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दक्षिण से उत्तर को चलीं तापसी पन्नू
रंजीता गणेशन /  March 03, 2017

हिंदी फिल्म जगत में थोड़े ही समय में अपनी अलग पहचान बना चुकीं तापसी पन्नू बॉलीवुड की अगली सनसनी हो सकती हैं। इस प्रतिभाशाली अभिनेत्री के बारे में विस्तार से बता रही हैं रंजीता गणेशन


दक्षिण भारत में आम तौर पर आपको ऐसा नहीं दिखेगा कि एमबीए करने की हसरत रखने वाला कोई शख्स परीक्षा में बैठे ही नहीं। लेकिन तापसी पन्नू ने ऐसा ही किया और आज देखिए उसका नतीजा कितना खूबसूरत है। इंजीनियर से मॉडल बनी दिल्ली की इस लड़की ने सात साल पहले जब दक्षिण भारतीय फिल्मों का रुख किया तो द्रविड़ भाषाओं यानी विंध्याचल के उस पार की भाषाओं में से किसी का एक भी शब्द वह नहीं बोल पाती थीं। इसलिए उनकी ज्यादा महत्त्वाकांक्षा भी नहीं थीं। उन्होंने फिल्मों की पटकथाएं तो पढऩी शुरू कीं, लेकिन कैट (कॉमन एडमिशन टेस्ट) की तैयारी भी करती रहीं। मगर किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। तेलुगु फिल्म झुमंडी नादम (2010) और तमिल फिल्म आडुकलाम (2011) से उन्हें जबरदस्त पहचान मिली और तापसी ने सिनेमा को ही अपना मुकाम बना लिया।
तापसी दक्षिण भारत में ही नहीं रुकीं। उन्होंने मुंबई का रुख किया और 'पिंक' या 'बेबी' जैसी फिल्मों में मंझा हुआ काम कर लोगों के बीच अपनी पहचान बना ली। अदालती कार्यवाही पर आधारित पिंक में उन्होंने यौन प्रताडऩा की शिकार लड़की का किरदार निभाया और अमिताभ बच्चन जैसे कद्दावर अभिनेता के सामने भी वह कहीं से फीकी नहीं पड़ीं। इस फिल्म के लिए उन्हें समीक्षकों की वाहवाही भी मिली। बेबी फिल्म में विदेशी खुफिया एजेंट की उनकी भूमिका छोटी बेशक थी, लेकिन खासी प्रभावशाली रही और उन्होंने अलग छाप छोड़ी।
2017 में तापसी की चार फिल्में आ रही हैं और उनकी पहचान पुख्ता होती जा रही है। इसके साथ ही वह उन अदाकारों की जमात में शामिल होती जा रही हैं, जो किसी फिल्मी परिवार से ताल्लुक नहीं रखने और किसी बड़े नाम का सहारा नहीं होने के बावजूद एक मुकाम हासिल कर चुके हैं। वह कहती हैं, 'मेरे परिवार में पिछली चार पीढिय़ों में किसी का भी फिल्मों से कोई नाता नहीं रहा।'
वह तीन साल पहले ही मुंबई आ गई थीं, लेकिन दक्षिण भारतीय फिल्मों से उनका रिश्ता अब भी बरकरार है। उन्होंने ज्यादातर काम तेलुगु फिल्मों में ही किया है और वहां उनका रुतबा किसी रानी से कम नहीं है। ऐसी रानी का, जिसके सामने सेट के कर्मचारी बैठने से भी इनकार कर देते हैं, खड़े रहते हैं। लेकिन बॉलीवुड में ऐसा नहीं है। यहां कोई काम कराने के लिए उन्हें अपने कर्मचारियों को कई बार आवाज देनी पड़ती है। अभी उनमें बॉलीवुड स्टार जैसी ठसक नहीं आई है। लेकिन जिसने कभी फिल्मों के बारे में सोचा भी न हो, उसके लिए यह सफलता किसी बोनस की तरह है। 17वीं मंजिल पर अपने अपार्टमेंट में सोफे पर बैठी तापसी ने कहा, 'मैंने जिस भी निदेशक के साथ काम किया, उसने मेरी काबिलियत देखकर मुझे बार-बार काम दिया। मैंने जो भी किरदार किया, उसने सनसनी फैला दी।'  हकीकत तो यही है कि तापसी ने जो भी किरदार किए, उनके लिए उन्होंने ऑडिशन दिए ही नहीं। दिलचस्प है कि जब भी उन्होंने ऑडिशन दिए, वह बुरी तरह नाकाम रहीं। वह कबूल भी करती हैं, 'मैं केवल कैमरे के आगे बात कर ही नहीं सकती। मैं अभिनय तभी कर पाती हूं, जब वास्तविक माहौल हो और दूसरे लोग भी आसपास हों।' वह मानती हैं कि शूटिंग के दौरान स्वाभाविकता उनकी कमजोरी भी है और ताकत भी। उन्होंने कहा, 'परंपरागत ऑडिशन या ऐसी भूमिकाओं में मुझे संघर्ष करना पड़ता है जिनमें बार-बार पूर्वाभ्यास की जरूरत पड़ती है। लेकिन निर्देशकों को मेरी यही बात पसंद आती है।' पिंक फिल्म के निर्देशक अनिरुद्घ रॉय चौधरी भी उनकी इस बात से सहमत हैं। उन्होंने फोन पर बातचीत में कहा, 'पिंक में उन्होंने मीनल की भूमिका निभाई थी जिसमें एक्शन से ज्यादा रिएक्शन था। इसमें उनका कोई बड़ा संवाद नहीं था लेकिन कुछ दृश्यों में अपने अभिनय और भावुकता से जान डाल दी थी।'
तापसी के घर में सजावट का सामान नहीं के बराबर है। दीवार पर उनकी एक बड़ी तस्वीर टंगी है, जिस पर अंग्रेजी में जो भी लिखा है, उसका मतलब है, 'वही करिए जो आपके मन को भाए।' मध्य वर्ग की उनकी जड़ें उस समय साफ झलकती हैं जब वह घर आए मेहमानों के लिए खुद ही पानी और चॉकलेट लेने के लिए गायब हो जाती हैं। उनका जन्म एक सिख परिवार में हुआ और लालन पालन उत्तरी दिल्ली में। उन्हें गली मोहल्ले में खेलना बहुत पसंद था। उन्होंने कहा, 'बचपन में मैं बहुत नटखट थी।' अब इसकी कल्पना करना मुश्किल हैं क्योंकि उनकी चाल बेहद नपीतुली और सलीकेदार है। तापसी का कहना है कि बचपन में वह पढ़ाई में बहुत तेज थीं। लिहाजा, उनके पास दूसरी गतिविधियों में हिस्सा लेने की आजादी थी। वह कहती हैं, 'परीक्षा से एकाध दिन पहले कुछ घंटे की पढ़ाई से ही मैं अच्छा प्रदर्शन कर सकती हूं। इसलिए किसी को कोई शिकायत नहीं रहती थी।' तापसी इंजीनियरिंग कॉलेज में सॉफ्टवेयर की पढ़ाई कर रही थीं लेकिन दूसरे साल में ही उनका मन उचट गया। कॉलेज के जलसों में हिस्सा लेने के लिए उन्होंने लड़कियों का डांस ग्रुप बनाया और जेब खर्च के लिए मॉडलिंग शुरू कर दी। उन्हें फिल्मों का शौक नहीं था और उन्होंने कभी किसी नाटक में हिस्सा नहीं लिया। तापसी ने कहा, 'कोई नाटक नहीं, यहां तक कि कभी सिंड्रेला जैसा कुछ भी नहीं किया।' लेकिन उनका प्यारा और गोल चेहरा तथा मुस्कान दक्षिण भारतीय फिल्मकारों को बहुत पसंद आया और उन्हें काम मिल गया। उनका कहना था कि वे भाषा सिखा सकते हैं। इसमें कोई मुश्किल नहीं है क्योंकि उत्तर भारत की कई लड़कियां पहले ऐसा कर चुकी हैं। तापसी ने गूगल पर इन निर्देशकों के बारे में खोजबीन की और दक्षिण भारतीय फिल्मों की राह पकड़ ली। ये निर्देशक थे श्रीदेवी को पर्दे पर लाने वाले के राघवेंद्र राव और वेत्रीमारन। वेत्रीमारन की पहली फिल्म को दर्शकों और समीक्षकों ने काफी सराहा था। 
दक्षिण भारतीय फिल्मों में काम करने के दौरान कई मौके आए जब तापसी को युवा अभिनेत्री के तौर पर संघर्ष करना पड़ा। इस दौरान उन्होंने स्थानीय मैनेजरों पर भरोसा किया। तापसी ने कहा, 'वहां अभिनेत्रियों में बड़े अभिनेताओं और निर्माताओं के साथ काम करने का चलन था, चाहे भूमिका कैसी भी हो।' लेकिन अब वह सोच समझकर भूमिकाएं करती हैं।
उनकी अगली मंजिल बॉलीवुड ही होनी थी क्योंकि उत्तर भारतीय संस्कृति में वह रची-बसी थीं। 2013 में डेविड धवन अपनी फिल्म 'चश्मेबद्दूर' के लिए किसी चुलबुली युवा अभिनेत्री की तलाश में थे, बिल्कुल प्रीति जिंटा जैसी। तब किसी ने उन्हें तापसी का नाम सुझाया। हालांकि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही, लेकिन इससे तापसी को कुछ और काम मिल गया। उन्होंने कहा कि बॉलीवुड में आने वाले अधिकांश लोगों को सिनेमा का कुछ-कुछ ज्ञान होता है जो उनके पास नहीं था। लेकिन उन्होंने अपनी शख्सियत की खूबियों को पर्दे पर उकेरने की कला सीख ली है। वह पहले निर्देशक से अपनी भूमिका के बारे में विस्तार से समझती हैं और फिर उस चरित्र से संबंधित वीडियो देखती हैं या उस तरह के लोगों से मिलती हैं। तापसी कहती हैं कि उनका फिल्म जगत में कोई दोस्त नहीं है और वह हमेशा वास्तविक लोगों से घिरी रहती हैं। वे लोग ही उन्हें आम चरित्र निभाने में मदद करते हैं।
रॉय चौधरी ने कहा कि तापसी को पर्दे पर एक भी शब्द बोलने का मौका नहीं दिया जाए तब भी वह अपनी भूमिका को साकार कर सकती हैं। उन्होंने कहा कि पिंक फिल्म में मीनल (तापसी) का चलती कार में यौन शोषण होता है। यह दृश्य तीन कैमरों की मदद से फिल्माया गया था। जब हमने यह दृश्य सेट पर दिखाया तो वह इतनी असहाय लग रही थीं कि बलात्कारी की भूमिका निभा रहे अभिनेता विजय वर्मा के आंसू निकल आए।
नीरज पांडे ने बेबी के निर्देशन के दौरान ही अपने दिमाग में उसी शृंखला की अगली फिल्म 'नाम शबाना' की पटकथा रचनी शुरू कर दी। बेबी में तापसी की छोटी भूमिका थी, लेकिन अगली फिल्म में वह मुख्य भूमिका में हैं। पांडे बताते हैं, 'इस चरित्र के बारे में एक रहस्य था। यह नहीं बताया गया था कि वह कहां से आई है और वह एजेंट कैसे बनीं। मैंने तभी उनसे कह दिया था कि अगर बेबी चल गई तो एक और फिल्म आएगी।'
पांडे को लगता है कि तापसी की सफलता का राज उनकी कड़ी मेहनत है। तापसी ने कहा कि वह हमेशा खुश रहती हैं और वह इतना खुश रहती हैं कि किसी भावुक दृश्य को फिल्माने से पहले कम से कम 30 मिनट एकांत में रहती हैं ताकि गमगीन दृश्यों पर अपना ध्यान केंद्रित कर सकें। उन्होंने कहा, 'अगर मैं किसी से बात करती हूं तो मुझे वह दर्द महसूस नहीं होगा।'
अपनी ताजा फिल्म 'रनिंग शादी' के  लिए तापसी को इस स्थिति से नहीं गुजरना पड़ा क्योंकि यह हास्य फिल्म है। इसका निर्देशन निर्माता निर्देशक शुजीत सरकार ने किया है। इस फिल्म में उन्हें कोई दिक्कत इसलिए भी नहीं आई क्योंकि उनका किरदार उनकी निजी जिंदगी से बिल्कुल मिलता जुलता है। इसमें उनकी भूमिका अमृतसर की एक सरदारनी की है जो हटकर शादी कराने वाली कंपनी चलाती है। असल जिंदगी में तापसी का खुद भी वेडिंग प्लानिंग का कारोबार है, जिसे वह अपनी बहन शगुन और एक दोस्त के साथ मिलकर चलाती हैं।
तापसी फिलहाल भविष्य के बारे में नहीं सोच रही हैं क्योंकि कुछ भी उनकी उम्मीदों के मुताबिक नहीं होता है। वह चंचल स्वभाव की है और अच्छी तरह जानती हैं कि चीजें कल्पना से परे हो सकती हैं। कई दूसरी चीजों में भी उनकी दिलचस्पी है जैसे सैर करना और छोटे कारोबार शुरू करना। अगर कभी उनका अभिनय से मन ऊब गया तो वह बोरिया बिस्तर बांध कर दूसरे शौक पूरे कर सकती हैं। संभव है कि वह कैट की अपनी पुरानी किताबों को भी झाड़ पोछ लें।

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