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चीन के रक्षा सुधार पर एक नजर

नितिन पई /  March 14, 2017

आने वाले कुछ वर्षों में चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी में जबरदस्त बदलाव देखने को मिलेगा। इससे सैन्य संतुलन भी चीन की ओर झुक जाएगा। विस्तार से बता रहे हैं नितिन पई

पिछले दिनों चीन के रक्षा आवंटन की खबर सुर्खियों में रही। उसका रक्षा आवंटन 10 खरब युआन यानी करीब 151 अरब डॉलर की राशि को पार कर गया। हालांकि धीमे आर्थिक अनुमानों के बीच यह सात फीसदी की धीमी गति से बढ़ रहा है। 

 
जैसा कि होता है विदेशी विश्लेषकों की शिकायत है कि यह आंकड़ा अस्पष्टï है और इसमें पेंशन, सैन्य शोध और विकास आवंटन को शामिल करना होगा। अगर ऐसा हुआ तो वास्तविक रक्षा व्यय 50 फीसदी अधिक होगा। वास्तव में जो भी रक्षा व्यय घोषित किया जाता है वह भी रक्षा नीति का ही हिस्सा है। आप अपने दुश्मनों को बताते हैं कि आप कितने मजबूत हैं और आप सामरिक नीति के मसले पर कितनी पारदर्शिता बरतना चाहते हैं। अमेरिका अपने शत्रुओं को यह दिखा कर रोक सकता है कि वह तकनीक पर कितना अधिक खर्च कर रहा है। वहीं दूसरी ओर चीन अपने लाभ के लिए रहस्य को इस्तेमाल करता है। 
 
हमें नहीं पता कि चीन रक्षा पर कितना खर्च कर रहा है लेकिन हमें कुछ बातें पता हैं: पहली बात, चीन का जोर समुद्री शक्ति बढ़ाने पर है और दूसरी बात, वह यह संकेत दे रहा है कि वह अमेरिका के साथ सैन्य व्यय में कोई प्रतिस्पर्धा नहीं करेगा। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि चीन की नौसैनिक शक्ति पश्चिमी प्रशांत सागर में अमेरिकी नौसेना का मुकाबला करेगी। ऐसा करके वह हिंद महासागर में  अपनी ताकत दिखाएगा। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की नौसेना के पास पहले ही पनडुब्बियों का बेड़ा है। इसके अलावा अमेरिकी नौसेना के बेड़े को चुनौती देने उसके पास एंटी-शिप मिसाइल भी है। अब वह सतह पर तैरने वाले बेड़े में निवेश कर रही है ताकि अपना दायरा और बढ़ा सके। 
 
भारतीय रक्षा क्षेत्र पिछले काफी समय से चीन की समुद्री क्षेत्र की कोशिशों से अवगत है लेकिन राष्ट्रपति शी चिनफिंग के कार्यकाल में सेना के गहन ढांचागत सुधारों को अंजाम दिया गया। भारत में जहां रक्षा स्टाफ के प्रमुख (सीडीएस) अथवा सशस्त्र बलों का अनुपात सुधारने पर बात चलती रही, वहीं राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने ऐसे बदलावों को अंजाम दिया जिनसे चीन की सेना की युद्घक क्षमता में नाटकीय बदलाव आया। इन बदलावों के बाद भारतीय रक्षा ढांचे की पूर्ण समीक्षा की जरूरत है। 
 
पीएलए के बदलावों पर एक नजर डालते हैं। पहली बात, सेना, नौसेना, वायुसेना और मिसाइल शक्ति का पुनर्गठन कर पांच संयुक्त थिएटर कमांड निर्मित की गईं। यह काम अमेरिका के तर्ज पर किया गया। ये कमांड सैन्य प्रमुखों के अलावा सीधे असैन्य-राजनीतिक नेतृत्व को रिपोर्ट करती हैं। यह तैयारी आधुनिक युद्घ से निपटने की दृष्टि से बहुत अच्छी है। दूसरी बात, केंद्रीय सैन्य आयोग, सैन्य हाई कमान का भी पुनर्गठन किया गया। इसके लिए पुरानी चार जनरल स्टाफ विभाग की व्यवस्था समाप्त की गई और शीर्ष नेतृत्व को 15 संगठनों पर सीधा नियंत्रण दिया गया। 
 
तीसरी बात, चीन सरकार ने 300,000 पीएलए कर्मियों को युद्घक तैयारी से हटाकर शांति के काम में लगा दिया। इनमें से अधिकांश सेना से हैं और आधे से अधिक अधिकारी हैं। यह कमी प्राय: उन टुकडिय़ों में की गई जो जंगी नहीं हैं। लेकिन यह भी संभव है कि कुछ लड़ाकू टुकडिय़ों को भी इस कटौती का सामना करना पड़े। चीन में यह सब तक हो रहा है जबकि पीएलए के वरिष्ठï देश भर में बीते कुछ सालों से लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। उनका कहना है कि उनकी पेंशन अपर्याप्त है और उसका भी भुगतान नहीं हो रहा है। वे बेहतर असैन्य रोजगार की भी मांग कर रहे हैं। पीएलए की पेंशन रैंक पर नहीं बल्कि नियुक्ति पर निर्भर करती है। दो सैनिक जो एक ही रैंक पर हों और जिन्होंने एक समान सेवा पूरी की हो उनकी पेंशन बहुत अलग हो सकती है। यह इस बात पर निर्भर करती है कि उनकी तैनाती ग्रामीण इलाके में थी या शहरी। राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने तमाम गतिरोधों के बावजूद पीएलए को क्षमता संपन्न बनाए रखा है। 
 
चौथी बात, राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को गति दी है। केंद्रीय सैन्य आयोग के दो पूर्व उपाध्यक्षों को गिरफ्तार किया गया जबकि 42 उच्चाधिकारियों पर कार्रवाई हुई। पीएलए के लिए फैक्टरियां चलाना, और अचल संपत्ति कारोबार संभालना अस्वाभाविक नहीं था। इन गतिविधियों से आने वाले राजस्व को वापस राजकोष में न भेजकर उसकी मदद से पीएलए की गतिविधियों की मदद की जाती और अधिकारियों आदि की जेबें भरी जातीं। अब यह चलन बंद किया जा रहा है। चीन ने इस दिशा में पहला कदम बढ़ा दिया है। 
 
दुर्भाग्य की बात यह है कि भारत इस पर कमोबेश यह प्रक्रिया देता आया है कि चीन ऐसा इसलिए कर पाता है क्योंकि वहां अधिनायकवादी शासन है। लेकिन हकीकत यह है कि भारत जैसे ही राजनीतिक और राजकोषीय दबाव का सामना करते हुए चीन सरकार ने सैन्य सुधारों को अंजाम दिया है। वे पूरी तरह देश हित में समर्पित होकर काम कर रहे हैं। करगिल समीक्षा समिति ने 15 साल जिस आवश्यकता पर जोर दिया था वह अब वह आज तक हमारी रक्षा योजना से नदारद है। अब इसे यहां तक सीमित कर दिया गया है कि केंद्र सरकार चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की नियुक्ति करती है या नहीं। यह बात तो और भी दुखद है कि एक और माउंटेन कोर तैयार करने को ही पीएलए की अगली तैयारी से निपटने के बराबर मान लिया जाता है। 
 
अब से कुछ वर्ष बाद भारत का मुकाबला सीमा पार एकदम नए तरह की तैयारी वाली सेनाओं से होगा। यह बात नौसेना और वायु सेना पर भी लागू होती है और हमारे संचार तंत्र पर भी। हम इस सिलसिले में नौकरशाही और राजनीतिक बहाने बना सकते हैं लेकिन हमें यह बात साफ समझ लेनी चाहिए कि हमारी मौजूदा सैन्य आधुनिकीकरण की कोशिश चीन की तुलना में एक दशक पीछे चल रही है। हमारी परमाणु क्षमता सीधे पारंपरिक हमलों को तो रोक सकती है लेकिन इसकी मदद से अप्रत्यक्ष संघर्ष को रोकना या भौगोलिक छाप में आ रही कमी को इसकी मदद से नहीं रोका जा सकता। ऐसे में कहा जा सकता है कि भले ही 1962 जैसी जंग न दोहराई जाए लेकिन हमें एक अलग किस्म की लड़ाई के लिए तैयार रहनी चाहिए। लेकिन हम तैयार नहीं हैं। 
 
(लेखक तक्षशिला संस्थान के सह संस्थापक और निदेशक हैं। यह एक स्वतंत्र शोध और शिक्षा केंद्र है जो जन नीति पर काम करता है।)
Keyword: defense, india, budget,,
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