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डेनमार्क की कंपनी को नहीं करना होगा भुगतान
अदालत से
एम जे एंटनी /  March 05, 2017

डेनमार्क की जहाजरानी कंपनी एपी मॉलर मेयस्र्क को अपने एजेंटों के लिए बनाए गए वैश्विक दूरसंचार केंद्र पर कर का भुगतान करने से राहत मिल गई है। उच्चतम न्यायालय ने कंपनी और आयकर विभाग के बीच चल रहे विवाद का निपटारा करते हुए कहा है कि मेयस्र्क का संचार केंद्र उसके कारोबार का अभिन्न हिस्सा है लिहाजा भारत और डेनमार्क के बीच दोहरे कराधान से बचाव के लिए हुए समझौते के तहत उस पर शुल्क नहीं लगाया जा सकता है। इसके साथ ही उच्चतम न्यायालय ने बम्बई उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा है। आयकर विभाग ने इस विदेशी कंपनी को अपने संचार केंद्र के लिए 20 फीसदी की दर से कर देने को कहा था। लेकिन कंपनी का कहना था कि उसके स्वचालित सॉफ्टवेयर प्रणाली मेयस्र्क नेट का इस्तेमाल भारत में उसके तीन एजेंट करते हैं और उसके लिए किसी तकनीकी सेवा की दरकार नहीं होती है। कंपनी के मुताबिक भारत में उसके कारोबार के सुचारू रूप से संचालन के लिए यह संचार केंद्र काम करता है। उच्चतम न्यायालय ने कंपनी की दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि एजेंटों की तरफ से कंपनी को जो भुगतान किया जाता है वह फीस न होकर असल में इस संचार प्रणाली के इस्तेमाल में लगी लागत की भरपाई होती है।

 
जेएसडब्ल्यू कंसोर्टियम को ठेका मिलने का रास्ता साफ
 
उच्चतम न्यायालय ने उड़ीसा उच्च न्यायालय के फैसले को निरस्त करते हुए जेएसडब्ल्यू इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड की अगुआई वाले कंसोर्टियम की अपील को स्वीकार कर लिया है। जेएसडब्ल्यू को पारादीप पोर्ट ट्रस्ट की दो गोदियों के मशीनीकरण का ठेका मिला था। वैश्विक निविदा में जेएसडब्ल्यू विजेता बनकर उभरा था लेकिन काकीनाडा सीपोट्र्स लिमिटेड, बोथरा शिपिंग और एमबीजी कमोडिटीज लिमिटेड के कंसोर्टियम ने उसे ठेका दिए जाने पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि इससे एकाधिकार पैदा होगा। उच्च न्यायालय ने विरोधी कंसोर्टियम के पक्ष में फैसला दिया था लेकिन उच्चतम न्यायालय ने उसे पलट दिया है। उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि बंदरगाह पर पहले से ही पांच अन्य निजी कंपनियों के सक्रिय होने से एकाधिकार होने की आशंका में कोई दम नहीं है। उसने यह भी कहा है कि पोर्ट ट्रस्ट ने निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए यह ठेका जेएसडब्ल्यू को आवंटित किया है लिहाजा न्यायालय का इसमें दखल देने का कोई औचित्य नहीं है।
 
बीमा कंपनी पहले मुआवजा दे, बाद में करे वसूली
 
अगर ड्राइवर की लापरवाही से कोई सड़क हादसा होता है तो उस वाहन का बीमा करने वाली कंपनी को शुरुआत में पीडि़त को मुआवजा देना होगा और फिर बाद में वह वाहन के मालिक से उसकी वसूली कर सकती है। उच्चतम ने हादसों के मुआवजे से संबंधित दो मामलों का निपटारा करते हुए यह व्यवस्था दी है। असम के जोरहाट में ड्राइवर की लापरवाही के चलते हुए एक हादसे में दो लोगों की मौत हो गई थी। उनकी विधवाओं को मोटर वाहन दुर्घटना दावा निपटान अधिकरण ने क्रमश: 25 लाख और 24 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया था। हालांकि अधिकरण ने यह रकम देने का निर्देश बीमा कंपनी को नहीं बल्कि वाहन के मालिक को दिया था। गौहाटी उच्च न्यायालय में दोनों विधवाओं ने अपील कर अधिक मुआवजे की मांग की लेकिन उसे नकार दिया गया। इसके साथ ही मुआवजे का भुगतान वाहन मालिक को ही करने को कहा। उच्चतम न्यायालय में मामला पहुंचने पर उसने कहा कि इस केस में 'पहले भुगतान फिर वसूली' का नियम लागू होगा। इस तरह यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी को पहले मुआवजे का भुगतान करना होगा और बाद में उसे वाहन के मालिक से वसूल सकते हैं।
 
मध्यस्थ को गलत जानकारी देने का दोषी पाया
 
अगर कोई विवादित पक्ष एकतरफा ढंग से मध्यस्थता प्रक्रिया का शुरू करता है और मध्यस्थ भी विरोधी पक्ष के खिलाफ आदेश पारित कर देता है तो मध्यस्थता अधिकरण के उस फैसले को निरर्थक माना जाएगा। इसके साथ ही अगर मध्यस्थ इसकी जानकारी नहीं देते हैं कि वह उस पक्ष से संबंधित किसी अन्य मामले को भी देख रहे हैं तो भी उस फैसले को गैरकानूनी माना जाएगा। दिल्ली उच्च न्यायालय ने अलुप्रो बिल्डिंग सिस्टम्स लिमिटेड बनाम ओजोन ओवरसीज लिमिटेड वाद पर दिए अपने एक फैसले में मध्यस्थता पर स्थिति स्पष्ट की है। अलुप्रो को दिल्ली मेट्रो से एक ठेका मिला था जिसके बाद माल मंगाने के लिए ओजोन कंपनी को अग्रिम भुगतान भी कर दिया था। कुछ समय बाद अलुप्रो को मध्यस्थ की तरफ से एक नोटिस मिला जिसमें ओजोन की तरफ से किए गए दावों के बारे जानकारी मांगी गई। अलुप्रो ने मध्यस्थ अधिकरण के क्षेत्राधिकार को चुनौती देते हुए कहा कि उसका ओजोन के साथ कोई मध्यस्थता करार हुआ ही नहीं था लिहाजा एकतरफा ढंग से मध्यस्थता प्रक्रिया शुरू करना मध्यस्थता एवं मेलमिलाप अधिनियम का उल्लंघन है। इसके जवाब में ओजोन ने उसके कागजात पेश करते हुए मध्यस्थता प्रावधान का दावा किया। अधिकरण ने अलुप्रो के पक्ष में फैसला सुनाने के साथ ही अपनी फीस भी उससे वसूली। उच्च न्यायालय ने इस पर कहा कि अलुप्रो को नोटिस दिए बगैर मध्यस्थता कार्यवाही शुरू करने को न्याय के मूलभूत नियम का उल्लंघन बताया है। इसके साथ ही मध्यस्थ ने ओजोन के साथ मध्यस्थ के रूप में जुड़ी अपनी भूमिका की भी जानकारी नहीं दी थी जो मध्यस्थता प्रक्रिया के स्वतंत्र एवं निष्पक्ष रहने की भावना के प्रतिकूल था।
 
केवल नाम के इस्तेमाल पर ट्रेडमार्क उल्लंघन नहीं 
 
कोई कंपनी किसी अन्य कंपनी के कॉर्पोरेट नाम का इस्तेमाल करने के बावजूद ट्रेडमार्क के उल्लंघन की दोषी नहीं मानी जा सकती है अगर दोनों के उत्पाद या सेवाएं एकसमान नहीं हैं। इस स्थिति में कंपनी के कामकाज पर रोक भी नहीं लगाई जा सकती है। बम्बई उच्च न्यायालय ने सिप्ला लिमिटेड बनाम सिप्ला इंडस्ट्रीज लिमिटेड वाद में ट्रेडमार्क अधिनियम की धारा 29 की व्याख्या करते हुए यह टिप्पणी की है। औषधि क्षेत्र की कंपनी सिप्ला ने आरोप लगाया था कि साबुनदानी, फोटो फ्रेम और सीढिय़ां बनाने वाली एक कंपनी उसके पंजीकृत नाम का इस्तेमाल कर रही है जो ट्रेडमार्क नियमों का खुला उल्लंघन है। इसी तरह के एक अन्य मामले रेमंड लिमिटेड बनाम रेमंड फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड वाद में दिए उच्च न्यायालय के फैसले पर अस्पष्टता को देखते हुए पूर्ण पीठ का गठन किया गया था। पीठ ने अपनी व्याख्या में कहा है कि किसी पंजीकृत कंपनी के नाम का इस्तेमाल करने भर से कोई कंपनी ट्रेडमार्क के उल्लंघन की दोषी नहीं मानी जा सकती है, इसमें उसके कारोबार क्षेत्र का भी ध्यान रखना होगा। 
 
व्हिस्की ब्रांड पर वर्चस्व की जंग
 
दिल्ली उच्च न्यायालय व्हिस्की ब्रांड ऑफिसर्स च्वॉयस बनाने वाली कंपनी एलाइड ब्लेंडर्स ऐंड डिस्टिलर्स और आर के डिस्टिलरीज के बीच के विवाद की सुनवाई करने के लिए तैयार हो गया है। पहले न्यायालय के एकल पीठ ने कहा था कि एलाइड ब्लेंडर्स का मुख्यालय मुंबई में होने से इस मामले में सुनवाई का अधिकार नहीं बनता है। लेकिन खंडपीठ ने उस फैसले को पलटते हुए विवाद की सुनवाई करने को कहा है। यह मामला रेग्यूलर च्वॉयस ब्रांड की व्हिस्की बनाने वाली कंपनी आर के डिस्टिलरीज के दिल्ली बाजार में प्रवेश पर रोक लगाने की मांग से जुड़ा है। फिलहाल इस ब्रांड की बिक्री केवल आंध्र प्रदेश में ही होती है। खंडपीठ ने कहा कि मामला दिल्ली बाजार में प्रवेश से संबंधित है लिहाजा इस पर सुनवाई करने का अधिकार दिल्ली उच्च न्यायालय का ही है।
Keyword: supreme court, high court,,
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