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दूरसंचार क्षेत्र का गठन और राह की अड़चन
श्याम पोनप्पा /  March 05, 2017

दूरसंचार क्षेत्र में हम फिलहाल कहां हैं और हमें वास्तव में कहां होना चाहिए, इसका विस्तार से विश्लेषण कर रहे हैं श्याम पोनप्पा 

 
देश में मोबाइल टेलीफोनी क्षेत्र में न केवल धीमापन आया है बल्कि इसमें एक तरह की गिरावट का चक्र शुरू हो गया है। रिलायंस जियो के आगमन के बाद एक दशक में पहली बार इसके राजस्व में करीब 20 फीसदी की गिरावट आई है। बीते एक दशक में सरकार ने 200,000 करोड़ रुपये के निवेश की मदद से करीब 300,000 करोड़ रुपये शुल्क और कर के रूप में जुटाए। उस दृष्टिï से देखा जाए तो लगता है कि इस क्षेत्र ने बहुत अच्छा प्रतिफल दिया है। विडंबना यह है कि ऐसा तब हो रहा है जब डिजिटल इंडिया को बढ़ावा देने की बात जोरशोर से चल रही है। जबकि दूरसंचार क्षेत्र की हकीकत यह है कि इस क्षेत्र में हालात खासे कठिन हैं। यहां बाजार एकदम परिपक्व है और औसत राजस्व में कमी आ रही है। इस बीच इस क्षेत्र में पूंजीगत व्यय की जरूरत बढ़ती जा रही है। 
 
संगठनात्मक मुद्दे व्यापक सामाजिक और राजनीतिक प्रकृति के हैं: (अ) एक समन्वित, काम करने का विभाजित तरीका, जिसमें बुनियादी ढांचे को लेकर हमारा रुख शामिल हो। इसमें खासतौर पर ब्रॉडबैंड और संचार शामिल हैं, (ब) एक विभाजनकारी राजनीतिक प्रक्रिया जो एकता को हतोत्साहित कर विभाजित अवसर तैयार करती है, (स) एक हतोत्साहित प्रशासन और तकनीकी तंत्र जिसके परिणामस्वरूप नौकरशाही, तकनीकविद और अन्य पेशेवर गतिरोध आदि ऐसी समस्याएं हैं जिनको हमें स्वीकार करना होगा और जिनसे निजात पाने की कोशिश करनी होगी। इन्हें नकारने से काम नहीं चलेगा। इस बारे में थोड़ा विस्तार से और गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। 
 
कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो देश में सरकारी विभाग अलग-अलग हिस्सों में बंटकर काम करते हैं बगैर सक्रिय कार्य संस्कृति और समन्वय की प्रक्रिया के। केंद्र और राज्य सरकारें जहां कैबिनेट सचिव तथा राज्यों के मुख्य सचिवों को अंतरविभागीय, मंत्रालयीन गतिवधियों में तालमेल के लिए प्रशासनिक प्रमुख बनाती हैं, वहीं विभाग अक्सर जानबूझकर या स्वाभाविक रूप से अंतर्मुखी बने रहते हैं। हालांकि इसमें यदाकदा अपवाद भी देखने को मिल जाते हैं। परंतु इन बातों के बीच भी जटिल अंतरविभागीय मसलों के हल के लिए सामूहिक रुख की आवश्यकता होती है।
 
जरा स्पेक्ट्रम के उदाहरण पर गौर करते हैं जो प्रत्येक देश के पास लगभग समान है। परंतु भारत में वाणिज्यिक इस्तेमाल के लिए इसकी कमी है। इसके अलावा स्पेक्ट्रम नीतियों को लेकर विभिन्न एजेंसियों के बीच तालमेल और समन्वय की भी आवश्यकता है। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) स्पेक्ट्रम के इस्तेमाल की अनुशंसा करता है। दूरसंचार मंत्रालय के दूरसंचार विभाग की वायरलेस प्लानिंग और कोऑर्डिनेशन शाखा स्पेक्ट्रम के आवंटन और उसकी लाइसेंसिंग का काम करती है। इसके अतिरिक्त सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन दूरदर्शन, अंतरिक्ष विभाग के अधीन इसरो और रक्षा मंत्रालय के अधीन एजेंसियों को स्पेक्ट्रम के खास बैंड दिए जाते हैं। आखिर में वित्त मंत्रालय तमाम सरकारी शुल्कों और संग्रह के लिए जिम्मेदार होता है। यह पूरा मामला इतना जटिल है कि समस्या उत्पन्न होने पर प्रधानमंत्री का हस्तक्षेप आवश्यक है। 
 
एक अतार्किक लेकिन व्यापक पैमाने पर मान्य विचार ऐसा है जो 2जी घोटाले पर सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के अनुरूप है। इसे नीलामी और सरकारी राजस्व बढ़ाने का समर्थक माना जाता है। यहां सरकार को अन्य नीतियां बनाने और उन पर अमल करने का अधिकार है, बावजूद इसके कि नीलामी सेवाओं पर बुरा असर डालती है और इसके परिणाम जनहित में नहीं हैं। 
 
लाभकारी नीतियों के लिए समस्याओं की वजह को तलाशना होगा और उनका विश्लेषण करना होगा। इसके बाद ही बचाव के संभावित उपाय अपनाए जा सकते हैं और नीतियों को जनहित के अनुरूप बनाया जा सकता है। क्या यह उम्मीद बहुत ज्यादा है? शायद लेकिन फिर भी यह बहुआयामी आवश्यकता का इकलौता पहलू है। एक अन्य अहम पहलू यह है कि हमारी राजनीतिक प्रक्रिया व्यवस्था और समन्वय के उलट अव्यवस्था और अलगाव को तवज्जो देती है। वह गुटबाजी को बढ़ावा देती है, विरोध को खत्म करती है और अवसरवादी स्वहित के लिए काम करती है। हमारी राजनीतिक व्यवस्था की बुनावट ही कुछ ऐसी है कि वह विभाजनकारी और समस्या पैदा करने वाले हथकंडे अपनाती है। ये हथकंडे लोकलुभावन होते हैं और सहमति बनाने की तुलना में कहीं अधिक कारगर साबित होते हैं क्योंकि सीमित हितों को लेकर काम करने वाले राजनेताओं को फंडिंग कहीं अधिक आसानी से मिलती है, बजाय उनके जो एकमत होकर काम करने में यकीन रखते हैं। यह बात राजनीतिक फंडिंग की समस्या को उजागर करती है। साथ ही इसे सामाजिक लाभ के साथ सुसंगत बनाने के भी बजाय कि उसके मौजूदा स्वरूप के। 
 
सकारात्मक हल तलाश करने की तीसरी पूर्व शर्त है पेशेवर व्यवहार और योग्यता को बढ़ावा देना। फिलहाल इसकी जगह एक तरह के सामंती व्यवहार ने ले रखी है। ऐसी स्थिति प्रशासनिक काम देखने वालों के लिए कठिनाई भरी है और इसके चलते पेशेवर लोग भी निष्पक्ष आकलन और अनुशंसाएं नहीं कर पाते। खासतौर पर उन जगहों पर जहां बदलाव की आवश्यकता है। रस्मी प्रक्रियाओं को अपनाए रहना आसान तो है लेकिन उसके नुकसान भी हैं। उसका एक सीधा उदाहरण है सार्वजनिक संसाधनों की नीलामी। जबकि जरूरत इस बात की है कि हम आगे बढ़कर यह स्वीकार करें कि हमें उद्यमों में राजस्व उत्पन्न करने वाली व्यवस्था लागू करने की जरूरत है। उसके बाद ही सरकार को कर संग्रह करने या अन्य शुल्क लगाने पर विचार करना चाहिए। अक्सर नीलामी की प्रक्रिया पारदर्शिता के मामले में अन्य विकल्पों से कमतर रहती है। उत्पादन और राजस्व साझेदारी इसका उदाहरण माने जा सकते हैं। दूरसंचार लाइसेंसिंग की प्रक्रिया में हम ऐसा देख चुके हैं। इनकी मदद से नीलामी की तुलना में 10 गुना तक अधिक राजस्व अर्जित हुआ। सर्वोच्च न्यायालय भी वर्ष 2012 में खनन फ्रैंचाइजी के मामले में नीलामी को नकार चुका है लेकिन फिर भी हम नीलामी की ओर झुकाव रखते हैं। सर्वोच्च न्यायालय अपने निर्णय में कहता है, 'दरअसल इस प्रमुख विचार में दर्ज निष्कर्ष को लेकर कोई संदेह नहीं है कि मूल्यनिर्धारण की कई व्यवस्थाओं में से नीलामी एक है और उसे प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन का इकलौता उचित तरीका नहीं ठहराया जा सकता।'
 
दरअसल इस्तेमाल में लाए जा रहे प्राकृतिक संसाधन के बदले उचित मूल्यांकन आवश्यक है। यह राजस्व के रूप में भी हो सकता है और जनहित के रूप में भी। राजनेता और प्रशासक इसका पाठ इस रूप में करते हैं कि नीलामी कहीं अधिक सुरक्षित है। वे इस तथ्य की अनदेखी करते हैं कि स्पेक्ट्रम व्यय होने वाला संसाधन नहीं है, उसका दोबारा इस्तेमाल संभव है। इसलिए इसमें जनहित का ध्यान नहीं रखे जाने का कोई बचाव भी नहीं है।
Keyword: telecom, jobs, दूरसंचार, रिलायंस जियो,
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