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हल होगा मकसद?

संपादकीय /  March 15, 2017

 महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सवैतनिक मातृत्व अवकाश को 12 सप्ताह से बढ़ाकर 26 सप्ताह किए जाने की सराहना की है। परंतु आगे चलकर उनको लग सकता है कि मातृत्व लाभ अधिनियम 1961 में किए गए इस संशोधन से लंबी अवधि में स्त्री-पुरुष समानता का उद्देश्य शायद ही पूरा हो। यह विधेयक स्वास्थ्य मंत्रालय की इस अनुशंसा के अनुरूप है कि शिशु को कम से कम छह माह तक स्तनपान कराया जाना चाहिए। हमारे देश में यह बात बहुत ज्यादा अहम है क्योंकि यहां शिशु का स्वास्थ्य और उसका बचाव गहन चिंता का विषय है। समस्या शायद बढ़ी हुई छुट्टियों का दायरा उन वाणिज्यिक संस्थानों तक बढ़ाने में निहित है जहां कामगारों की संख्या 10 तक है। जिन संस्थानों में 50 से अधिक महिलाएं कार्यरत हैं वहां पालनाघर की सुविधा पहले से अनिवार्य है। हालांकि ये प्रावधान इस मायने में सराहना की वजह बन सकते हैं कि इनके चलते हमारा देश एक स्तर पर विकसित देशों के समकक्ष हो जाता है। कोई भी व्यक्ति जो कम कर्मचारियों वाला संस्थान चला रहा हो उसे यह बात पता होती है कि किसी ऐसे कर्मी को आधे साल तक पूरा वेतन देना पूरी तरह अव्यावहारिक है जो काम पर नहीं आ रहा हो। निरंतर प्रतिस्पर्धी होते और तेजी से बदलते कारोबारी परिदृश्य में छोटे और मझोले उद्यमों से तार्किक ढंग से यह उम्मीद नहीं की जा सकती है कि वह उत्पादकता को पहुंचने वाले ऐसे नुकसान को सहन कर सके। इसलिए यह अनुमान लगाना सहज है कि उक्त प्रावधान छोटे आकार के उद्यमों को महिलाओं को काम पर रखने के लिए हतोत्साहित करेगा या महिला कर्मचारियों की छंटनी की प्रक्रिया को या उनको मौजूदा वेतन से कम वेतन भत्ते दिए जाने को प्रोत्साहित करेगा। 

 
चूंकि छोटे कारोबार, खासतौर पर स्टार्टअप अक्सर महिलाओं के लिए श्रम शक्ति में प्रवेश द्वार का काम करते हैं इसलिए इस तरह का भेदभाव स्त्री-पुरुष समानता के उद्देश्य को अपूरणीय क्षति पहुंचाएगा। हमारे देश में पहले ही श्रमशक्ति में महिलाओं की भागीदारी 27 फीसदी के कमतर स्तर पर है। संसद अगर मातृत्व अवकाश की सीमा को ऊंचा करती और इसे उन संस्थानों तक सीमित करती तो बेहतर होता जिनकी वित्तीय स्थिति दुरुस्त है और जो कर्मचारियों की अच्छी संख्या के चलते इस स्थिति को झेल सकते हैं। उदाहरण के लिए नेस्ले इंडिया के लिए अपनी महिलाकर्मियों को 24 सप्ताह का सवैतनिक मातृत्व अवकाश देना कोई मुश्किल नहीं होगा। उसने गत वर्ष फरवरी में ऐसी घोषणा भी कर दी थी। लेकिन इस बहुराष्टï्रीय कंपनी में 7,000 कर्मचारी हैं। 
 
एक आलोचना यह भी है कि इसके लिए ऊंचा मानक तय करने से लाभार्थियों की दो श्रेणियां तैयार होंगी। लेकिन इसका उत्तर यह है कि ऐसी श्रेणियां पहले से मौजूद हैं क्योंकि कानून केवल संगठित क्षेत्र को ही ध्यान में रखता है। असंगठित क्षेत्र की असंख्य स्त्रियां इसके दायरे में नहीं। महिला अधिकारों के मामले में पश्चिमी देशों खासतौर पर उत्तरी यूरोप के देश अग्रणी हैं। लेकिन यह जानना अहम है कि वहां के अत्यंत उदार मातृत्व और पितृत्व लाभ आबादी बढ़ाने की मंशा से संचालित हैं। उस दृष्टिï से उन्हें भारत में लागू नहीं किया जा सकता है जो दुनिया का दूसरी सबसे अधिक आबादी वाला देश है। नए कानून का सराहनीय पहलू यह है कि इसमें संबंधित लाभ दो बच्चों तक सीमित हैं। इसकी चीन की एक संतान नीति से तुलना करते हुए काफी आलोचना की गई। लेकिन सरकार को परिवार नियोजन तय करने का अधिकार है। इसका संबंध महिलाओं के स्वास्थ्य की रक्षा से भी है। गर्भनिरोध को लेकर जागरूकता अभियान इस संदेश को और प्रसारित करने में मदद करेगा।
Keyword: women, सवैतनिक मातृत्व अवकाश,
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