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केंद्र-राज्य में भाजपा सरकार वादे पूरा करने को तैयार?

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  March 14, 2017

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में जो जबरदस्त जीत मिली है उसने केंद्र सरकार को काफी राजनीतिक अवसर मुहैया कराया है। वर्ष 2019 के आम चुनाव में उसे हरा पाना मुश्किल है जब तक कि वह वास्तव में बहुत बड़ी गड़बडिय़ां न कर बैठे। यानी भाजपा शासन के शुरुआती दौर से अब तक पहली बार उसके पास सार्थक बदलाव करने का अवसर है। 

 
कुछ मायनों में भाजपा रक्षात्मक भी रही क्योंकि उसे केंद्र में सत्ता संभालने के एक साल के भीतर दिल्ली में भारी पराजय का सामना करना पड़ा था। उसके बाद वर्ष 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव में भी उसे हार का सामना करना पड़ा था। परंतु उत्तर प्रदेश में इस शानदार जीत के साथ पार्टी के सामने अब कोई खास बाधा नहीं रह गई है। इसके अलावा विपक्ष पर उसने एक व्यापक श्रेष्ठïता कायम कर ली है, यह बात भी सबको साफ नजर आई। नोटबंदी  जैसा कदम जो राजनीतिक रूप से दिक्कतदेह हो सकता था उसने पार्टी को जबरदस्त फायदा पहुंचाया। 
 
अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास अवसर है कि वह अपने कार्यकाल के शुरुआती दौर की खामियों से परे जाकर व्यापक सुधारों पर विचार करें। ये सुधार उनको उन वादों को पूरा करने में मदद करेंगे जो उन्होंने अपने कार्यकाल के आरंभिक दौर में किए थे। सरकार ने कुछ अहम सुधार पेश भी किए हैं। दिवालिया विधेयक और वस्तु एवं सेवा कर इसका उदाहरण हैं। लेकिन इसके बावजूद सरकार के सत्ता में आने के बाद जो उम्मीद बंधी थी उससे दूरी बनी हुई है। 
 
सरकार पर सुधार का दबाव कम होता गया क्योंकि लोगों को लगने लगा कि वह या तो इच्छुक नहीं है या फिर वह इनका क्रियान्वयन कर नहीं पा रही है। परंतु सरकार की कानून बनाने की क्षमता काफी हद तक उसके राजनीतिक महत्त्व पर निर्भर करती है। इस समय मौजूदा सरकार का राजनीतिक महत्त्व उफान पर है। ऐसे में सुधार की उम्मीदों का जोर पकडऩा लाजिमी है। 
 
कहने की आवश्यकता नहीं कि कौन से व्यापक सुधारों की उम्मीद की जा रही है। लेकिन फिर भी उनकी एक संक्षिप्त सूची पर नजर डालते हैं: केंद्र में श्रम कानून सुधार की दिशा में कुछ आरंभिक और छोटे कदम उठाए गए हैं। सफेद हाथी बन चुके कुछ सरकारी उद्यमों का निजीकरण किया जाना चाहिए। प्रत्यक्ष कर सुधार, कृषि आय की समस्या को हल करना, सार्वजनिक वितरण प्रणाली और भारतीय खाद्य निगम में बदलना और स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए उचित व्यवस्था। इनमें से कई का जिक्र भाजपा के 2014 के घोषणापत्र में था। इसके अलावा विभिन्न केंद्रीय मंत्री और प्रधानमंत्री भी समय-समय पर इनका जिक्र करते रहे हैं। कुछ लोग कहेंगे कि राजनीतिक पूंजी न गंवाने के डर से ही सरकार अब तक इस दिशा में आगे नहीं बढ़ रही थी। लेकिन अब तो वह बाधा भी नहीं रह गई। 
 
यह बात ध्यान देने लायक है कि भाजपा के वक्तव्यों के मुताबिक पार्टी को लग रहा है कि उत्तर प्रदेश में उसकी जीत प्रशासन और रोजगार सृजन की जीत है। काफी हद तक 2014 की तर्ज पर। अब तो सरकार के सबसे कट्टर समर्थकों को भी यकीन हो चुका होगा कि यथास्थिति के चलते रोजगार नहीं तैयार हो पा रहे हैं। कम से कम मतदाताओं की उम्मीद के मुताबिक तो नहीं ही। भारत को अगर रोजगार पैदा करने हैं तो प्रतिस्पर्धी क्षमता में इजाफा करना होगा। उसके लिए कहीं अधिक सख्ती से कार्यक्रम चलाने होंगे ताकि ढांचागत बदलाव लाए जा सकें। 
 
दूसरे शब्दों में कहें तो उत्तर प्रदेश का नतीजा न केवल सुधार की वजह देता है बल्कि इससे भाजपा को यह भी याद आना चाहिए कि इन सुधारों को जल्द अंजाम देना कितना जरूरी है। दलील यह भी दी जा सकती है कि उत्तर प्रदेश चुनाव के नतीजों से भाजपा सत्ता में जरूर आई है लेकिन केंद्र में अंकगणित ज्यादा नहीं बदला है। दूसरे शब्दों में राज्य सभा में सरकार को फौरन कोई बढ़त नहीं मिलने वाली है। विपक्ष अभी भी मजबूत है और कुछ समय तक रहेगा। परंतु एक बात यह भी है कि भले ही सरकारें राज्य सभा में अल्पमत में हों लेकिन बड़ी चुनावी जीत से उन्हें संसदीय प्रबंधन में मदद मिलती है क्योंकि वे अपेक्षाकृत मजबूत रहती हैं। 
 
बहरहाल, एक तथ्य यह भी है कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में जीत के साथ देश के एक बहुत बड़े इलाके में भाजपा का शासन है। ऐसे में उसे केंद्र और राज्य के स्तर पर जिस तालमेल की आवश्यकता थी वह मिल चुका है। प्रधानमंत्री मोदी और सरकार को इसका फायदा उठाना चाहिए। उत्तर प्रदेश में प्रधानमंत्री ने जमकर प्रचार किया। उनका कहना यही था कि एक राष्ट्रीय पार्टी की सरकार राज्य के विकास को वह दृष्टिï देगी जो क्षेत्रीय दलों के बूते की बात नहीं। इसी प्रकार राज्य सरकार का नियंत्रण केंद्र सरकार को अपना एजेंडा लागू करने का अवसर देता है। मैंने पहले भी यह कहा है कि देश के उत्तर और पश्चिम में भगवा क्षेत्र देश के सकल घरेलू उत्पाद के एक बड़े हिस्से पर काबिज है। 
 
इसकी मदद से नरेंद्र मोदी की इच्छाओं को पूरा किया जा सकता है। इसमें बहुत अधिक राजनीतिक पूंजी की आवश्यकता नहीं है। जैसा कि उत्तर प्रदेश की जीत ने दिखाया वह चुनाव न भी लड़ रहे हों तो भी उनकी लोकप्रियता ही काफी है। ध्यान रहे कि उत्तर प्रदेश में भाजपा के पास मुख्यमंत्री पद का कोई चेहरा नहीं था और उनका सामना लोकप्रिय मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से था। अब केंद्र को नीतियां लागू करने में किसी बाधा का सामना नहीं करना होगा। प्रधानमंत्री ने इन राज्यों में मतदाताओं से यह वादा भी किया है कि अगर पार्टी केंद्र और राज्य दोनों जगह सत्ता में हो तो शासन बेहतर होता है। बेहतर नियामकीय तालमेल, राजकोषीय बिंदुओं पर साझा प्रतिबद्घता और जिम्मेदारी, सामाजिक और भौतिक बुनियादी ढांचे की साझेदारी आदि ऐसी बातें हैं जिनको भाजपा-शासित राज्य और केंद्र हासिल कर सकते हैं। पार्टी के पास अब यह सब करने की भरपूर क्षमता है। 
Keyword: election, उत्तर प्रदेश, विधानसभा चुनाव, प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी,
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