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राष्ट्रपति ट्रंप के एजेंडे के क्या हैं प्रभाव?

श्याम सरन /  March 09, 2017

अमेरिका में आ रहे बदलावों के साथ समायोजन के बीच भारत को इस बात पर ध्यान रखना चाहिए कि ट्रंप प्रशासन वास्तव में क्या कुछ करने में सक्षम है। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं श्याम सरन 

 
डॉनल्ड ट्रंप को अमेरिका का राष्ट्रपति बने दो माह से कुछ अधिक वक्त हुआ है। इस अवधि में तमाम सहयोगियों, मित्रों और यहां तक कि शत्रुओं के मन में समान चिंताएं पैदा हुई हैं। उन्हें लग रहा है कि जाने इस प्रशासन के अगले कुछ साल के कार्यकाल में क्या कुछ सामने आए। इसके लिए ट्रंप प्रशासन के शुरुआती दिनों की अनिश्चितता और अस्थिरता उत्तरदायी है। 
 
अपेक्षाकृत पराभव के दौर में भी अमेरिका दुनिया भर पर गहरी छाप छोडऩे की स्थिति में है। यह बात आर्थिक और सैन्य दोनों ही मायनों में सच है। वॉशिंगटन में लिए जाने वाले निर्णय चाहे घरेलू वजहों से लिए गए हों लेकिन वे तमाम दूर-पास के देशों को प्रभावित करते हैं। इसलिए वहां के राजनीतिक घटनाक्रम पर करीबी नजर रखने की आवश्यकता है। भारत के लिए यह खास अहमियत रखती है। न केवल भारतीय आईटी पेशेवरों के लिए बनने वाली नीतियों के चलते बल्कि हाल में भारतीय नागरिकों और भारतीय-अमेरिकियों पर हुए नस्ली हमलों जैसी घटनाएं भी इसकी वजह हैं। ये हमले वहां ट्रंप प्रशासन की आव्रजन विरोधी नीतियों और बातों का ही परिणाम हैं। व्यापक भू राजनैतिक परिदृश्य में देखें तो भारत की दृष्टि से मिलीजुली तस्वीर उभर रही है। फिर भी उसके कुछ अस्पष्ट पहलुओं पर बात करना श्रेयस्कर होगा। 
 
ट्रंप की वैश्विक दृष्टि में तीन बातों को लेकर निरंतरता देखने को मिलती है। उनमें से एक का संबंध चीन से है। शीत युद्ध के समापन के बाद से हर अमेरिकी प्रशासन चीन को शत्रु के रूप में तो देखता ही है लेकिन विशिष्ट क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों को हल करने में उसका सहयोग भी चाहता आया है। अमेरिका की चीन नीति विवाद और सहयोग की मिलीजुली जमीन पर है। परंतु ट्रंप के कार्यकाल में विवाद और द्वंद्व की भावना बढ़ी है। यह कारोबार और निवेश दोनों क्षेत्रों में देखने को मिल रहा है साथ ही सुरक्षा समीकरणों में भी। भविष्य में दोनों देशों के रिश्ते और खराब हो सकते हैं।
 
दूसरी बात आतंकवाद का विरोध (ट्रंप की नजर में इस्लामिक आतंकवाद) उनके शासन के केंद्र में रहेगा। तमाम कानूनी अड़चनों के बावजूद ट्रंप ने कई इस्लामी देशों के नागरिकों को वीजा देने पर रोक लगा दी है। यह इसी बात का संकेत है। भविष्य में अमेरिका आतंकियों को सुविधाएं मुहैया कराने वाले देशों को लेकर अधिक कड़ा रुख अपना सकता है। इसका एक नुकसान यह हो सकता है कि शायद अमेरिका पर हमलों की घटनाएं हों। इससे पूरे इस्लामिक जगत में यह धारणा मजबूत होगी कि अमेरिका इस्लाम के खिलाफ है। परंतु आतंकवाद के विरोध पर ध्यान केंद्रित करने की कोशिश से पाकिस्तान जैसे देश सतर्क होंगे जो सीमापार आतंकवाद को बाकायदा बतौर नीति अपना रहे हैं। 
 
तीसरी बात, ट्रंप चाहते हैं कि अमेरिका और रूस के रिश्ते ठीक हों। इससे दो हित सधेंगे। रूस और चीन का सामरिक सहयोग अमेरिका और पश्चिम के हित में नहीं है। रूस उनके लिए कोई सैन्य जोखिम भी नहीं है। रूस आईएसआईएस और अल कायदा के जिहादी आतंकवाद के खिलाफ भी विश्वसनीय सहयोगी है। सीरिया में आईएसआईएस के खिलाफ रूसी कार्रवाई से पश्चिम के हित सधे हैं। टं्रप के एजेंडे में शामिल इन तीनों बातों में उनकी रूस नीति ने सबसे अधिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। देखना यह होगा कि वह इस प्रतिरोध से निपट पाते हैं या नहीं। ये तीनों बातें भारत के भूराजनैतिक नजरिये से सकारात्मक हैं। चीन को रोकने की किसी भी कोशिश का भारत को स्वागत ही करना चाहिए। अगर अमेरिका के सैन्य व्यय में इजाफे की हालिया घोषणा से एशिया-प्रशांत क्षेत्र में उसकी मौजूदगी मजबूत होती है तो हिंद महासागर में चीन की गतिविधियों पर अंकुश लगेगा। 
 
इससे हमें अपनी क्षमताएं बढ़ाने का अवसर मिलेगा। जापान, दक्षिण कोरिया, दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों और ऑस्टे्रलिया पर चीन का दबाव जल्दी ही समाप्त हो सकता है। लेकिन एशिया-प्रशांत क्षेत्र और आसपास उसका दबदबा आगे भी बढ़ता रहेगा। ऐसे में भारत तथा इस इलाके के अन्य देश जो चीन की बढ़ती ताकत को लेकर चिंतित हैं उनको मिलकर एक ऐसी व्यवस्था के लिए काम करना चाहिए जिसमें हमारे क्षेत्र में अमेरिका की भूमिका धीरे-धीरे कम हो।
 
अगर अमेरिका आतंक विरोधी नीतियों को लेकर अधिक सचेत रहता है तो भारत को भी उसका फायदा मिलेगा। लेकिन ऐसा केवल तभी तक जब तक कि वह इस्लाम को लेकर फैलाए हुए भ्रम का शिकार न हो जाए और मुस्लिमों को निशाना न बनाए। भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में जहां मुस्लिम बहुत बड़ी तादाद में हैं वहां बहुत असहज करने वाले हालात बन सकते हैं। 
 
फिलहाल जरूर अमेरिका के साथ आतंक विरोधी रुख मजबूत करने का अवसर है। इन हालात में पाकिस्तान पर किसी भी तरह का दबाव स्वागतयोग्य होगा। रूस की बात करें तो अमेरिका और रूस के बीच रिश्ते में किसी भी तरह का सुधार भी भारत के लिहाज से बेहतर होगा क्योंकि रूस पहले ही हमारा मित्र देश है। अमेरिका के साथ हमारे मजबूत होते रिश्तों ने जरूर रूस के मन में शंका पैदा की है। क्योंकि खुद अमेरिका और पश्चिम के साथ उसके रिश्ते कमजोर हुए हैं। 
 
उधर, चीन से उसकी करीबी ने भारत को चिंतित किया है। एक बार अमेरिका और रूस के रिश्ते सुधरने पर हालात ठीक होंगे। हमें ट्रंप की नीति के इस पहलू को भी ध्यान में रखना होगा। इसका तात्पर्य यह हुआ कि हमें रूस के साथ अपने रिश्तों को बिना अमेरिका-रूस रिश्तों में सुधार के संपाश्र्विक लाभ के संभालना होगा। ट्रंप की विदेश नीति के इन तत्त्वों का फायदा उठाने की कोशिश के बीच हमें नकारात्मक चीजों का भी ध्यान रखना होगा। इनकी बदौलत भारत को जो भी भूराजनैतिक लाभ मिलें या नहीं यह काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि यह प्रशासन अपने एजेंडे पर सही प्रदर्शन करने में कामयाब रहता है या नहीं। अगर लंबे समय तक घरेलू राजनीतिक अस्थिरता बनी रहती है तो अमेरिकी समाज में ध्रुवीकरण बढ़ता जाएगा और इसके साथ ही नीतिगत अस्थिरता आएगी जो प्रशासन को बाहरी मोर्चे पर ध्यान देने का मौका ही नहीं देगी। जबकि उन मुद्दों पर तत्काल सुविचारित ढंग से ध्यान देने की आवश्यकता होगी। अगर अमेरिका वैश्विक मोर्चे पर नजर आना बंद हो गया तो हालात और भी खराब हो जाएंगे। 
Keyword: america, ट्रंप, आईटी, अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप आव्रजन सुधार नीति,
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