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बैंकिंग संकट से निजात की क्या हों नीतियां?
अजय शाह /  March 07, 2017

मजबूत कंपनियों को अधिक से अधिक ऋण देने और भारतीय रिजर्व बैंक के जरूरी सुधारों को लागू करने से बैंकिंग संकट से निपटा जा सकता है। विस्तार से बता रहे हैं अजय शाह
नोटबंदी और बजट पर चर्चा अब कमोबेश समाप्त हो रही है। वक्त आ गया है कि अर्थव्यवस्था को दिक्कत दे रहे अन्य मसलों पर बात की जाए। मसलन निवेश में ठहराव, सरकार का ठीक से काम न करना, बैलेंस शीट की दिक्कतें और मुनाफे की समस्या ने कंपनियों को दिक्कत में डाल रखा है। बैंकों की बैलेंस शीट तनाव में है। प्रवर्तन एजेंसियों के व्यवहार ने निजी क्षेत्र को जाम कर रखा है। फौरी उपाय नाकाम हो गए हैं और गहरे सुधारों का कोई विकल्प नहीं है।
बैंकिंग क्षेत्र में व्याप्त संकट के लिए तमाम तरह के हल प्रस्तावित हैं। सरकारी बैंकों के विलय से कोई बदलाव नहीं आने वाला है। एक बड़ा सरकारी बैड बैंक (फंसी हुई परिसंपत्तियों का पुनर्गठन करने वाला संस्थान) राजनीतिक रूप से बेहतर विकल्प है लेकिन वह अधिक गहरी समस्या हल नहीं करता। गैर बैंकिंग वित्तीय क्षेत्र के गतिरोध दूर करना बेहतर होगा और साथ ही अर्थव्यवस्था का ऐसे वक्त पर समर्थन करना भी जबकि बैंक ऋण में इजाफा नहीं हो रहा होगा। इसके साथ ही आरबीआई सुधारों को अंजाम देना भी बेहतर होगा।
देश में बैंकों की समस्या यह है कि इनमें गलतियों को छिपाने की प्रवृत्ति है। लेकिन इस बुरी खबर पर लंबे समय से ध्यान नहीं दिया जा रहा है। अब इस बात को लेकर लगातार समझ बढ़ रही है कि अच्छे और मजबूत वित्तीय स्थिति वाले बैंकों को अंगुलियों पर गिना जा सकता है। जबकि शेष भारतीय बैंकिंग व्यवस्था या तो दिवालिया होने की स्थिति में है या फिर उनके पास पर्याप्त इक्विटी पूंजी नहीं है।
एक बुरे बैंक का स्टेट बैंक में विलय तो स्टेट बैंक की इक्विटी पूंजी का काफी हिस्सा जाएगा। अगर बैंक की प्रबंधन क्षमताओं की मदद से उसकी इक्विटी पूंजी का इस्तेमाल किया जाए तो देश को लाभ ही होगा बजाय कि उसकी मदद से नाकाम हो चुके बैंकों को उबारने की कोशिश। कंपनी कानून और सेबी के नियमन की बदौलत प्रवर्तकों के लिए सार्वजनिक अंशधारकों के हितों के साथ समझौता करना खासा मुश्किल होता जा रहा है। ऐसे में हम स्टेट बैंक के सार्वजनिक अंशधारकों को यह बात कैसे समझाएंगे कि यह उनके पैसे का सर्वोत्तम इस्तेमाल था?
निजी क्षेत्र में विलय से मूल्यवर्धन हो सकता है क्योंकि वहां आकार मायने रखता है। उदाहरण के लिए अगर दो उद्यमों में से प्रत्येक में 100 कर्मचारी हैं जिनमें 10-10 आईटी कर्मचारी हैं तो विलय के बाद बने बैंक में केवल 15 आईटी कर्मचारी होंगे। ऐसे में पांच पद समाप्त किए जा सकते हैं। ऐसा पुनर्गठन सार्वजनिक क्षेत्र के हित में है।
सबसे बड़ा मसला लंबी अवधि से संबंधित है। अन्य सरकारी उद्यमों का सफर जानकारी परक है। वीएसएनएल, सीएमसी और यूटीआई का अंतत: निजीकरण कर दिया गया। एमटीएनएल, बीएसएनएल और एयर इंडिया की अप्रासंगिकता को भी इस बात से समझा जा सकता है। भविष्य में हम जिस हद तक कुछ सरकारी बैंकों का निजीकरण कर सकें  वही बेहतर होगा। छोटे उद्यमों का निजीकरण आसान होता है। इस दृष्टिï से देखें तो सरकारी बैंकों का आकार छोटा रखना ही बेहतर। देश के बैंकिंग क्षेत्र में करीब 30 फीसदी संपत्तियां फंसी हुई हैं। लेकिन बड़ा सरकारी बैड बैंक फंसी हुई संपत्ति की खरीद वास्तविक मूल्य पर करेगा। ऐसे में शुरुआत से ही इसकी हालत खराब रहेगी। वित्त मंत्रालय करदाताओं के पैसे का इस्तेमाल अगले 10 वर्ष तक इसकी भरपाई में करेगा।
बैड बैंक इसकी बहुत बड़ी लागत करदाताओं पर डालेगा। कोई नहीं जानता है कि यह समस्या कितनी बड़ी है? अगर हम यह मान लें कि 70 फीसदी नुकसान होगा और फंसी हुई परिसंपत्ति 100 खरब रुपये की है तो करदाताओं से कहा जाएगा कि वे 70 खरब रुपये चुकाएं। जाहिर सी बात है कि करदाताओं को छोड़कर हर कोई बैड बैंक को पसंद करता है।
आरबीआई को भी यह पसंद है और इसलिए तमाम पाप क्षमा कर दिए गए हैं। किसी तरह का कोई आरबीआई सुधार नहीं किया गया और करदाताओं को एक बार फिर देश की बैंकिंग व्यवस्था की सफाई करने की जिम्मेदारी दे दी जाती है। जाहिर है हमें एक बार फिर अगले बैंकिंग संकट की तैयारी कर लेनी चाहिए।
बैंकों को भी यह समान वजह से पसंद है। यानी सबकुछ भूल-भालकर एक बार फिर अगले बैंकिंग संकट की तैयारी करना। देश के मौजूदा प्रवर्तकों को भी यह पसंद आता है। उनकी वित्तीय संकट में फंसदी कंपनियों को दिवालिया होने की प्रक्रिया से नहीं गुजारा जात, इसके बजाय उनको अगले एक दशक तक के लिए किसी न किसी सरकारी बैंक से मदद मिल जाती है। हमें एक ऐसी बैंकिंग व्यवस्था से जूझना है जो मौजूदा व्यवस्था को जारी रखने की हिमायती है। बैड बैंक दरअसल करदाताओं के पैसे का दुरुपयोग भर है। यह सुधारों का दबाव खत्म करके देश के वित्तीय तनाव में इजाफा ही करेगा। हमें समस्याओं को उनके जड़ में जाकर खत्म करना होगा, बजाय कि करदाताओं से यह मांग करते रहने के कि वे घाटे की भरपाई करें और बैंकिंग क्षेत्र बार-बार उसी संकट के शिकार होते रहें।
आगे की राह क्या है यह जानने के लिए एक दो रुख वाली नीति अपनाने की आवश्यकता है। इसका पहला तत्त्व है देश की अर्थव्यवस्था की वित्तीय समस्याओं को हल करना। निजी क्षेत्र के बैंक ऋण की बात करें तो उसमें बहुत धीमी गति से विकास हो रहा है। इसका एक विसंगत हिस्सा दिवालिया होने वाली फर्मों की ओर जाता है। इससे अच्छी कंपनियों को ऋण नहीं मिल पाता। अच्छी कंपनियों के लिए अधिक ऋण जुटाना होगा। इसके लिए चार गैर बैंकिंग चैनल खोलने होंगे। ये हैं पूंजी लेखा का उदारीकरण, एनबीएफसी, बॉन्ड बाजार और तनावग्रस्त परिसंपत्ति फंड (एआरसी)। वित्तीय क्षेत्र सुधार की मदद से इन कमियों को सुधारा जा सकता है। दूसरा तत्त्व है आरबीआई सुधार। आखिर हमें हर दशक में बैंकिंग संकट का सामना क्यों करना पड़ता है? बैंक आखिर खराब ऋण देकर हमेशा संकट में क्यों पड़ जाते हैं? इसकी वजह है कि बैंकिंग नियमन की तकनीकी विफलता और आरबीआई की निगरानी।
आरबीआई बोर्ड के काम में भी समस्या है। नियम बनाने की प्रक्रिया, लाइसेंसिंग और जांच की प्रक्रिया और दंडित करने की अद्र्घ न्यायिक प्रक्रिया। आरबीआई ने एफएसएलआरसी हैंडबुक को लागू करने की बात कही लेकिन क्रियान्वयन के मोर्चे पर कुछ नहीं हुआ। आरबीआई के कामकाज और उसकी भूमिका में सुधार की आवश्यकता है। उसे अपने दो प्रमुख कामों मूल्य स्थिरता और बैंकों की मजबूती पर ध्यान देना चाहिए।
आरबीआई सुधार की प्रक्रिया पांच वर्ष की है। इतनी अवधि में एक मजबूत बैकिंग व्यवस्था हासिल हो सकती है। तब निजी और विदेशी बैंकों के निर्बाध प्रवेश की व्यवस्था संभव होगी। जबकि गैर बैकिंग चैनल खोलने संबंधी पहला तत्त्व 2017 में ही परिणाम दे सकता है।

Keyword: Banking, loan, RBI,
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