगामी असर नहीं दिखा। अब नकदी चलन में वापस आ रही है और भ्रष्टों की मांग भी उसी अनुपात में है। वहीं नोटबंदी के समर्थक बढ़ते डिजिटल भुगतान, नकदी के आगमन के चलते कम ब्याज दर और कर दायरे में इजाफे की दलील सामने रखेंगे। 
 
दोनों बातें अपनी-अपनी जगह सही हैं। परंतु नोटबंदी के दो स्पष्ट लाभ हैं इसमें भी मोटे तौर पर काले धन से लड़ाई ही अहम है। इसने वित्तीय बचत का आकर्षण बढ़ाया है। हर तरह की वित्तीय परिसंपत्ति में जबरदस्त आवक नजर आ रही है क्योंकि घरेलू बचत अब सोने, नकदी और अचल संपत्ति से शेयर, बॉन्ड और बैंक जमा की ओर रुख कर रही है। अधिकांश बैंकों का मानना है कि 35 से 40 फीसदी तक जमा नकदी उनके पास बरकरार रहेगी। एक बार औपचारिक वित्तीय तंत्र में आगमन के बाद नकदी अपना रास्ता खुद तलाश कर लेगी। इससे लागत कम होगी और भारतीय कंपनियों को पूंजी सस्ती मिलेगी और विदेशी पूंजी पर निर्भरता कम होगी।
 
दूसरा स्पष्टï बदलाव है अर्थव्यवस्था को बड़े पैमाने पर औपचारिक बनाना। नोटबंदी, जीएसटी, तीन लाख रुपये से ऊपर नकद लेनदेन पर रोक आदि कदमों ने अर्थव्यवस्था में नकदी का इस्तेमाल सीमित किया। असंगठित क्षेत्र पर इसका दबाव साफ नजर आ रहा है। यह वह क्षेत्र है जो नकद लेनदेन करता है और कर नहीं चुकाता है। देश की अर्थव्यवस्था में असंगठित क्षेत्र की हिस्सेदारी 40 फीसदी है। कुल श्रम शक्ति का तकरीबन 75 फीसदी इसमें लगा है। सारी रोजगार वृद्घि यहीं सीमित है। केवल यही कंपनियां कम कुशल कर्मचारियों को रोजगार दे सकती हैं। 
 
दुर्भाग्यवश इस क्षेत्र की अधिकांश कंपनियों की मुख्य प्रतिस्पर्धी बढ़त थी उनकी कर वंचना की क्षमता और न्यूनतम वेतन, श्रम कानूनों आदि की अवहेलना करना। तकनीक और पैमाने के अभाव में संगठित क्षेत्र के मुकाबले का यही तरीका है। काले धन के खिलाफ कार्रवाई लड़ाई उनके लिए झटका साबित हुई। ऐंबिट जैसे विभिन्न ब्रोकरों द्वारा किए गए सर्वे ने दिखाया कि छोटे और मझोले उद्यम आज भी अपने वेंडरों, श्रमिकों और इन्वेंटरी के लिए पर्याप्त नकदी जुटा पाने में संघर्ष कर रहे हैं। सभी इकाइयां कामगारों को बैंक खातों के जरिए भुगतान करें यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है। आगे चलकर सभी एसएमई को कहा जाएगा कि वे अपने वेंडरों और कामगारों को ऑनलाइन और खाते के जरिये भुगतान करें। इससे वे निगरानी में रहेंगे। जीएसटी का क्रियान्वयन तेज बदलाव के इस ढांचागत रुख को और मजबूत करेगा। तब अधिकांश कंपनियां औपचारिक अर्थव्यवस्था के बिना काम नहीं कर पाएंगी। नोटबंदी जहां काले धन और भ्रष्टïाचार के खिलाफ थी, वहीं मुझे नहीं पता कि इसका अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाने से कोई लेनादेना था या नहीं। 
 
अर्थव्यवस्था के तेजी से औपचारिक होने के कुछ संभावित असर क्या हो सकते हैं? स्पष्टï है कि असंगठित क्षेत्र में बड़े पैमाने पर नौकरियां जाएंगी क्योंकि असंगठित इकाइयों का काम तेजी से बड़े संगठित कारोबारियों के पास चला जाएगा। या फिर उनको भारी भरकम वेतन भत्ता देना होगा। इसके चलते कर्मचारियों की संख्या भी कम करनी होगी। सवाल यह है कि हर वर्ष श्रम शक्ति में इजाफा कर रहे एक करोड़ युवाओं को रोजगार कहां से मिलेगा? व्यापक तौर पर संगठित निजी क्षेत्र में रोजगार नहीं मिल पा रहा है क्योंकि तमाम रोजगार असंगठित क्षेत्र से आ रहे हैं। सूचना प्रौद्योगिकी और दूरसंचार जैसे क्षेत्रों में आने वाले वर्षों में श्रमिकों की संख्या कम हो सकती है। अचल संपत्ति क्षेत्र में गिरावट आने का असर उस क्षेत्र के रोजगार पर भी पड़ सकता है। यानी अर्थव्यवस्था के औपचारिक होते जाने का अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर होगा। 
 
इसके अलावा ऋण का नकारात्मक चक्र भी देखने को मिल सकता है। कई छोटे कारोबारियों की आर्थिक गतिविधियां सिमट जाएंगी। यह एनबीएफसी क्षेत्र के लिए कहीं अधिक बड़ी समस्या बन सकती है बजाय कि बैंकों के। अगर ये इकाइयां ज्यादा नकद लेनदेन करती रही हैं तो इस बात की संभावना नहीं है कि वे सरकारी बैंकों की बड़ी ग्राहक हों। बैंकों को भी ऋण को उचित ठहराने के लिए खातों का अंकेक्षण करना होगा। संपत्ति के समक्ष ऋण में दिक्कत होगी और अधिकांश एनबीएफसी के एसएमई फाइनैंस पोर्टफोलियो में भी। वहीं दूसरी ओर, एनबीएफसी के पास नकदी संभालने, उसका लेखाजोखा रखने की विशिष्टï क्षमता ऐतिहासिक रूप से चली आई है लेकिन आने वाले दिनों में इस बात का कोई खास महत्त्व नहीं रह जाएगा। क्या बैंक आने वाले दिनों में अर्थव्यवस्था के औपचारिक होते जाने के बीच इन ग्राहकों को बेहतर ढंग से संभाल सकेंगे? क्या एनबीएफसी की बढ़ती बाजार हिस्सेदारी रुक जाएगी? इस बारे में अवश्य विचार किया जाना चाहिए। 
 
इन कम कुशल कर्मियों का रोजगार जाने से निचले स्तर की खपत पर दबाव बनेगा। ऐसे में प्रीमियम उत्पादों की वृद्घि दर प्रभावित होगी। ऐसा दौर भी आ सकता है जब विभिन्न श्रेणियों के दरमियान वरीयता का रुझान कमजोर पड़ेगा। कंपनियां अपेक्षाकृत सस्ते उत्पादों पर अधिक ध्यान देंगी। ग्रामीण और अद्र्घशहरी उपभोक्ताओं के लिए कारोबार अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाएगा। जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था औपचारिक होती जाएगी सरकार का कर दायरा बढ़ता जाएगा। हम देखेंगे कि सरकार के पास तमाम संसाधन हैं जिन्हें वह बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य और शिक्षा आदि पर खर्च कर सकेगी जबकि राजकोषीय घाटा स्थिर रहेगा। सरकारी व्यय अगले कुछ समय तक अर्थव्यवस्था का वाहक बना रहेगा। इसके अलावा कर की स्थिति भी सकारात्मक बनी रहेगी। 
 
जब अर्थव्यवस्था में संगठित क्षेत्र के कारोबारियों की हिस्सेदारी बढ़ जाएगी तो इससे शेयर बाजार लाभान्वित होंगे। सूचीबद्घ शेयरों को भी इस बदलाव का फायदा मिलेगा। अर्थव्यवस्था के औपचारिक होने के कारण हमें मुनाफे और आय दोनों में सुधार देखने को मिलेगा। इसके अलावा कारोबारी जगत के प्रदर्शन में भी बिखराव नजर आएगा। कुछ कारोबारों में असंगठित क्षेत्र की हिस्सेदारी 50 फीसदी तक है। अन्य क्षेत्रों में उनकी मौजूदगी नहीं नजर आती। सही मायनों में शेयर कीमतों में उछाल अब नजर आएगी क्योंकि निवेशक उन कंपनियों पर दांव लगाने का प्रयास करेंगे जिनको अर्थव्यवस्था के औपचारिक होने का लाभ मिलेगा। कुलमिलाकर हमें देश की अर्थव्यवस्था का तेजी से औपचारिक होता परिदृश्य नजर आएगा। इससे संगठित और सूचीबद्घ क्षेत्रों को लाभ होग। सरकारी वित्त की स्थिति भी ठीक होगी लेकिन रोजगार के लिए यह नकारात्मक साबित होगा। सरकार को आने वाले राजस्व सुधार को रोजगार निर्माण की दिशा में मोडऩा होगा और कौशल विकास पर काम करना होगा।
Keyword: economy, राजकोषीय दायित्व एवं बजट प्रबंधन, एफआरबीएम, समिति, राजकोषीय परिषद, गठित,
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