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फिर क्यों दिखा रहे वे गलियां जिन्हें छोड़ चुकी टीम इंडिया

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  March 10, 2017

आज की सुबह जब पाठक अहम विधानसभा चुनावों के नतीजों की ओर देख रहे होंगे तब मैं क्रिकेट के बारे में बात करने का दुस्साहस कर रहा हूं। यह काम मैं ऐसे समय में कर रहा हूं जब भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच चल रही शृंखला विवादों के कारण सुर्खियां बटोर रही है। हमारे क्रिकेट को दोबारा उस अतीत में धकेला जा रहा है जहां शिष्टïता का बोलबाला था, हमें अच्छा खेलते हुए हार जाने की छवि हासिल थी।

 
पहली बात तो यह है कि जब तक हमारी क्रिकेट टीम में सभ्य और भद्र खिलाड़ी खेला करते थे तब तक टीम बांग्लादेश से बेहतर नहीं थी। दूसरी बात, जब देश में यह खेल ऑक्सब्रिज और हिंदू-स्टीफंस की पीढ़ी के 'अच्छे लड़कों' और 'सम्मानपूर्वक' पराजित होने वालों से छोटे कस्बों और हिंदी भाषी इलाके के 'बुरे लड़कों' के पास पहुंचा तो इसमें असल उभार शुरू हुआ। गत 25 वर्षों में देश में इस खेल का स्तर इस कदर सुधर गया है कि 1992 के पहले की क्रिकेट टीम के ज्यादा से ज्यादा तीन सितारे (गावसकर, विश्वनाथ और कपिल देव) ही देश के सर्वकालिक महान 18 खिलाडिय़ों में जगह बना पाएंगे। इन तीनों में सबसे पुराने विश्वनाथ ने अपनी शुरुआत 1969 में की थी। यानी सन 1932 से 1969 के बीच 115 टेस्ट खेले किसी खिलाड़ी का नाम इस सूची में नहीं है। सबसे विवादास्पद बात यह है कि हमारी स्पिन चौकड़ी (बिशन सिंह बेदी, इरापल्ली प्रसन्ना, बीएस चंद्रशेखर, एस वेंकटराघवन) बहुत अच्छी थी लेकिन वह महानतम नहीं है। चार समकालीन स्पिनर अनिल कुंबले, हरभजन सिंह, रविचंद्रन अश्विन और रवीद्र जाडेजा (जी हां!) तक उनको मीलों पीछे छोड़ चुके हैं। 
 
इस जुर्म में दो सहअपराधी भी हैं। पहले हैं देश के बेहतरीन क्रिकेट सांख्यिकीविद मोहनदास मेनन। दूसरी है एक नई किताब नंबर्स डू (डोंट) लाई। हार्पर कॉलिंस से आई इस किताब को तैयार करने में एक बेहतरीन टीम की मदद ली गई है और इसे लिखा है पूर्व टेस्ट ओपनर और कमेंटेटर आकाश चोपड़ा ने। मेनन मेरे सारे आंकड़ागत प्रमाणों के लिए उत्तरदायी हैं जबकि पुस्तक से मैंने यह दलील ली है कि केवल प्रमाणों और अतीतमोह से कोई खिलाड़ी महान नहीं बनता। शायद मैं इतना आगे नहीं जाऊं। राजनीतिक प्रतिष्ठïानों को लेकर जरूर यह दलील दी जा सकती है। 
 
भारत ने अपने पहले 100 टेस्ट मैच 1932 से 1967 के बीच खेले। उसे 10 में जीत मिली और 40 में हार। इस अवधि में हमारी हालत आज के बांग्लादेश से बेहतर नहीं थी जिसने 2000 से अब तक 8 मैच जीते हैं और 98 हारे हैं। सच यही है भले ही हम वीनू मांकड़, लाला अमरनाथ, पॉली उमरीगर, पंकज रॉय, सी के नायडू, सुभाष गुप्ते, नरी कॉन्ट्रेक्टर, बापू नाडकर्णी, नवाब पटौदी, चंदू बोर्डे, सलीम दुर्रानी आदि को कितना भी याद करें। उस दौर में अगर दक्षिण अफ्रीका पर नस्लभेद के कारण प्रतिबंध नहीं लगा होता तो हमारी हालत और बुरी हो सकती थी। उसके बाद के 25 वर्ष यानी 1967 से 1991 तक हमारा जीत का प्रतिशत दोगुना हो गया। इस दौरान हमने 174 टेस्ट में 34 जीत हासिल की। अगले 25 साल यानी 1992-2017 के बीच यह दोगुना होकर 39.2 फीसदी हो गया। 
 
एक और मजेदार मोड़ आया नवंबर 2000 में जब हमारी क्रिकेट के असली बिगड़ैल सौरभ गांगुली कप्तान बने। उसके बाद के 177 टेस्ट में हमारी जीत का रिकॉर्ड और सुधरा। मेनन हमें बताते हैं कि 43.5 फीसदी के बेहतरीन जीत के रिकॉर्ड के साथ हम महज ऑस्ट्रेलिया (60.6 फीसदी) और दक्षिण अफ्रीका (49 फीसदी) के बाद तीसरे स्थान पर रहे। इस दौरान इंगलैंड, श्रीलंका और पाकिस्तान जैसी टीमें हमसे पीछे रहीं। 
 
गांगुली के साथ ही हमारी क्रिकेट में विवाद भी बढ़े। उन्हें लडऩा पसंद था। उन्होंने स्लेजिंग (मैदान में छींटाकशी) में ऑस्ट्रेलिया को पछाड़ दिया, लॉड्र्स की बालकनी से बदन खोलकर शर्ट उतारकर लहराई। हमें सुनील गावसकर को इस बात का श्रेय देना ही होगा कि उन्होंने काउंटी क्रिकेट को खारिज करने की शुरुआत की। एक बार एमसीसी में प्रवेश देने से इनकार के बाद उन्होंने आमंत्रण मिलने पर भी वहां जाना ठुकरा दिया। गांगुली के आगमन के साथ ही भारतीय क्रिकेट में एक तरह का सामाजिक बदलाव आना शुरू हुआ। अब छोटे कस्बों से गैर अंग्रेजीदां खिलाड़ी टीम में आने लगे। सचिन तेंडुलकर भी इनमें से एक हैं। ऐसा केवल क्रिकेट तक सीमित नहीं था। इसी अवधि में भारतीय हॉकी में भी बदलाव आया। पाकिस्तान के खिलाफ हार का निराशाजनक रिकॉर्ड खत्म हुआ। लिएंडर पेस जो प्रतिभा के मामले में शायद रमेश कृष्णन अथवा अमृतराज बंधु के पासंग में ही हों, उन्हें डेविस कप और युगल मुकाबलों में जबरदस्त सफलता मिली।
 
अंग्रेजीदां राजकुमारों और दिग्गजों का जमाना बीत चुका था। जगमोहन डालमिया और गांगुली, आई एस बिंद्रा, ललित मोदी और एन श्रीनिवासन, विजय मर्चेंट, राज सिंह डूंगरपुर, माधव राव सिंधिया, आरपी मेहरा, फतेह सिंह राव गायकवाड़ और सबसे बढ़कर विजयनगरम के महाराजकुमार जैसे लोगों से एकदम अलग थे। उस पीढ़ी के लिए मेहमान इंगलिश टीम को अपने महलों में ठहराना ही मुख्य था। अब वक्त बदल गया था। भारतीय क्रिकेट के रूढि़वादी लोग और ऑस्ट्रेलिया तथा इंगलैंड जैसे दिग्गज देश इस बदलाव को हजम नहीं कर पा रहे। गांगुली के पहले हम कपिल देव के रूप में एक देसी आक्रामक क्रिकेटर देख चुके थे। केपलर वेसल्स ने जब उनको बल्ले से मारा तो उन्हें न केवल शारीरिक कष्टï बल्कि सार्वजनिक अपमान भी सहना पड़ा था। यह घटना तब घटी जब दिसंबर 1992 में उन्होंने पोर्ट इलिजाबेथ में एक मुकाबले में पीटर कस्र्टन को 'मांकड़' की शैली में रनआउट कर दिया क्योंकि वह बॉल होने के पहले ही अपनी क्रीज छोड़ चुके थे। क्या आज कोई विराट कोहली, इशांत शर्मा या अश्विन या जाडेजा के साथ ऐसा कर सकता है? जॉन लीवर द्वारा गेंद के साथ छेड़छाड़ जैसी किसी घटना पर कोहली की टीम कैसी प्रतिक्रिया देगी? या अप्रैल 1976 में सबीना पार्क जैसा हादसा जिसे गावसकर ने अपनी किताब सनी  डेज में किंग्स्टन की बर्बरता के नाम से याद किया है। 
 
इमरान खान ने अपनी बमुश्किल पढ़ी लिखी पंजाबी बोलने वाली टीम को किस तरह विजेता में तब्दील कर दिया। उन्होंने विदेशियों के प्रति उनका डर दूर किया। उन्होंने कहा कि अगर वे आधिकारिक अवसरों पर भी सूट में सहज नहीं हैं तो सलवार कुर्ता पहनें और कभी अपने प्रतिद्वंद्वी को सर कहकर न बुलाएं, कभी किसी चीज के लिए माफी न मांगें, जरूरत पडऩे पर गाली भी दें। अगर अंग्रेजी नहीं आती तो पंजाबी में दें। समझने वाले समझ जाएंगे। हमारा नया सुसभ्य और नेक इरादों वाला क्रिकेट बोर्ड दोबारा उसी रूमानी भद्र लोगों की परंपरा की ओर वापस लौटना चाहता है। 
 
उपसंहार
 
मैं अपनी बात को थोड़ा स्पष्टï करना चाहता हूं। हमारा महानतम फिरकी गेंदबाज कौन है? अश्विन ने हर 51 गेंद पर एक विकेट लिया है। पहले विश्वयुद्घ के बाद यानी बीते 100 साल में दुनिया में किसी अन्य स्पिनर ने इस दर से विकेट नहीं लिया है। वह मुरलीधरन और शेन वार्न से भी आगे हैं जिन्होंने क्रमश: 55 और 57 गेंद पर विकेट लिए हैं। भारत की बात करें तो उनके बाद जाडेजा और कुंबले आते हैं जिन्होंने क्रमश: 62 और 66 गेंद पर विकेट निकाला है। पुरानी चौकड़ी की बात करें तो चंद्रशेखर 66 के साथ कुंबले के समकक्ष हैं। प्रसन्ना ने हर 76, बेदी ने 80 और वेंकट ने 95 गेंद पर विकेट लिया। वे अश्विन से खासे पीछे हैं। हर 69 गेंद पर विकेट के साथ भज्जी उनसे आगे हैं। यही वजह है कि उनमें से कोई आकाश चोपड़ा की प्रभावी खिलाडिय़ों की सूची में शामिल नहीं है। खुलकर कहें तो यह चाहे जितना दुखद लगे लेकिन इन चारों गेंदबाजों में से कोई गेंदबाजी प्रतिभा के दम पर मौजूदा टीम में जगह नहीं बना पाएगा। 
Keyword: BCCI, cricket,,
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