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सरकारी बैंकों में सुधार से ही समस्या का समाधान
नीलकंठ मिश्रा /  March 08, 2017

देश में जमा मजबूत हो रही है जबकि बैंक ऋण की वृद्घि दर लगातार धीमी पड़ती जा रही है। इसकी वजह से उत्पन्न होती जटिलता को रेखांकित कर रहे हैं नीलकंठ मिश्रा 

 
इन दिनों जहां वित्तीय बचत में इजाफा हो रहा है, वहीं बैंक ऋण में भारी गिरावट देखने को मिल रही है। फिलहाल यह ऋण 50 वर्ष के निचले स्तर पर पहु्रंच चुका है। वित्तीय बचत में बढ़ोतरी की बात करें तो सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के प्रतिशत के रूप में उनमें पिछले दो साल से इजाफा हो रहा है। इस बात को तो बेहतर जमा वृद्घि, छोटी बचत योजनाओं में बढिय़ा निवेश, म्युचुअल फंड में निवेश आदि से समझा जा सकता है। सोने के आयात में आई गिरावट भी इस बात का संकेत देती है। नोटबंदी ने भी इसमें मदद की। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि इन दिनों कारोबारी घरानों और व्यक्तिगत स्तर पर भी ऋण देने की गुंजाइश पहले के मुकाबले काफी ज्यादा है। 
 
इसमें भी दो राय नहीं है कि मांग के मोर्चे पर समस्या मौजूद है। अर्थव्यवस्था में धीमापन है जबकि अधिकांश क्षेत्रों में अतिरिक्त क्षमता मौजूद है। यह क्षमता निजी निवेश के लिए भी खुली है। ऐसे में कारोबारी ऋण के लिए बहुत कुछ करने की आवश्यकता नहीं है। बहरहाल इससे मांग को लेकर चीजें समझ में आती हैं। तमाम अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं से इतर भारत नकदी के मोर्चे पर पीछे है। जीडीपी और बैंक ऋण का अनुपात एक ऐसा उपाय है जिसके आधार पर बैंकिंग की पहुंच का आकलन किया जाता है। इस मोर्चे पर हम दुनिया से काफी पीछे हैं। जहां तक अत्यधिक कर्ज के बोझ बात है तो वह चुनिंदा समूहों की बैलेंस शीट पर ही नजर आता है। सूक्ष्म उद्यमों के लिए ऋण की उपलब्धता अच्छी नहीं है जबकि वह बहुत बड़े पैमाने पर भारतीय कामगारों को रोजगार देता है। यह एक ऐसी समस्या है जिसका हल तलाश करना जरूरी है। जिस समय पूंजी की कमी थी उस वक्त भी यह हमारे वित्तीय क्षेत्र की प्राथमिकता में नहीं था। इसी तरह व्यक्तिगत ऋण की बात करें तो देश में इसे लेकर तमाम सांस्कृतिक गतिरोध मौजूद हैं। देश में फिलहाल इसका स्तर भी बहुत कम है। 
 
ये तमाम बातें एक ऐसी समस्या की ओर संकेत करती हैं जो हमेशा से थी लेकिन सामने अब आई है क्योंकि अर्थव्यवस्था के सामने ऐसी परिस्थितियां हैं जिनका सामना उसने पहले नहीं किया। यह है घरेलू पूंजी का प्राचुर्य। भारतीय वित्तीय व्यवस्था में बैंकों का दबदबा है और यहां दो तिहाई से अधिक बकाया ऋण अभी भी सरकारी बैंक ही जारी करते हैं। ऐसे में यहां इस मोर्चे पर किसी भी तरह के नवाचार के लिए बहुत अधिक गुंजाइश नहीं है। बैंक तो बड़े कारोबारी घरानों को कर्ज देने में व्यस्त हैं। एक बड़ा चेक काटना उनके लिए अधिक आसान जो होता है। हमारी व्यवस्था बड़ी संख्या में छोटे ऋण बांटने का हासिल नहीं समझ पाई। देश के वित्तीय नियामकों ने कमजोर नियमन वाले गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थानों को एक सीमा से अधिक बढ़ जाने दिया। 
 
इससे इस समस्या में और अधिक इजाफा हुआ। समय-समय पर नियामकों ने छोटे और मझोले उद्यमों को ऋण देने को बढ़ावा भी दिया जिससे फंसे हुए कर्ज में ही इजाफा हुआ। ऐसा इसलिए कि ऋण बांटते समय लक्ष्य हासिल करने के लिए मानकों का ध्यान नहीं रखा गया। बहरहाल फिलहाल बचत अधिशेष की स्थिति उत्पन्न हो गई है जबकि ऋण की मांग अत्यंत कम है। 
 
ऐसे में वास्तविक नवाचार की जमीन तैयार हुई। निजी उद्यम अब हमारी वित्तीय व्यवस्था का अहम अंग है। वे नवाचार को अपना रहे हैं। बैंकों ने भी लखनऊ में ऑटो चालकों और ओडिशा में छोटे बुनकरों आदि को ऋण देकर एनबीएफसी का ही अनुसरण किया है। परंतु ऐसा बदलाव बहुत धीमी गति से हो रहा है। खासतौर पर यह देखते हुए कि अधिकांश सरकारी बैंक, व्यवस्था का अधिकांश हिस्सा आदि इस बदलाव को तेजी से अंगीकृत नहीं कर रहे। ऐसे में निकट भविष्य में ऋण वृद्घि के तेज गति से सुधरने की संभावना नहीं है। 
 
इसका तात्पर्य यह हुआ कि पूंजी की अत्यधिक उपलब्धता जारी रहेगी और कीमतें गिरेंगी। शुद्घ ब्याज मार्जिन मूल्यांकन का बैंकिंग समकक्ष होता है। जमा हासिल करने और ऋण जारी करने की कीमत के बीच का अंतर इसकी लागत होती है। बीते पांच सालों से इसमें लगातार गिरावट देखने को मिल रही है। हाल ही में पूंजी का जो आधिक्य देखने को मिला उससे गिरावट में ही तेजी आएगी। इससे बाजार को झटका लगेगा। यानी बैंक आगे आरबीआई के कदमों से बेपरवाह ब्याज दरों में कटौती कर सकते हैं। 
 
म्युचुअल फंड की मजबूत आवक से शेयर कीमतें मजबूत होना भी पूंजी की लागत कम होने का उदाहरण हैं। केंद्र सरकार को अपनी सीमाएं पता हैं। हालिया बजट में उसने व्यय-जीडीपी अनुपात को चार दशक के न्यूनतम स्तर पर रखा। इससे प्रक्रिया तेज हुई है। इसके अलावा अब निजी क्षेत्र के लिए भी यह अहम है कि वह वृद्घि दर में सुधार के लिए प्रयास करे। उसके लिए पूंजी की लागत में उल्लेखनीय कमी जरूरी है। यह प्रक्रिया धीमी हो सकती है लेकिन यह मजबूत और स्वस्थ प्रक्रिया है। 
 
हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि कीमत गिरने के साथ उसके गलत आवंटन का जोखिम न सर उठा ले। मसलन म्युचुअल फंड द्वारा कंपनियों को जोखिम भरा ऋण देना या शेयर बाजार में धोखादेह तेजी। बहरहाल जब तक ये बातें व्यवस्थागत स्थिरता को प्रभावित नहीं करती हैं तब तक हस्तक्षेप करने की कोई आवश्यकता नहीं है। इस वर्ष जिस जोखिम से निपटने की आवश्यकता पड़ सकती है वह है कम ब्याज दरों के कारण सरकारी क्षेत्र के बैंकों पर पड़ रहा दबाव। सरकार दूरसंचार और विमानन क्षेत्र की तरह ही बैंकिंग क्षेत्र में भी बाजार हिस्सेदारी के निजीकरण का सहज तरीका अपनाना चाह रही है। ऐसा इसलिए क्योंकि इसमें किसी प्रत्यक्ष निर्णय लेने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती। बहरहाल ऋण वृद्घि में तेजी से आ रही गिरावट, तयशुदा लागत में हो रही बढ़ोतरी, फंसे हुए कर्ज की शाश्वत समस्या आदि को भी सरकारी बैंकों में सुधार के व्यापक चश्मे से देखना होगा। 
Keyword: bank, loan, debt, भारतीय रिजर्व बैंक,
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