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जीत से बढ़ी जिम्मेदारी

संपादकीय /  March 12, 2017

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में जबरदस्त चुनावी जीत के बाद समूचे उत्तर भारत पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बादशाहत कायम है। इससे पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) कभी भी उत्तर प्रदेश में इतनी सीटें जीतने में कामयाब नहीं हो सकी थी जितनी कि इस बार उसे मोदी के नेतृत्व में मिलीं। यह जीत मोदी के बतौर प्रधानमंत्री पांच वर्षीय कार्यकाल के ऐन बीच में मिली है। इसे उनके शासन पर मध्यावधि जनमत के रूप में सहज ही देखा जा सकता है। चुनाव परिणाम इस तथ्य को रेखांकित करता है कि मोदी आज देश में सबसे बड़े कद के नेता हैं और भाजपा इकलौता राजनीतिक ध्रुव है। कांग्रेस को पंजाब में जीत मिली और गोवा तथा मणिपुर में वह सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। हालांकि मोदी और अमित शाह ने उत्तर प्रदेश में जो जीत हासिल की उसकी तुलना में कांग्रेस का प्रदर्शन फीका ही लग रहा है। 

 
भाजपा को कुल 312 सीटों पर जीत मिली। उसने वर्ष 2012 के अपने पिछले प्रदर्शन में 265 सीटों का इजाफा किया। उत्तराखंड में पार्टी ने 57 सीटें जीत कर अपनी स्थिति और मजबूत की। देश भर में भाजपा की बढ़ती लोकप्रियता और कांग्रेस का लगातार पराभव स्पष्टï महसूस किया जा सकता है। ऐसी कई वजह हैं जिनके चलते उत्तर प्रदेश चुनाव के नतीजे इस बार आकर्षण का केंद्र हैं। मसलन यह प्रदर्शन वर्ष 2014 के आम चुनाव में मिली जीत की तुलना में भी बहुत बेहतर है। उस वक्त भाजपा को लोकसभा में 70 सीटों पर जीत मिली थी। यह एक जबरदस्त उपलब्धि है। खासतौर पर एक ऐसे राज्य में जो जातीय गुणा-गणित में उलझा हुआ है और जहां जाति आधारित क्षेत्रीय दल सक्रिय हैं। बहरहाल कुलमिलाकर ऐसा लगता है कि मोदी विरोधियों समेत तमाम लोगों को आश्वस्त करने में सफल रहे। गरीबों के मन में वह एक बेहतर, समृद्घ और आकांक्षा से भरपूर भविष्य की उम्मीद जगाने में कामयाब रहे। उनकी यह जीत राज्य सभा का गुणाभाग भाजपा के पक्ष में ला देगी। हालांकि ऐसा तत्काल नहीं होगा। इसके अलावा उत्तर प्रदेश की जीत मोदी और उनकी पार्टी के लिए आवश्यक थी क्योंकि अब उनकी निगाहें वर्ष 2019 के आम चुनाव पर हैं। 73 लोकसभा सीटें देकर राज्य ने वर्ष 2014 की जीत में अहम भूमिका निभाई थी। आर्थिक नीति निर्माण की दृष्टिï से देखें तो चुनाव के नतीजे मजबूत हो चले मोदी के कंधों पर और अधिक बोझ डालते हैं। अब वह आसानी से अगले आम चुनाव में दोबारा चुने जाने के बारे में सोच सकते हैं। अब उनसे यह उम्मीद भी बढ़ गई है कि वह आर्थिक मोर्चे पर बेहतर प्रदर्शन करेंगे। इसमें आय, रोजगार, स्वास्थ्य और शिक्षा आदि क्षेत्र शामिल हैं। 
 
यह उम्मीद भी होगी कि मोदी और उनकी पार्टी इस नई राजनीतिक पूंजी का इस्तेमाल करते हुए कुछ जरूरी क्षेत्रों में कड़े राजनीतिक फैसले करेंगे। इसमें स्थानीय विनिर्माण पर ध्यान केंद्र्रित रखते हुए विदेशी निवेश के ढांचे को उदार बनाना, कर्ज के बोझ से त्रस्त बैंकों की हालत सुधारना आदि शामिल हैं। नोटबंदी के कदम को भी इस चुनाव ने एक तरह से स्वीकार कर लिया है। ऐसे में सरकार को यह प्रोत्साहन मिल सकता है कि वह काले धन पर नए सिरे से हमलावर रुख अपनाए। इसके अलावा वह औपचारिक अर्थव्यवस्था का दायरा बढ़ाने संबंधी कदम लगातार उठा सकती है। इसके समांतर ही अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को सीमित किया जाएगा। यह विचार तो सबके मन में होगा कि मोदी खुद को पूरे देश का प्रधानमंत्री समझेंगे, न कि किसी एक राजनीतिक दल अथवा किसी खास धर्म का पालन करने वाले समुदाय के। 
Keyword: election, उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव,,
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