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चुनावी जंग और अजब गजब रंग
निवेदिता मुखर्जी और करण चौधरी /  03 05, 2017

विधानसभा चुनाव

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में खबरों के लिए
निवेदिता मुखर्जी और करण चौधरी ने पूरे राज्य की खाक छानी 

झांसी का नाम आते ही हमारे दिलोदिमाग में झांसी की रानी यानी रानी लक्ष्मीबाई की तस्वीर उभर आती है। बुंदेलखंड का द्वार झांसी कभी एक स्वतंत्र रियासत थी लेकिन बाद में इस पर अंग्रेजों का कब्जा हो गया। मगर चुनावों के दौरान झांसी का हमारा अनुभव कुछ अलग था। चुनावों के चौथे चरण में हमें झांसी के साथ-साथ एक और शहर ललितपुर भी जाना था। दो राज्यों उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में फैले बुंदेलखंड की पहचान सूखी और पथरीली जमीन, गरीबी और पिछड़ेपन के तौर पर है। हाल के दिनों में यह क्षेत्र सूखे से प्रभावित सैकड़ों किसानों की आत्महत्या के कारण सुर्खियों में रहा। सूखे के कारण किसानों की फसल बरबाद हो गई और उनका कर्ज बढ़ता गया। ऐसे में उनके पास आत्महत्या करने के अलावा कोई चारा नहीं था। 

जल्दी ही हम भारत में एक अलग दुनिया की यात्रा पर जा रहे थे। दिल्ली से झांसी के लिए 70 से अधिक ट्रेनें उपलब्ध थीं लेकिन एक भी उड़ान नहीं थी। झांसी से सबसे नजदीकी हवाई अड्डा ग्वालियर में है जो 100 किलोमीटर दूर है। दिल्ली से ग्वालियर के लिए मुंबई और वाराणसी के रास्ते ही उड़ानें उपलब्ध थीं। इसलिए हमने ऐसी रेल को चुना जो सीधे झांसी जाकर रुकती थी। आगरा और मथुरा के बाद ट्रेन जब चंबल घाटी से गुजरी तो दिमाग में डकैतों की कहानियां ताजा हो गईं।

और फिर स्थानीय सफर

बुंदेलखंड जब चौथे चरण में चुनावों के लिए तैयार हो रहा था तो भगवान राम की नगरी अयोध्या में चुनाव प्रचार जोरों पर था। यह प्राचीन शहर है लेकिन आधुनिक संदर्भ में रामजन्मभूमि पर होने वाली किसी भी बहस का केंद्र है। फैजाबाद के करीब स्थित अयोध्या हमारी चुनावी यात्रा का एक पड़ाव था। उत्तर प्रदेश परिवहन निगम की बस से हमें लखनऊ से फैजाबाद पहुंचने में तीन घंटे लगे। प्रचार अभियान को कवर करने निकले पत्रकारों ने दो दिन तक फैजाबाद में डेरा डाले रखा। एक विक्रम ऑटो के जरिये हम 20 मिनट में अयोध्या पहुंचे। इस यात्रा में अयोध्या के साथ अमेठी भी शामिल थी जिसे गांधी परिवार के गढ़ के तौर पर जाना जाता है। उत्तर प्रदेश परिवहन निगम की बस से सुल्तानपुर पहुंचने में दो घंटे का समय लग गया। सुल्तानपुर से अमेठी हम वैन से पहुंचे। हमारा का ठिकाना सुल्तानपुर था क्योंकि अमेठी में कोई अच्छा होटल नहीं था। गड्ढों से भरी सड़कों पर सफर ने शरीर को बुरी तरह तोड़ दिया था मगर खबरों की लालसा में हम चलते रहे।

तीन पहिए या चार?

डेढ़ घंटे की देरी के बाद दुरंतो झांसी पहुंची। वहां पहुंचते ही जब हमने टैक्सी के बारे में पूछताछ की तो कुलियों ने एक अजीब सवाल पूछा। तीन पहियों की टैक्सी या चार पहियों की? आखिरकार हमें तिपहिया वाहनों से ही होटल पहुंचना पड़ा क्योंकि कोई टैक्सी उपलब्ध नहीं थी। दरअसल टैक्सियां शहर में चल रही शादियों, चुनावी रैलियों और झांसी से 180 किलोमीटर दूर पर्यटन नगरी खजुराहो में चल रहे एक बड़े मेले में व्यस्त थीं। इन्हीं कारणों से टैक्सी के अलावा अच्छे होटलों की भी कमी थी। ऐसे में हमारे पास यही विकल्प था कि कुछ साथी झांसी में रहें और कुछ ओरछा में। ओरछा मध्य प्रदेश का एक रमणीय शहर है। झांसी में राजनीतिक गतिविधियां चरम पर थीं। अखबार और टेलीविजन चैनल चुनावी खबरों से अटे पड़े थे। वहीं होटलों और सड़कों पर प्रचार अभियान और चुनावी पूर्वानुमान की चर्चा थी। कौन जीतेगा और कौन हारेगा। लाउडस्पीकरों पर चुनावी गीत और बॉलीवुड के गीतों की पैरोडी बज रही थी। ओरछा के एफएम स्टेशनों पर सारे दिन चुनाव की चर्चा हो रही थी। ओरछा में एक हेलीपैड पर विभिन्न दलों के स्टार प्रचारक चुनाव प्रचार के लिए आ जा रहे थे। इनमें मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी शामिल थे। वह हवाई मार्ग से ओरछा पहुंचे और फिर चुनाव प्रचार के लिए सड़क मार्ग से झांसी निकल गए।

पैसों का बोलबाला

चुनावों में नोटबंदी की भी चर्चा थी। दिल्ली से आए पत्रकारों के पास नकदी नहीं थी क्योंकि वहां अब भी एटीएम खाली पड़े थे। लेकिन उन्हें फैजाबाद पहुंचकर आश्चर्य हुआ क्योंकि एटीएम धड़ल्ले से पैसे उगल रहे थे। एक एटीएम पर मौजूदा गार्ड ने बताया कि नकदी लाने वाली वैन दिन में दो बार आती है ताकि 24 घंटे नकदी उपलब्ध रहे। उसने कहा, 'यहां किसी को भी नकदी निकालने के लिए इंतजार नहीं करना पड़ता है।' नकदी के मुक्त प्रवाह के अलावा उत्तर प्रदेश के संगीत उद्योग की भी खूब कमाई हो रही थी। राजनीतिक दल बढ़चढ़कर उनकी सेवाएं ले रहे थे। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के प्रचार अभियान में जहां 'यूपी को ये साथ पंसद है' का बॉलीवुड संस्करण बज रहा था तो वहीं भाजपा की थीम 'पप्पू को अखिलेश पसंद है, बहनजी को कैश पसंद है' थी। गायक और इवेंट मैनेजर राम आसरे ने कहा, 'चुनाव के दौरान हमारी अच्छी कमाई होती है। छोटे से शो से लेकर बड़ी-बड़ी रैलियों के लिए हम 30,000 रुपये से एक लाख रुपये लेते हैं।'

जातिवाद

झांसी के सराफा बाजार में भाजपा विरोधी लहर देखने को मिली क्योंकि नोटबंदी के कारण कारोबारी बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। कारोबारी भाजपा के निष्ठावान मतदाता माने जाते हैं लेकिन दुकानदार इस बात से खफा हैं कि पार्टी के किसी भी नेता ने उनकी सुध नहीं ली। लेकिन ललितपुर के जिलाधिकारी कार्यालय में अधिकारी नोटबंदी का कोई असर नहीं देखते हैं। उनका कहना है कि सबकुछ सामान्य है। ग्रामीणों, किसानों और प्रशासन की खबर रखने वाले गैर सरकारी संगठनों का कहना है कि चुनावों में नोटबंदी एक अहम मुद्दा है लेकिन जाति का मुद्दा उस पर भारी पड़ेगा। ललितपुर के दूरदराज में स्थित खिरिया छतारा गांव में 20 साल की रानी और उनके पड़ोसी किसानों की आत्महत्या और कर्ज माफ करने में सरकार की नाकामी से नाराज थे और बदलाव के लिए वोट देना चाहते थे। उधर फैजाबाद में भाजपा और बहुजन समाज पार्टी के बीच मुकाबला था। एक जाने माने होटल में 15 साल का एक बैरा बसपा का समर्थक था जबकि होटल का मालिक भाजपा का समर्थक। होटल मालिक ने पार्टी के लिए कई रैलियां भी आयोजित की थीं।

नौकरियां और वाईफाई

चुनाव प्रचार के दौरान उत्तर प्रदेश में स्थानीय स्तर पर कई रंग देखने को मिले। इनमें अयोध्या में रामजन्मभूमि स्थल पर स्थित दुकानों में 110 किलोग्राम का लड्डïू। झांसी में स्थानीय लोग इस आधार पर किसी नेता के रुतबे का आकलन करते दिखे कि उसने रैली के लिए कितना बड़ा मैदान बुक कराया। जनसभाओं में दौरान जहां अखिलेश की लोकप्रियता में इजाफा देखने को मिला वहीं उनकी पत्नी डिंपल यादव ने भी अच्छी खासी भीड़ खींची। एक युवा पार्टी कार्यकर्ता ने कहा, 'चाहे रैली कितनी भी दूर हो, मैं वहां जाता हूं और डिंपल भाभी का भाषण सुनता हूं।' उत्तर प्रदेश के लिए डिजिटल इंडिया, स्वच्छ भारत और मेक इन इंडिया अभी दूर की कौड़ी है क्योंकि राज्य को बिजली, सड़क और संचार व्यवस्था के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। युवाओं को जहां भी वाईफाई मिलता है वहीं वे व्हाट्सऐप से चिपक जाते हैं। इन चुनावों में जो भी जीते, युवाओं को नई सरकार से सबसे ज्यादा नौकरी और इंटरनेट कनेक्टिविटी की दरकार रहेगी।

Keyword: CSO, केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ),
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