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ओडिशा के विकास से निकले सबक
अशोक लाहिड़ी /  March 02, 2017

ओडिशा के आर्थिक विकास क्रम पर आधारित एक पुस्तक कई अन्य राज्यों के लिए मार्गदर्शक की भूमिका निभा सकती है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं अशोक लाहिड़ी

 
इस समाचार पत्र में बीते दिनों प्रकाशित खबर के मुताबिक ओडिशा की वृद्घि दर देश के 7.94 फीसदी के राष्टï्रीय औसत से बेहतर है। वर्ष 2016-17 में भारत की वृद्घि दर 7.1 फीसदी रही। प्रति व्यक्ति शुद्घ राज्य घरेलू उत्पाद (एनएसडीपी) के मामले में भी ओडिशा की स्थिति में सुधार हुआ है और वह वर्ष 1993-94 से 2002-03 के दूसरे या तीसरे सबसे निचले राज्य के स्तर से बेहतर होकर वर्ष 2003-04 से 2014-15 के दौरान तीसरे-चौथे स्थान पर आ गया। क्या ओडिशा विकास के मार्ग पर अग्रसर है। 
 
हाल ही में प्रकाशित पुस्तक 'द इकनॉमी ऑफ ओडिशा' इस बारे में अहम जानकारी देती है। इस निबंध संग्रह का संपादन अर्थशास्त्र के तीन प्रतिष्ठिïत प्रोफेसरों ने किया है। पुस्तक परिचय में संपादक बताते हैं कि कैसे वर्ष 2003-04 ओडिशा के विकास संबंधी प्रदर्शन में एक अहम स्थान रखता है। राज्य की सालाना वृद्घि दर जो सन 1981-82 से 2002-03 तक 3.4 फीसदी थी वह 2003-04 से 2012-13 के बीच 7.9 फीसदी के स्तर पर आ गई। 
 
इतिहास पर नजर डालें तो पता चलता है कि सन 1950 और 1960 के दशक में जोडा और रायगड में फेरोमैंगनीज के संयंत्र लगे थे। इसके अलावा राजगंजपुर में सीमेंट फैक्टरी, ट्यूब फैक्टरी और चौदर में कागज मिली लगी थी। इसके अलावा हीराकुड में एल्युमीनियम और केबल फैक्टरी और माचकुंड में पनबिजली परियोजना स्थापित की गई थी। राउरकेला में सबसे बड़ा सरकारी इस्पात संयंत्र है। 
 
प्रदेश में हथकरघा और हस्तशिल्प करने वाले भी मौजूद हैं। परंतु पंचायत उद्योग योजना के तहत औद्योगिक सहकारी समितियों को बढ़ावा दिए जाने, उनको तमाम तरह की रियायत दिए जाने, परियोजना रिपोर्ट तैयार करने में मदद, तकनीकी और वित्तीय मदद तथा विपणन आदि में तमाम सहायता दिए जाने के बावजूद इससे संबंधित लघु और मझोले उद्यम विकसित नहीं हो सके। केवल पूंजी आधारित, बड़े उद्यम ही सामने आए जो खनिज क्षेत्र में थे। ओडिशा देश का नौवां सबसे बड़ा राज्य है और आबादी के लिहाज से यह 11वें स्थान पर होने के बावजूद सन 1969-70 में देश के औद्योगिक उत्पादन में इसका योगदान केवल 1.9 फीसदी रहा।
 
उदारीकरण यानी सन 1991 के बाद राज्य सरकार ने कारोबारियों के लिए सुगम माहौल बनाने का प्रयास किया। उसने रियायती दर पर जमीन दी, बिजली शुल्क में रियायत दी, ब्याज में छूट दी गई और कर रियायत भी दी गई। इसके अलावा उसने श्रम कानूनों में भी बदलाव किया ताकि उद्योग जगत आकर्षित हो। एनएसडीपी में उद्योग जगत की हिस्स्ेदारी भी सन 1980-81 के 20.2 फीसदी से बढ़कर 1991-2000 में 25.1 फीसदी और 2001-12 के बीच 28.4 फीसदी हो गई। 
 
इस अंतर को समझने के लिए गहन अध्ययन और शोध की आवश्यकता है। क्या उद्योग जगत के प्रति सरकार का रुख बदलने से यह बदलाव आया। या बुनियादी ढांचे पर जोर देने से? मसलन धामरा, कीर्तनिया और गोपालपुर में बने बंदरगाह? या फिर सन 1993 में फ्रेट इक्वलाइजेशन स्कीम की बदौलत? इस योजना के तहत सन 1952 से ही खनिज परिवहन पर सब्सिडी लागू थी। इसने राज्य को बिहार, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश के तर्ज पर लाभान्वित नहीं होने दिया। 
 
क्या बुनियादी ढांचे की कमी ने औद्योगिक विकास पर असर डाला? सन 1990 के दशक में सड़क निर्माण में कोई खास बढ़ोतरी देखने को नहीं मिली। वहीं रेलवे ट्रैक विस्तार के मामले में प्रदेश देश में नीचे से तीसरे नंबर पर रहा। इस मामले में यह केवल जम्मू कश्मीर तथा हिमाचल प्रदेश से ऊपर था। सन 1990 के दशक में बिजली की अधिकतम कमी 23.9 फीसदी थी जबकि राष्टï्रीय औसत 18.8 फीसदी था। 
 
ओडिशा में आर्थिक बदलाव देर से शुरू हुआ। लेकिन वह तेजी से राष्टï्रीय स्तर पर पकड़ बना रहा है। राज्य सकल घरेलू उत्पाद में कृषि की हिस्सेदारी अभी भी ज्यादा है। लेकिन यह सन 1980-81 के 54.6 फीसदी से घटकर 2009-10 में 17.3 फीसदी पर आ गई। यह गिरावट रोजगार में कृषि की हिस्सेदारी में आई कमी से भी तेज है। इसी अवधि में वह 73.3 फीसदी से घटकर 59.3 फीसदी पर आ गई। दिक्कत यह है कि जब इतने सारे लोग कृषि क्षेत्र में रोजगारशुदा हैं तो जीएसडीपी में इसकी कमजोर हिस्सेदारी आगे चलकर समस्या की वजह बनेगी। 
 
ओडिशा के विकास संबंधी हिस्से में कुछ रोचक जानकारी है। इसके मुताबिक देश के अन्य हिस्सों की तुलना में पोषण में ओडिशा बेहतर है जबकि यहां गरीबी अधिक है। इसके लिए राज्य के प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उत्पादन को वजह बताया गया है। देश के 147 किग्रा के औसत (पंजाब हरियाणा से इतर) के बरअक्स ओडिशा में यह 174 किलोग्राम है। चावल के उत्पादन ने खासतौर पर पोषण सुनिश्चित करने में मदद की है। इसकी वजह से रोजगार और आय दोनों बेहतर हुए हैं। इसके मुताबिक वर्ष 1993-94 और 2009-10 के बीच प्रति व्यक्ति कैलरी खपत ग्रामीण इलाके में 2199 कैलरी से घटकर 2126 पर आ गई। शहरी क्षेत्र में यह 2261 से घटकर 2096 पर आ गई। इसके लिए प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उत्पादन में कमी को जिम्मेदार ठहराया गया जो 2003-04 और 2009-10 के बीच 189 किग्रा से घटकर 183 किग्रा हो गया। 
 
पुस्तक के इस हिस्से में अधिक अन्न उपजाने की सलाह दी गई है। लेकिन यह सही हल नहीं है। असली समस्या खाद्यान्न की मात्रा में नहीं बल्कि उसके घटक में है। प्रदेश में चिकन और मछली के रूप में मांसाहारी भोजन बढ़ रहा है। वर्ष 1993-94 से 2011-12 के बीच बकरे का मांस खाने वालों की संख्या 30 फीसदी से घटकर 15 फीसदी रह गई। वहीं बीफ और भैंसे का मांस खाने वाले 6 फीसदी पर स्थिर रहे। वैसे भी देश में खाद्यान्न की कमी नहीं उसका आधिक्य है। पोषण में कमी और भारतीय खाद्य निगम के पास गेहूं और चावल का आधिक्य बताता है कि समस्या उत्पादन में नहीं बल्कि सरकारी खरीद, भंडारण वितरण और मूल्य निर्धारण नीतियों में है। 
 
औद्योगीकरण और औद्योगिकी रोजगार की मदद से प्रदेश में कृषि क्षेत्र में रोजगार कमी की जा सकती है। समस्या का हल भी यही है। उच्च मूल्य वाली फसल का उत्पादन, बेहतर प्रतिफल और उत्पादकता तथा भूमि अधिकारों का बेहतर प्रवर्तन आदि कृषि क्षेत्र के रोजगार में लगे लोगों की स्थिति भी बेहतर करेगा। इन सबके बावजूद विकास की प्रक्रिया में जीएसडीपी में कृषि का योगदान कम होगा। वृद्घि के लाभ के बेहतर वितरण के लिए ओडिशा को औद्योगीकरण करना होगा। इससे औद्योगिक रोजगार सृजित होंगे और लोग कृषि पर कम निर्भर होंगे। ओडिशा पर आधारित पुस्तक के लिए इससे बेहतर समय नहीं हो सकता था। राज्य एक दूसरे से सीखें और विकास को लेकर सार्थक बहस करें इसके लिए जरूरी है कि ऐसी कई और किताबें अलग-अलग राज्यों के बारे में आएं।
Keyword: ओडिशा, विकास, वृद्घि दर,
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