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दलहन आयात शुल्क पर विचार

संजीव मुखर्जी और दिलीप कुमार झा / नई दिल्ली/मुंबई March 10, 2017

इस सीजन में दलहन के भारी उत्पादन से ऐसी स्थिति पैदा हो गई है कि किसानों को अपनी उपज के दाम न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) जितने भी नहीं मिल रहे हैं,  लेकिन आयात पूरे जोर-शोर से हो रहा है। इस वजह से कृषि मंत्रालय दालों पर आयात शुल्क लगाने के बारे में विचार कर रहा है। हालांकि पिछले एक दशक से दलहनों का बिना किसी शुल्क के आयात हो रहा है। 

 
हाल में केंद्र सरकार के शीर्ष मंत्रियों की बैठक हुई थी। यह बैठक आयातित दालों के लिए फ्यूमिगेशन नियमों में ढील देने से संबंधित मसलों पर चर्चा को लेकर हुई थी। इसी बैठक में दालों के सस्ते आयात का मसला भी उठा। देश में इस साल जनवरी से अब तक दलहन का कुल आयात 7 से 8 लाख टन अनुमानित है, जिसमें पीली मटर का हिस्सा करीब 80 फीसदी हो सकता है। जनवरी में चने का थोड़ा आयात हुआ था। उस समय घरेलू फसल की आवक शुरू नहीं हुई थी। अब घरेलूू आवक तेज हो गई है, जिससे आयातक नए अनुबंध नहीं कर रहे हैं। 
 
बैठक में एक सुझाव यह दिया गया कि दलहन पर आयात शुल्क बढ़ाया जाए, ताकि घरेलू स्तर पर उत्पादित दलहनों की किसानों को अच्छी कीमत मिले। अगर किसानों को अपनी दलहन उपज की अच्छी कीमत नहीं मिली तो इसका अगले खरीफ सीजन में बुआई पर असर पड़ेगा। सूत्रों ने बताया कि बैठक में यह फैसला लिया गया कि केंद्रीय कृषि मंत्रालय इस प्रस्ताव के बारे में संबंधित मंत्रालयों और विभागों से बातचीत करेगा और आयात शुल्क बढ़ाने का मसला वित्त मंत्रालय के सामने रखेगा। दलहन आयातकों का कहना है कि सरकार ने इस मसले पर उनसे कोई विचार-विमर्श नहीं किया है। पहले दलहन आयातकों ने लचीली स्टॉक सीमा का सुझाव दिया था, जिसमें कीमतों के आसमान में पहुंचने पर सीमा को कड़ा करने की बात कही गई थी। 
 
खरीफ सीजन में उत्पादित ज्यादातर दलहनों की कीमतें देशभर की बहुत सी मंडियों में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे हैं। इंडियन पल्सेज ऐंड ग्रेन्स एसोसिएशन (आईपीजीए) के वाइस चेयरमैन और मुंबई की एक दाल आयातक पंचम इंटरनैशनल के प्रबंध निदेशक बिमल कोठारी ने कहा, 'सरकार को आयात शुल्क लगाकर आपूर्ति नियंत्रित करने के लुघ अवधि के उपायों पर ही ध्यान नहीं देना चाहिए। दरअसल पीली मटर की भारत में बहुत ज्यादा कमी थी। देश में पीली मटर का उत्पादन 60,000 टन अनुमानित है, जबकि इसकी सालाना खपत 30 लाख टन है। इस अंतर की भरपाई आयात से की जानी जरूरी है। इसके साथ ही पीली मटर की कीमत भी सभी दालों में सबसे कम है। इस समय पीली मटर के दाम 25 रुपये प्रति किलोग्राम चल रहे हैं, जबकि अन्य दालों के दाम 45 से 60 रुपये प्रति किलोग्राम हैं। इसलिए सभी दालों पर आयात शुल्क लगाने से भारत में दालों की खपत पर असर पड़ेगा।'
 
कोठारी ने कहा कि इस समय देश में अरहर, मूंग और मसूर की आपूर्ति भरपूर है, इसलिए सरकार को इनके निर्यात की मंजूरी देनी चाहिए, ताकि किसानों को बेहतर कीमत मिल सके। इस समय इनकी कीमतें न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी नीचे चल रही हैं। भारत में उड़द की अच्छी पैदावार नहीं होती है, जिससे उड़द के दाम हाल के निचले स्तरों से ऊपर उठे हैं। इस समय उड़द के दाम 20 फीसदी या 10 रुपये प्रति किलोग्राम बढ़कर 60 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गए हैं, जो दो सप्ताह पहले 50 रुपये प्रति किलोग्राम थे। रोचक बात यह है कि सरकार के पास दालों के भंडारण के लिए पर्याप्त जगह नहीं है। इसके नतीजतन निजी कारोबारी दालों का स्टॉक रहे हैं, ताकि वे कम आपूर्ति के समय इनकी बिक्री कर सकें। कोठारी ने कहा कि दालों की एक दिन में खपत नहीं होती है, इसलिए उन्हें आगे के लिए भंडारित कर रखा जाता है। इसे मद्देनजर रखते हुए सरकार को स्टॉकिस्टों पर दालों की स्टॉक की सीमा हटानी चाहिए।
Keyword: agri, farmer, दलहन,
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