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ट्रंप के बहाने कई चेहरे आए सामने
सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास राघवन /  March 06, 2017

अमेरिकी समाज के बारे में हमेशा से दो अलग-अलग विचार रहे हैं। इनमें से दबदबे वाला रुख उस धड़े का रहा है जो काफी दुनियादार है और बौद्घिक रूप से परोपकारी नजर आता है। दूसरा विचार जो कम सामने आता है वह अपने व्यवहार में गंदा और पाश्विक जान पड़ता है। अमेरिकी राष्ट्रपति पद पर डॉनल्ड ट्रंप के चुनाव ने इन दोनों विचारों को जबरदस्त प्रमुखता प्रदान की। इसके बाद अमेरिकी लोगों का सबसे बुरा पहलू सामने आया है। अमेरिकी जनता का एक तबका जो अपने आपको सर्वश्रेष्ठï समझता रहा है उसके लिए यह बहुत दुखद था। शायद ही अमेरिका के बुर्जुआ वर्ग से इस कदर जहरीलापन बाहर आया हो। इससे एक बात एकदम साफ जाहिर होती है कि अमेरिका का वह तबका जो बौद्घिक रूप से समझदार और दुनियादार बनता है वह भी ठीक ट्रंप जैसा ही है। बुरा और पाश्विक।  परंतु यह कतई चकित करने वाली बात नहीं है। जब भी आप अपने विचार को बाकी सभी से श्रेष्ठï मानते हैं तो वास्तव में यही होता है। खासतौर पर पश्चिमी जगत के लोगों के बारे में यह बात खासतौर पर सही मानी जा सकती है। यह काफी हद तक धर्म की तरह है। आखिर तमाम धर्मगुरु भी दूसरे धर्म के लोगों की आलोचना करते हैं जबकि उदारवादी लोग अपने साथ असहमति रखने वालों के प्रति घोर असहिष्णुता प्रदर्शित करते हैं।
लंबी है फेहरिस्त
भारत में रामानुज, यूरोप में मार्टिन लूथर, अरब में सूफी, फ्रांस में रिपब्लिकंस का समूह, इंगलैंड में ग्लैडस्टोन, अमेरिका में लिंकन, रूस में लेनिन, ब्रिटेन में थैचर, अमेरिका में रूजवेल्ट, सोवियत गणराज्य में गोर्बाचेव आदि सभी ने जब अपनी बात कहनी शुरू की तो शुरू में उनकी आलोचना की गई उन्हें अपमानित और निंदित किया गया। परंतु ऐसे सभी लोगों को यह श्रेय दिया जाना चाहिए कि वे अपनी बात पर टिके रहे। इसलिए क्योंकि वे अपने अनुभव से, कहीं अधिक गहराई से यह जान और समझ चुके थे कि पहले जो तौर तरीके कामयाब साबित हुए अब उन्होंने काम करना बंद कर दिया है। यही वजह है कि उनको बदलाव की आवश्यकता महसूस हुई और उन्होंने इसे हासिल करने का तरीका सुझाया।
ट्रंप जोरदार तरीके से यही काम कर रहे हैं। वह समाज को एक नए नजरिये पर विचार करने पर मजबूर कर रहे हैं। जो लोग उनको पूरी तरह खारिज कर रहे हैं वे अपने लिए भी कोई भला काम नहीं कर रहे हैं। दरअसल ट्रंप पहले ही विचारों की जंग जीत चुके हैं। उन्होंने प्राय: दुनियादार और शिष्टï बने रहने वाले लोगों को अपनी असलियत जाहिर करने पर मजबूर कर दिया है। वह उतनी ही बुरी है जितनी कि दुनिया का कोई यथास्थितिवादी होता है जब उसे चुनौती दी जाती है। पिछले 5,000 साल का इतिहास इसका गवाह है। आप उनके तौर तरीकों पर सवाल उठा सकते हैं लेकिन क्या उनका संदेश गलत है? वह बदलाव पर जोर दे रहे हैं हालांकि वह इस काम को निहायत ठेठ तरीके से अंजाम दे रहे हैं। इससे फर्क क्या पड़ता है? क्या इसका मतलब यह है कि पुनर्आकलन पर बल देने का एक खास तरीका है? अगर वास्तव में ऐसा है तो क्या इसका निर्धारण उन लोगों को करना चाहिए जिनको बदलाव से सबसे अधिक नुकसान संभव है?
प्रमाण
हमारे पास इसके तीन उदाहरण हैं। ये सभी क्रमश: अंतरराष्टï्रीय राजनीति, अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र से ताल्लुक रखते हैं। वास्तव में हम इसके जितने चाहे उतने उदाहरण ले सकते हैं और परिणाम यही रहेगा। ट्रंप ने हर किसी को अलग तरह से सोचने पर मजबूर किया है और अपने विश्वास पर पुनर्विचार करने पर भी। यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। अंतरराष्टï्रीय राजनीति में ट्रंप पर आरोप है कि उन्होंने साझेदारों को नीचा दिखाया और बतौर अंतरराष्टï्रीय ताकत अमेरिका का कद छोटा किया। परंतु कोई भी उनके इस प्रश्न का जवाब नहीं दे रहा है कि आखिर क्यों अमेरिका अमीर देशों की सुरक्षा का भुगतान करे? क्या कोई ऐसा करता है? क्या दुनिया के किसी अन्य देश ने सन 1945 से अब तक उस पैमाने पर यह काम किया है जिस पैमाने पर अमेरिका ने? इसका फायदा किसे मिलता है?
अर्थव्यवस्था की बात करें तो आरोप है कि ट्रंप वैश्वीकरण को खत्म कर रहे हैं। यह दावा कतई मजबूत नहीं है क्योंकि 20वीं सदी में पूंजी के प्रवाह, श्रम और व्यापारिक गतिविधियों को रोककर वैश्वीकरण को क्षति पहुंचाई गई। साफ कहा जा सकता है कि वैश्वीकरण का अंत 20वीं सदी में हुआ और उसके बाद से यह कभी पहले की तरह गति नहीं पकड़ सका। उसके बाद जो कुछ हुआ वह बहुत सीमित दायरे में। कई सारे नए देशों का उदय होने के बाद ऐसा होना स्वाभाविक भी था, वह भी लोकतांत्रिक शासनपद्घति वाले देशों का उदय। ट्रंप को इसलिए भी आलोचना का शिकार बनना पड़ रहा है क्योंकि उन्होंने कथित रूप से अमेरिका के उन्मुक्त और सहिष्णु चरित्र को नुकसान पहुंचाया है। इसके लिए उनकी आव्रजन नीति को दोषी बताया जा रहा है। लेकिन यह सच नहीं है। सच एकदम अलग है। सन 1700 से 1900 के बीच अमेरिका की श्वेत आबादी ने आव्रजन को खोला क्योंकि उनको सस्ते श्रमिकों की आवश्यकता थी। उस वक्त भी केवल श्वेत ही मुक्त थे जबकि शेष अपहृत ढंग से ही रखे जाते थे। उदाहरण के लिए 16वीं और 17वीं सदी के अफ्रीकियों की तरह और 19वीं सदी के चीनियों की तरह। चाहे जो भी हो लेकिन 1900 के तत्काल बाद मुक्त आव्रजन बंद हो गया।
आखिर में मैं यही कहना चाहूंगा कि व्यक्तियों द्वारा किया गया नुकसान ही अधिक अहम है। इस तर्क पर देखा जाए तो ट्रंप को गाली देने वाले लोगों में से कितने लोग ईमानदारी से यह बताएंगे कि ट्रंप के पूर्ववर्तियों ने सन 1945 के बाद से विदेशों में हुई जंग में कितने लोगों की जान ली होगी? क्या वह ठीक था? क्या उनका राष्टï्रवाद ट्रंप से बेहतर था?

Keyword: donald trump, america, international community,
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