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अदालती मामलों के त्वरित निपटान पर देना होगा ध्यान
अदालती आईना
एम जे एंटनी /  March 07, 2017

देश के नए मुख्य न्यायाधीश के शुरुआती हफ्तों के कामकाज पर उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ताओं की पारखी नजर लगी रहती है। इसकी वजह केवल सुनाए जाने वाले फैसले ही नहीं होते हैं बल्कि इससे अधिवक्ता यह अंदाजा भी लगाने की कोशिश करते हैं कि किसी न्यायाधीश का रुझान किस तरफ है। हर कोई जानता है कि हवा की दिशा में नाव चलाना अधिक आसान होता है।
उस पैमाने से देखें तो उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता नए मुख्य न्यायाधीश जे एस खेहड़ की कार्यशैली को देखकर अधिक आश्वस्त नहीं हुए होंगे। वजह यह है कि न्यायमूर्ति खेहड़ लगातार नए-नए मानदंड बनाने के इच्छुक दिख रहे हैं। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाला पीठ अब पुराने फैसलों पर कोई स्थगन देने के बजाय एक सुनवाई में ही उनका निपटारा कर दे रहा है। हल्के मामले लेकर आने वाले याचियों पर जुर्माना लगाने का फैसला तो काफी नाटकीय रहा है। बिहार के एक पूर्व विधायक ने 23 साल पहले छपी एक खबर के बारे में शिकायत की तो पीठ ने अदालत का वक्त खराब करने का दोषी पाते हुए उन पर 10 लाख रुपये का अर्थदंड लगा दिया।
मुख्य न्यायाधीश ने विभिन्न मामलों में सरकार का पक्ष रखने वाले वकीलों से पूरी तैयारी के साथ आने की हिदायत देते हुए कहा है कि बार-बार स्थगन मांगने पर उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। उच्चतम न्यायालय में सबसे अधिक याचिकाएं सरकारी विभागों की तरफ से ही दायर की जाती हैं लेकिन सुनवाई के समय सरकारी वकील नदारद नजर आते हैं। जब न्यायालय को यह पता चला कि विदेश से लाए गए खतरनाक अवशिष्ट को भारतीय बंदरगाहों पर खपाने के मुद्दे पर 1995 में दायर एक याचिका पर सरकार ने अभी तक कोई विस्तृत जवाब नहीं दाखिल किया है तो उसने कड़ी नाराजगी जाहिर की।
न्यायमूर्ति खेहड़ के इस सख्त रवैये की चपेट में कॉर्पोरेट जगत भी आया है। उन्होंने कहा कि किसी भी कानूनी मंच से अपने खिलाफ अंतरिम आदेश जारी होने के बाद इन कंपनियों में उच्चतम न्यायालय से अपील करने की प्रवृत्ति देखने को मिलती है। पिछले साल ही एक पीठ ने अदालत का समय खराब करने के लिए तीन कंपनियों पर 25 लाख रुपये का जुर्माना लगाया था। लेकिन ऐसा लगता है कि हालात में कोई खास बदलाव नहीं हुआ है। लोकतांत्रिक संवैधानिक व्यवस्था में उच्चतम न्यायालय को सबसे अधिक शक्तिशाली माना जाता है। हवाला केस, 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला और कोयला घोटाला जैसे मामले सरकारों के पतन की वजह बने हैं। हाल ही में अन्नाद्रमुक की अंतरिम महासचिव शशिकला को आय से अधिक संपत्ति मामले में दोषी ठहराने के फैसले ने भी तमिलनाडु में बड़ी सियासी हलचल पैदा कर दी थी। इसलिए व्यापक राजनीति असर पैदा करने की आशंका वाले मामलों में अदालतों को भी काफी संवेदनशीलता दिखानी चाहिए। अगर उच्चतम न्यायालय ने शशिकला से संबंधित मामले में एक तर्कसंगत समय के भीतर फैसला सुना दिया होता तो हालात इतने खराब नहीं हुए रहते। सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले की सुनवाई पिछले साल 7 जून को ही पूरी हो गई थी लेकिन फैसला सुनाने में आठ महीने का लंबा वक्त लग गया। अदालती मामलों के निपटारे के लिए उच्च न्यायालयों को जो समय-सीमा दी गई है खुद उच्चतम न्यायालय को भी उसका पालन
करना चाहिए।
अनिल राय बनाम बिहार सरकार वाद में सर्वोच्च अदालत ने कहा था कि अगर मामले की सुनवाई पूरी होने के तीन महीने के भीतर फैसला नहीं आता है तो याची अदालत से यह अपील कर सकता है कि फैसला जल्द सुनाया जाए। अगर सुनवाई पूरी होने के छह महीने बाद भी कोई फैसला नहीं आता है तो फिर उस मामले की सुनवाई किसी और पीठ के सुपुर्द करने की बात भी उस चर्चित फैसले में कही गई थी। लेकिन शशिकला मामले ने साबित कर दिया कि खुद उच्चतम न्यायालय भी अपने ही बनाए नियमों का पालन नहीं कर रहा है।  उच्चतम न्यायालय ने पिछले साल दायर की गई उस अपील को खारिज कर दिया था जिसमें सुरक्षित रखे गए फैसलों की संख्या और उनकी अवधि के बारे में जानकारी उपलब्ध कराने को कहा गया था। हालांकि कुछ उच्च न्यायालय तय की गई समय-सीमा का पालन कर रहे हैं और सुनवाई पूरी होने के बाद फैसला सुनाने में अधिक देर नहीं लगा रहे हैं। आम तौर पर सुनवाई पूरी होने के एक महीने के भीतर उच्च न्यायालयों में फैसले सुना दिए जा रहे हैं।  उच्चतम न्यायालय में एक और अलग प्रवृत्ति भी देखने को मिलती है। किसी न्यायाधीश की सेवानिवृत्ति का समय नजदीक आते ही अचानक फैसले सुनाने की गति तेज हो जाती है। संविधान पीठ से जुड़े कुछ न्यायाधीशों ने तो बाकायदा इस पर आपत्ति जताते हुए अलग फैसले भी दिए हैं। उनका कहना है कि अचानक फैसले सुनाने की दर बढऩे से वे फैसलों के मसौदे को भी ठीक से नहीं पढ़ पाते हैं।
मुख्य न्यायाधीश को त्वरित सुनवाई करने के साथ ही फैसला सुनाने में भी तेजी लाने पर ध्यान देना चाहिए। पुराने मामलों की सुनवाई में तेजी लाना भी उनकी प्राथमिकता में होना चाहिए। उच्चतम न्यायालय के सामने करीब 61,000 ऐसे मामले हैं जो कई दशक पुराने हैं।
संविधान पीठ के समक्ष भी सुनवाई के लिए करीब 50 मामले लंबित हैं। संविधान पीठ में कम-से-कम पांच न्यायाधीशों की मौजूदगी अनिवार्य होती है। संवैधानिक महत्त्व वाले विषयों पर सुनवाई के लिए बड़े पीठ को सुपुर्द किए गए मामलों की भी अच्छी खासी संख्या है। उच्चतम न्यायालय को पिछले हफ्ते पांच नए न्यायाधीश मिले हैं। उम्मीद की जा सकती है कि न्यायाधीशों की संख्या 28 होने के बाद उच्चतम न्यायालय अब अधिक तेजी से मामलों का निपटारा कर पाएगा। मुख्य न्यायाधीश खेहड़ को इस स्थिति का लाभ उठाते हुए एक अमिट छाप छोडऩी चाहिए।

Keyword: Supreme court, law, lawyers,
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