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भारत कर चोरों की बहुतायत वाला देश है?
ईशान बख्शी /  March 05, 2017

यह सार्वजनिक बहस का मुद्दा बना हुआ है कि भारतीय अपना पूरा कर नहीं चुकाते हैं। यहां तक कि वित्त मंत्री अरुण जेटली भी अपने ताजा बजट में इसे लेकर आंकड़े पेश कर चुके हैं जिससे भारत के कर गैर-अनुपालन समाज होने के दावे की पुष्टिï होती है। लेकिन इस तरह का दृष्टिïकोण किस हद तक सही है? क्या कर अनुपालन, खासकर व्यक्तिगत आयकर के संदर्भ में कमजोर है? आंकड़े इन दोनों दिशाओं का संकेत देते हैं। 

 
अर्थशास्त्री आर्थिक समीक्षा (2015-16) की ओर इशारा करते हैं जिसमें दिखाया गया है कि उभरते देशों के लिए औसत कर-जीडीपी अनुपात 21.4 फीसदी है  जबकि भारत के लिए यह 16.6 फीसदी के साथ काफी कम है। यह अंतर प्रत्यक्ष कर के संदर्भ में काफी अधिक है जिसमें भारत का कर-जीडीपी अनुपात उभरते बाजारों के 7.4 फीसदी की तुलना में 5.6 फीसदी पर है। अप्रत्यक्ष कर के संदर्भ में, भारत का कर-जीडीपी अनुपात 10.1 फीसदी पर है जो उभरते बाजारों के 10.8 फीसदी के औसत की तुलना में कुछ ही कम है। 
 
लेकिन क्या उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ इस तरह लगातार तुलना करना उचित है? इस पर विचार करें कि उभरती अर्थव्यवस्था के तौर पर श्रेणीबद्घ किए जाने के बावजूद भारत की प्रति व्यक्ति आय अन्य उभरते देशों की तुलना में नीचे है। कर संग्रहण निश्चित रूप से आय पर निर्भर है। ब्रिक्स देशों का भी प्रति व्यक्ति आय स्तर भारत की तुलना में कम से कम पांच गुना पर है। वर्ष 2015 में भारत की प्रति व्यक्ति आय 1,598 डॉलर थी, जबकि चीन और ब्राजील के संदर्भ में यह आंकड़ा 8,027 डॉलर और 8,538 डॉलर प्रति व्यक्ति था। आदर्श तौर पर देशों के बीच कर तुलना आय के समान स्तरों पर होनी चाहिए। चूंकि उभरते देशों का दायरा भी विविध है, इसलिए हमें देश के अन्य वर्गीकरण पर विचार करना चाहिए। विश्व बैंक ने चार श्रेणियों में आय के आधार पर देशों का वर्गीकरण किया है- लो इनकम, लोअर मिडल इनकम, अपर मिडल इनकम और हाई इनकम। भारत 'लोअर मिडल इनकम' श्रेणी में आता है। 
 
विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, लोअर मिडल इनकम श्रेणी के देशों के लिए कर-जीडीपी अनुपात 2013 में 11.4 फीसदी था, जो भारत के 11 फीसदी की तुलना में अधिक है। लोअर मिडल इनकम श्रेणी में 38 देशों (जिनके आंकड़े उपलब्ध हैं) में से 24 का कर संग्रहण भारत की तुलना में अधिक था, लेकिन यह 20 फीसदी से नीचे था। उनका औसत कर-जीडीपी अनुपात 2011 में 15.1 फीसदी था। लेकिन इन देशों की प्रति व्यक्ति आय (2,524 डॉलर) भारत की तुलना में 72 प्रतिशत अधिक थी। इसके अलावा तथ्य यह है कि विश्व बैंक के आंकड़ों में सिर्फ केंद्र सरकार से संबंधित करों पर विचार किया गया है और इसमें राज्यों और नगर निगमों को चुकाए जाने वाले करों को अलग रखा गया है।
 
बहुस्तरीय कर व्यवस्था
 
भारत में राज्य सरकारों को कृषिगत आय और संपत्ति पर कर, सामान की बिक्री और खरीदारी पर कर, नशीले पदार्थों पर आबकारी शुल्क, वाहनों, वस्तुओं और यात्रियों पर कर, संपत्ति लेनदेन पर स्टांप शुल्क और पंजीकरण शुल्क, मनोरंजन कर और बिजली पर शुल्क आदि वसूलने का अधिकार है। इस तरह से कर का बड़ा वर्ग विश्व बैंक के अनुमानों में शामिल नहीं है।
 
जहां भारत में औसत प्रति व्यक्ति आय 1.16 लाख रुपये सालाना है, वहीं कर छूट सीमा 2.5 लाख रुपये पर दोगुनी से भी अधिक है। इस वजह से श्रम बल का बड़ा तबका कर दायरे से स्वत: ही बाहर है, खासकर ऐसे लोग कर दायरे से बाहर हैं जो अनौपचारिक क्षेत्र में काम करते हैं जहां पारिश्रमिक कम है। सेंटर फॉर बजट ऐंड गवर्नेंस अकाउंटेबिलिटी में अतिरिक्त समन्वयक (शोध) मालिनी चक्रवर्ती का कहना है, 'कामगारों का बड़ा तबका अनौपचारिक क्षेत्र से संबंधित है जहां पारिश्रमिक काफी कम है। आय के निम्न स्तर को देखते हुए इन्हें स्वत: ही अलग रखा गया है। अर्जेंटीना जैसी अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं में, औपचारिक क्षेत्र की भागीदारी भारत की तुलना में काफी अधिक है। इसकी वजह से वहां बड़ी तादाद में लोग कर दायरे में आते हैं।'
 
वर्ष 2014 के लिए कर रिकॉर्डों से पता चलता है कि टैक्स रिटर्न करने वाले 47 प्रतिशत लोग कोई कर नहीं चुकाते हैं, क्योंकि वे कर छूट सीमा से नीचे आते हैं। आपको इस तथ्य पर विचार करने की जरूरत है कि कृषि से आय को कर से मुक्त रखा गया है जिससे बड़ी आबादी स्वत: ही कर दायरे से दूर है। कृषिगत भूमि की बिक्री से प्राप्त लाभ को भी कर व्यवस्था से अलग रखा गया है। कोटक इंस्टीट्ïयूशनल इक्विटीज की रिपोर्ट के अनुसार 2010 से 2014 तक, भारत में कुल 1.226 करोड़ कारें बेची गई थीं। इनमें लगभग दो-तिहाई या 78 लाख कारों की वैल्यू 4 लाख रुपये से ऊपर थी। लेकिन जिस आंकड़े पर जोर दिया गया है, वह यह है कि 10 लाख रुपये से अधिक आय वाले लोगों की संख्या 2014 में सिर्फ 24 लाख थी। चूंकि यह मानना सहज है कि लोग अक्सर प्रत्येक तीन से पांच साल में कार खरीदते हैं, लेकिन ऐसे भी मामले हो सकते हैं कि इन लोगों ने कई कारें नहीं खरीदी हों। कारों की खरीदारी के लिए छूट के बाद भी कंपनियों द्वारा खरीदारी के आंकड़ों में तेजी नहीं आती है। इससे निम्न स्तरों के कर अनुपालन का पता चलता है। 
 
कॉरपोरेट स्तर पर, कर संग्रहण में कमी के संदर्भ में वित्त मंत्री ने कई कारकों को जिम्मेदार बताया  है जिनमें कम आय, कमजोर अनुपालन, अर्थव्यवस्था का ढांचा और सरकारों द्वारा दी जाने वाली छूट आदि मुख्य रूप से शामिल हैं। चक्रवर्ती का कहना है, 'छोटे उद्यमों के मामले में बात की जाए तो बड़ी तादाद में ये उद्यम कर दायरे में शामिल किए जाने के लिहाज से बहुत ज्यादा कमाई नहीं करते हैं।'  
 
अधिक छूट से दबाव
 
नैशनल इंस्टीट्ïयूट ऑफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी में प्रोफेसर गोविंद राव ने एक शोध पत्र में लिखा है, 'करों के सीमित आधार की एक महत्त्वपूर्ण वजह है प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों में दी जाने वाली विभिन्न रियायतें।' इसके अलावा अर्थव्यवस्था का ढांचा भी निर्भर करता है। कोटक इंस्टीट्ïयूशनल इक्विटीज में वरिष्ठï अर्थशास्त्री शुभदीप रक्षित कहते हैं, 'कुछ समस्या इसे लेकर भी है कि भारत में व्यवसाय कैसे पुनर्गठित किया जाए। यदि आप काफी हद तक नकदी के साथ काम कर रहे हैं तो इसकी आशंका अधिक है कि आप इससे संबंधित आंकड़ा पेश करने से परहेज करते हैं।' विभिन्न सरकारों ने कर आधार व्यापक बनाने की जरूरत तो महसूस की, लेकिन कृषि आय को कर दायरे में लाने का राजनीतिक रूप से साहस नहीं दिखाया गया। कुछ साल पहले जिस प्रस्ताव को लेकर चर्चा तेज हुई थी, वह आयकर समाप्त करने और अप्रत्यक्ष कर में वृद्घि किए जाने से जुड़ा हुआ था। 
Keyword: income tax, CBDT, आयकर विभाग कराधान,
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