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चीन-अमेरिका के खेल में भारत एकदम बेमेल

दोधारी तलवार
अजय शुक्ला /  March 12, 2017

गत जनवरी में अमेरिका के 45वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ग्रहण करते ही डॉनल्ड ट्रंप ने चीन को लेकर कड़ा रुख दिखाते हुए घोषणा की थी कि वह देश की सेना को इतना महान बनाएंगे कि कोई उसे चुनौती देने का साहस नहीं कर पाएगा। इसके बाद से ही अमेरिका में रोनाल्ड रीगन के कार्यकाल में होने वाले रक्षा खर्च से तुलना शुरू हो गई है। सन 1980 के दशक में उस व्यय ने तत्कालीन सोवियत संघ को इतना खर्च करने पर मजबूर किया कि वह दिवालिया होने के कगार पर चला गया। चीन की अर्थव्यवस्था सोवियत संघ की तुलना में कई गुना मजबूत है। वह इस पर क्या प्रतिक्रिया देगा? भारत के लिए इसके क्या निहितार्थ हैं। 

 
ऐसे किसी भी विश्लेषण के लिए पहले इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि ट्रंप के वादे को निभाने के लिए अमेरिका को कितनी राशि खर्च करनी होगी? उन्होंने रक्षा खर्च में 54 अरब डॉलर की भारी बढ़ोतरी करने का अनुरोध किया है। उनके पूर्ववर्ती बराक ओबामा ने सन 2010 में इराक से अपनी सेना वापस बुलानी शुरू की थी। उन्होंने देश के रक्षा व्यय को भी देश के सकल घरेलू उत्पाद के 4.7 फीसदी से कम करके 3.3 फीसदी कर दिया था। बजट में 22 फीसदी की यह कटौती अप्रत्याशित थी। 
 
वर्ष 2011 में ओबामा ने प्रमुख हथियार कार्यक्रमों में कटौती की जिनमें एफ-22 लड़ाकू विमान, सी-17 एयरलिफ्टर, मल्टिपल किल व्हीकल, कायनेटिक एनर्जी इंटरसेप्टर, एयरबोर्न लेजर और बचाव करने वाले हेलीकॉप्टर आदि शामिल थे। इससे आने वाले एक दशक में अमेरिका की 487 अरब डॉलर की बचत होने का अनुमान जताया गया लेकिन इससे उसकी युद्घक क्षमता भी काफी कम हुई। वर्ष 2012 में अमेरिकी सेना के खर्च में थोड़ी और कटौती कर दी गई। 
 
ट्रंप ने इस व्यय में बढ़ोतरी का अनुरोध किया है लेकिन इसका जमकर विरोध होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि उक्त राशि पर्यावरण संरक्षण एजेंसी  और विदेश विभाग से कटौती करके ली जाएगी। अगर अमेरिकी संसद उनका अनुरोध मान भी लेती है तो भी पेंटागन के तमाम लक्ष्य पूरे नहीं होंगे। वह दुनिया भर में विश्वसनीय पहुंच नहीं बना पाएगा। न ही आतंकी ठिकानों पर ड्रोन हमले कर पाएगा, न चीन को संतुलित करने के लिए एशिया में दखल दे पाएगा। जॉन मैकेन जैसे वरिष्ठï सीनेटर ने ट्रंप की आलोचना की है क्योंकि उन्होंने नौसेना के जहाज 274 से बढ़ाकर 350 करने की मांग नहीं की। न ही उन्होंने एफ-35 ज्वाइंट स्ट्राइक फाइटर विमान बढ़ाने को कहा। 
 
वॉल स्ट्रीट जर्नल अमेरिकी सेना की ताकत को एक भ्रम बताते हुए लिखता है कि उसकी नौसेना के दोतिहाई एफ/ए-18 लड़ाकू विमान और तीन चौथाई मरीन उडऩे और लडऩे की स्थिति में नहीं हैं। वायु सेना में 700 पायलटों और 4,000 रखरखाव कर्मियों की कमी है। सेना का केवल एक तिहाई हिस्सा 30 दिन के भीतर जंगी तैयारी में है। 470,000 जवानों के साथ दूसरे विश्वयुद्ध के बाद यह सबसे छोटी सेना है। भारतीय सेना की तुलना में एक तिहाई। 
 
टं्रप ने एक लोकप्रिय विचार यह भी पेश किया था कि वह जापान और नाटो सहयोगी देशों से कहेंगे कि वे अब उसके बोझ में हिस्सा बंटाना शुरू करें। यह सच है कि अधिकांश नाटो सहयोगी जीडीपी का कम से कम दो फीसदी रक्षा पर खर्च करने के अपने दायित्व का उल्लंघन करते हैं लेकिन वे अगर इसे निभाएं भी तो अमेरिका को इससे कोई फायदा नहीं होने वाला। स्टीफन एम वाल्ट ने हाल ही में विदेश नीति संबंधी एक आलेख में कहा था कि नाटो का साझा अभी ही इकलौते नजर आ रहे शत्रु रूस से अधिक है। नाटो के यूरोपीय सहयोगियों की आबादी रूस से चार गुना है। उनका संयुक्त जीडीपी उससे 12 गुना है और रक्षा पर वे उससे पांच गुना अधिक व्यय करते हैं। जाहिर है दिक्कत संसाधनों की नहीं बल्कि योजना और तालमेल की है। ट्रंप को समझ में आ जाएगा कि नाटो में अमेरिका की मौजूदगी गठबंधन के प्रति प्रतिबद्धता के सिवा कुछ नहीं है। उधर चीन ने अगले वर्ष रक्षा बजट में महज 7 फीसदी इजाफे की बात कही है जो गत एक दशक में न्यूनतम है। चीन का आधिकारिक रक्षा बजट अब 174 अरब डॉलर हो गया जो अमेरिका के एक तिहाई के बराबर है। अगर 50 फीसदी अघोषित हिस्से को भी इसमें जोड़ दिया जाए तो भी चीन का रक्षा बजट 261 अरब डॉलर तक पहुंचता है जो अमेरिका के आधे से भी कम है। चीन अपनी अपेक्षाकृत सैन्य कमतरी की भरपाई स्थानीय और क्षेत्रीय स्तर पर प्रतिक्रिया के जरिये देता है। 
 
सैन्यकर्मियों की कम लागत और तमाम रक्षा उपकरण अपने यहां विकसित करने के कारण वह लागत के मोर्चे पर भी पेंटागन से बेहतर स्थिति में है। चीन का रक्षा व्यय उसके जीडीपी का महज 1.3 फीसदी है। उसकी सालाना आर्थिक वृद्घि  7 फीसदी की बढ़ोतरी झेल सकती है। यह बात अमेरिका पर लागू नहीं होती। उसकी आर्थिक वृद्घि दर 2.4 फीसदी सालाना है। ऐसे में वह ट्रंप की चाह के मुताबिक रक्षा व्यय बरदाश्त नहीं कर पाएगा। 
 
इस बीच भारत की बात की जाए तो वर्ष 2017-18 में उसका रक्षा बजट 53.5 करोड़ डॉलर रहा। यह राशि उतनी ही है जितनी बढ़ोतरी ट्रंप अमेरिका के सालाना बजट में चाहते हैं। यह हमारी जीडीपी के 2.14 फीसदी के बराबर थी। ऐसे में सरकार अधिक व्यय कर सकती है या नहीं यह एक राजनीतिक प्रश्न है। अगर करती है तो उसके लिए अतिरिक्त धन कहां से आएगा? देश के बजट का आधा से अधिक हिस्सा कार्मिक क्षेत्र पर व्यय होता है। चौथाई से भी कम बजट पूंजीगत व्यय के हिस्से है। नए हथियारों की खरीद हम बाहर से ही करते हैं ऐसे में भारत के लिए यह खरीद चीन की तुलना में खासी महंगी है। चीन के पड़ोस में भारत उसका प्रतिद्वंद्वी है लेकिन हमारे सीमित संसाधन, मेक इन इंडिया का क्रियान्वयन नहीं होना और सामरिक नीति की अस्पष्टïता हमें हाशिये पर धकेलने वाली बातें हैं।
Keyword: america, ट्रंप, आईटी, अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप आव्रजन सुधार नीति,
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