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स्टेंट हुआ यदि सस्ता तो दूसरे खर्च करेंगे खस्ता

वीणा मणि और प्रिया नायर /  03 12, 2017

बेहतर मार्जिन के फेर में बाजार से हटाए गए स्टेंट

भरपाई के लिए अस्पताल दूसरे खर्च में इजाफा करें तो मरीज कर सकते हैं एनपीपीए हेल्पलाइन में शिकायत

पिछले महीने तक जिस एंजियोप्लास्टी में 1.80 लाख रुपये खर्च हो रहे थे, तो अब वह खर्च घटकर 1.30 लाख रुपये ही रह जाने की उम्मीद है। इसकी वजह सरकार का वह ऐलान है, जिसके तहत चिकित्सा उपकरण के तौर पर इस्तेमाल होने वाले स्टेंट की अधिकतम कीमत तय कर दी गई है। सरकारी आदेश के बाद अभी तक 80,000 रुपये में बिक रहा कॉरोनरी स्टेंट केवल 29,600 रुपये में मिल जाना चाहिए। लेकिन अगर अस्पताल आपसे कह दे कि उसके पास स्टेंट है ही नहीं? उस सूरत में वितरकों से स्टेंट मंगाना बहुत मुश्किल हो सकता है क्योंकि ज्यादातर वितरक स्टेंट निर्माताओं से बेहतर मार्जिन हासिल करने के फेर में बाजार से स्टेंट हटा चुके हैं।

सरकार ने कीमत तय करने का कदम इसीलिए उठाया ताकि आम भारतीय को कम से कम कीमत में स्टेंट मिल सके। लेकिन सवाल उठता है कि इसके वांछित परिणाम मिल पाएंगे या नहीं यानी वास्तव में स्टेंट सस्ता मिलेगा या नहीं। एक तरफ तो चुनौती यह है कि स्टेंट को किफायती बना दिया जाए और दूसरी तरफ बाजार में उसकी पर्याप्त आपूर्ति भी कम टेढ़ी खीर नहीं है। फिलहाल अस्पताल और विनिर्माता एक दूसरे पर तोहमत जडऩे में जुटे हुए हैं।

अस्पतालों और डॉक्टरों ने राष्ट्रीय औषधि मूल्य नियंत्रण प्राधिकरण (एनपीपीए) से कहा है कि कंपनियां स्टेंट की आपूर्ति नहीं कर रही हैं और इससे बाजार में उनकी किल्लत पैदा हो रही है। लेकिन कंपनियों का कहना है कि अस्पताल महंगे स्टेंट की मांग ही नहीं कर रहे हैं। राज्य दवा नियामकों को भी यह सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है कि उन सभी के राज्यों में महंगे स्टेंट पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध रहें। दवा मूल्य नियंत्रक ने आदेश का पालन नहीं करने वाले अस्पतालों और विनिर्माताओं की धर-पकड़ के लिए एक हेल्पलाइन भी शुरू कर दी है। लेकिन सरकार के इस कदम के बाद एक नए प्रकार का डर घर करता जा रहा है। इस बात का अंदेशा जताया जा रहा है कि अस्पताल अब मरीज के कमरे के किराये, डॉक्टर के शुल्क, ऑपरेशन थिएटर के शुल्क आदि में इजाफा कर सकते हैं। कॉरोनरी स्टेंट स्वास्थ्य बीमा के तहत जीवन रक्षक दवाओं की श्रेणी में आते हैं। भारत में जितने स्टेंट का इस्तेमाल होता है, उनमें लगभग 70 प्रतिशत विदेश से मंगाए जाते हैं। स्टेंट बनाने वाली नामी कंपनियों में ऐबट, बॉस्टन साइंटिफिक और मेडट्रॉनिक शामिल हैं। 

नैशनल इंटरवेंशनल काउंसिल (एनआईसी) के आंकड़ों के अनुसार शल्य चिकित्सा में स्टेंट के इस्तेमाल का चलन पिछले पांच सालों में खासा बढ़ गया है। बजाज आलियांज जनरल इंश्योरेंस में स्वास्थ्य बीमा प्रमुख अभिजित घोष कहते हैं, 'नियामकीय ढांचे का अभाव है, जिसकी वजह से मरीज को स्टेंट की 10 से 1,000 फीसदी तक अधिक कीमत चुकानी पड़ती है। यही वजह है कि ऑपरेशन का खर्च बढ़कर करीब 2 से 2.5 लाख रुपये तक हो जाता है। सरकार का आदेश तत्काल प्रभाव से लागू हो गया है, जिससे स्टेंट की कीमत लगभग 85 प्रतिशत तक कम हो गई है। इससे पूरी प्रक्रिया पर खर्च  25-30 फीसदी तक कम हो जाएगा।'

दवा कीमत पर नियंत्रण करने वाले नियामक द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार निजी और सरकारी अस्पतालों को स्टेंट तय की गई कीमत पर या उससे कम कीमत पर ही मुहैया कराने होंगे। एनपीपीए के आदेश में यह भी कहा गया है कि अस्पतालों को स्टेंट का बिल अलग से देना होगा। अगर कोई अस्पताल कहता है कि उसके पास स्टेंट नहीं है तो मरीज एनपीपीए की हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज करा सकता है। दिल्ली में मैक्स अस्पताल और मुंबई में लीलावती अस्पताल पर स्टेंट की अधिक रकम वसूलने का आरोप है। इन शिकायतों के बाद इस समय एनपीपीए दोनों अस्पतालों की जांच कर रहा है। स्टार हेल्थ ऐंड अलायड इंश्योरेंस के कार्यकारी निदेशक एस प्रकाश कहते हैं, 'इससे एंजियोप्लास्टी पर खर्च कम करने में मदद मिलेगी और ग्राहकों के लिए स्वास्थ्य बीमा का प्रीमियम भी कम हो जाएगा, लेकिन देखने वाली बात यह होगी कि अस्पतालों की क्या प्रतिक्रिया होती है।'

स्टेंट की कीमत तो केवल एक पहलू भर है। इलाज में दूसरे पहलू भी हैं, मसलन व्यावसायिक शुल्क, दवा, कमरे का किराया, डॉक्टर की फीस आदि। अस्पतालों द्वारा लिए जाने वाले पैकेज खर्च में ये सभी शामिल होते हैं। चूंकि एनपीपीए के आदेश में केवल स्टेंट की कीमत पर अंकुश लगाने की बात कही गई है, इसीलिए अस्पताल दूसरे खर्च बढ़ा सकते हैं। इस तरह स्टेंट की कीमत तो कम हो जाएगी, लेकिन कुल हेल्थ पैकेज में उतनी कमी नहीं आएगी। 

तमिलनाडु के एक वितरक कहते हैं, 'मैं महंगे स्टेंट अपने पास ही रख रहा हूं। मुझे उम्मीद है कि कंपनी से मुझे बेहतर मार्जिन आदि हासिल हो जाएगा। ऐसा नहीं हुआ तो मैं स्टेंट कंपनी को वापस कर दूंगा।' हालांकि एनपीपीए अधिकारियों का मानना है कि वितरक चाहकर भी आपूर्ति श्रृंखला पर असर नहीं डाल सकते हैं। जब मूल्य सीमा तय हुई थी तब वितरकों को स्टेंट पर 16 फीसदी मार्जिन मिल रहा था। लेकिन अब उन्हें बमुश्किल 6 फीसदी मार्जिन मिलने की ही आसार नजर आ रहे हैं। इस फैसले से बीमा कंपनियों की रकम भी बच सकती है क्योंकि अब मरीज के इलाज पर आने वाला खर्च भी कुछ कम हो जाएगा। एक बीमा ब्रोकर ने कहा, 'बीमा कंपनियां अस्पताल के पैकेज के लिए मोल-भाव कर सकते हैं। लेकिन पर्याप्त और अच्छी क्षमता वाला अस्पताल अन्य खर्चे बढ़ा सकता है।' 
Keyword: pharma, medicine, stent,,
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