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फिल्म प्रमाणन बोर्ड की आपत्तियां और रचनात्मक आजादी का प्रश्न
मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  March 03, 2017

जहां तक मेरी जानकारी है, बहुत संभव है लिपस्टिक अंडर माई बुरका एक निहायत बकवास फिल्म हो। पिछले साल देश में रिलीज हुई 1,902 फिल्मों में से कई ऐसी ही थीं। लेकिन उनमें से प्रत्येक को रिलीज होने का अधिकार तो है ही क्योंकि इस कारोबार में अंतिम निर्णय तो दर्शकों को ही लेना है। देश की फिल्मों के कुल 13,820 करोड़ रुपये के कारोबार में से तीन चौथाई से अधिक हिस्सा टिकटों की बिक्री से ही आता है। भारतीय दर्शक अपनी जेब से खर्च करके किसी फिल्म के बारे में अपना निर्णय सुनाते हैं। अगर उनको फिल्म पसंद नहीं आती है तो वे उसकी बुराई भी करते हैं। अगर उन्होंने ऐसा किया तो यह बात तेजी से फैलती है और फिल्म बॉक्स ऑफिस पर नाकाम हो जाती है।
केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) ने इस फिल्म के सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए प्रमाणपत्र देने से इनकार कर दिया है। इस फिल्म की रिलीज को लेकर पिछले पूरे सप्ताह जो विवाद छिड़ा रहा उसके केंद्र में यही बात रही कि सीबीएफसी महिलाओं के मुद्दों को लेकर एकदम सचेत नहीं है और वह इस विषय में पक्षपात कर रहा है आदि।
इन सब बातों से क्या तात्पर्य निकलता है? सीबीएफसी एक ऐसी सांविधिक संस्था है जिसका काम है फिल्म की विषयवस्तु को प्रमाणित करना। इसकी स्थापना सन 1952 में सिनेमेटोग्राफ अधिनियम के तहत की गई थी। यह सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन काम करता है। अधिनियम कहता है कि अगर किसी फिल्म का कोई भी हिस्सा देश की संप्रभुता, एकता और सुरक्षा के खिलाफ या मित्र राष्टï्रों के खिलाफ, सार्वजनिक व्यवस्था के खिलाफ जाता है, उसमें किसी तरह की अवमानना, न्यायालय की अवमानना या मर्यादाहीनता प्रदर्शित की जाती है या फिर उसके चलते किसी तरह का अपराध होने की आशंका होती है तो तो उसे प्रदर्शित नहीं किया जा सकता। सन 1991 के दिशानिर्देश के आधार पर यह एक प्रमाणपत्र जारी करता है जो कहता है कि फिल्म को संवेदनशील और समाज के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। उसकी रचनात्मक आजादी और कलाकारों की अभिव्यक्ति को बिना वजह सीमित नहीं करना चाहिए। प्रमाणन करते वक्त सामाजिक बदलावों का ध्यान रखा जाना चाहिए और इसका सौंदर्यबोध कुछ ऐसा हो कि यह स्वस्थ और साफ सुथरा मनोरंजन करे।
इस आधार पर देखा जाए तो फिल्म प्रमाणन का काम काफी हद तक कुछ लोगों के द्वारा की जाने वाली व्याख्या तक सीमित रह जाता है। वे अपने विवेक से अच्छे और बुरे, नैतिक और अनैतिक का निर्णय लेते हैं। इसकी वजह से सीबीएफसी और फिल्मकारों के बीच कई बार विवाद की स्थिति बन चुकी है। गत वर्ष सरकार ने फिल्मकार श्याम बेनेगल के नेतृत्व में एक समिति की नियुक्ति की थी। इसके काम में फिल्म प्रमाणन की मौजूदा प्रक्रिया और दिशानिर्देश का अध्ययन करना और बदलाव की अनुशंसा शामिल थी। उसने अप्रैल 2016 में अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंप दी।
इसकी कुछ शुरुआती अनुशंसाओं में से एक कहती है कि सीबीएफसी का काम नैतिकता तय करना या यह बताना नहीं है कि कौन सी बात किसी मुद्दे को बढ़ाचढ़ाकर पेश कर रही है अथवा नहीं कर रही है? सीबीएफसी का दायरा मोटे तौर पर यह तय करने का है कि किस श्रेणी के दर्शक किसी खास थीम, कहानी, दृश्य आदि को देख सकते हैं। इस पर सवाल तभी खड़े होंगे जबकि संबंधित फिल्म सिनेमेटोग्राफ अधिनियम, 1952 की धारा 5बी (1) का उल्लंघन करती हो या फिर वह इस समिति की अनुशंसाओं द्वारा निर्धारित उच्चतम सीमाओं का उल्लंघन करती हो।
इन दोनों ही मामलों में सीबीएफसी अपने अधिकार क्षेत्र के अधीन ही किसी फिल्म का प्रमाणन खारिज करेगी। लेकिन उसे फिल्म काटने, उसमें सुधार या संशोधन करने की मांग करने का अधिकार नहीं है। सीबीएफसी को अपने वर्गीकरण में दर्शकों को एक तरह की सांविधिक चेतावनी देनी चाहिए कि दर्शक जो फिल्म देखने जा रहे हैं उसमें उन्हें क्या देखने को मिल सकता है। एक बार जब वह ऐसी चेतावनी जारी कर देता है तो फिर फिल्म देखने या न देखने का फैसला उस खास श्रेणी के दर्शकों के पाले में रह जाता है।
यह काफी हद तक उचित है। रिपोर्ट काफी समझदारी से तैयार की गई है और कोई भी व्यक्ति जो इस विषय पर सही जानकारी रखना चाहता है उसे इसे पढऩा चाहिए। इसके बावजूद यह रिपोर्ट ठंडे बस्ते में क्यों पड़ी हुई है यह बात समझ से परे है।
बार-बार इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि बच्चों और अन्य तरह के दर्शकों को एक खास तरह की फिल्म देखने से बचाने के लिए उसका वर्गीकरण किया जाना आवश्यक है। इससे एक नए तरह का दिशानिर्देश सामने आता है। विषयवस्तु, थीम, टोन और फिल्म का असर। इसके अलावा मुद्दा आधारित दिशानिर्देश भी हैं। मसलन भेदभाव, भाषा, नग्नता, नशा, यौनिकता, भय आदि। ये सभी श्रेणियों में  अलग-अलग स्तर पर लागू होंगे। समिति ने हिंसा और नग्नता आदि के चित्रण वाली फिल्मों को वयस्कों के लिए चेतावनी के साथ जारी करने की बात कही है।
आप यह दलील दे सकते हैं कि इन नए दिशानिर्देशों की भी व्याख्या की जा सकती है। ऐसे में सबकुछ इस बात पर निर्भर करता है कि सीबीएफसी के शीर्ष पद पर कौन बैठा है। लिपस्टिक अंडर माई बुरका नामक फिल्म में महिलाएं अपनी यौनिकता की तलाश कर रही हैं। ऐसे में अगर शीर्ष पर बैठे व्यक्ति को लगता है कि यह देश के तमाम दर्शकों के लिए अनैतिक है  तो कहने के लिए कुछ रह ही नहीं जाता। दूसरा विकल्प यह है कि सीबीएफसी की व्यवस्था की खत्म कर दी जाए। परंतु एक ऐसे देश में जहां लोग हर चीज से आहत हो रहे हैं वहां यह सवाल तो बनता ही है कि क्या हम इतने परिपक्व हैं कि बिना ऐसे संस्थान के रह सकें?

Keyword: films, CBFC, cinematography,
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