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पुराने रेलवे पुल और विरासत का सवाल
विवेक देवराय /  March 01, 2017

देश में कई रेलवे पुल सदियों पुराने हो चुके हैं लेकिन उनमें से कई को अब तक विरासती दर्जा तक नहीं दिया गया है। इसे लेकर कुछ विचारपरक बातें कह रहे हैं विवेक देवराय

 
जुबली ब्रिज एक पुराना रेलवे पुल था जो हुगली नदी पर नैहाटी और बंडेल के बीच स्थित था। इसमें ऐसी खासियतें थीं जो इंजीनियरिंग को लेकर उत्सुक लोगों को अपनी ओर खींचती थीं। यह एक कैंटीलीवर ट्रस ब्रिज था। यह ऐसा पुल होता है जो दो भुजाओं पर टिका होता है जो बीच में मिलती हैं। इस पुल के निर्माण में नट-बोल्ट के बजाय रिपट (एक किस्म की खूंटियों) का इस्तेमाल किया गया था। इसमें पेंडुलम बियरिंग का एक विशिष्टï गुण अलग होता है। 
 
पुल पर धातु की एक पट्टी लगी थी जिसे शायद सन 1940 के दशक में लगाया गया था। यह पट्टी हमें बताती है कि इसका निर्माण सन 1882 में शुरु हुआ था और सन 1887 में पूरा हुआ। इसका उद्घाटन 16 फरवरी, 1887 को तत्कालीन वायसराय और गवर्नर जनरल अर्ल डफरिन ने किया। चूंकि वह महारानी विक्टोरिया का 50वां (जुबली) वर्ष था इसलिए इस पुल को जुबली ब्रिज का नाम दे दिया गया। इस पट्टी पर पुल के डिजाइनरों और इंजीनियरों के नाम भी दर्ज हैं। वर्षों तक ईस्ट इंडियन रेलवे (ईआईआर) के इस बोर्ड में सहायक अभियंता का नाम गलत दर्ज रहा लेकिन शायद किसी ने उस पर ध्यान तक नहीं दिया। यह पुल पुराना हो चुका था और इसे बदलना जरूरी हो चला था। इसकी मरम्मत करना संभव नहीं था। 
 
समस्या का एक हिस्सा इसकी पेंडुलम बियरिंग से भी जुड़ा हुआ था जिसमें पारे का इस्तेमाल किया गया था। इसके समांतर एक नया पुल बनाया गया जिसका उद्घाटन 2016 में किया गया। इसे संप्रीति सेतु का नाम दिया गया। हालांकि कुछ लोग इसे नया जुबली पुल कहकर भी पुकारते हैं। अगर आपकी रुचि हो तो आपको बता दूं कि 17 अप्रैल 2016 को ट्रेन नंबर 13141 (तीस्ता-तोर्सा एक्सप्रेस) पुराने जुबली पुल का इस्तेमाल करने वाली आखिरी रेल थी। 
 
अब पुराने पुल का क्या होगा? इसे वहीं तो रहने नहीं दिया जा सकता। यह नदी में परिवहन को बाधित करेगा। जाहिर है इसे तोड़कर नीलामी कर दी जाएगी। इस प्रक्रिया में इतिहास का एक मूल्यवान और विरासती हिस्सा खो जाएगा। हमारे भाप से चलने वाले इंजनों के साथ भी कमोबेश यही हुआ। जहां तक मैं समझ पा रहा हूं। जुबली पुल के कुछ हिस्से को नीलामी से बचाकर कहीं रखा जाएगा। तमाम अन्य पुराने पुल भी हैं। भारतीय रेल के विरासत निदेशालय के पास अब ऐसे पुराने और विरासती पुलों के लिए इनवेंट्री है। इसकी सूची में आपको 21 पुलों का जिक्र मिलेगा और जुबली पुल का नाम आठवें क्रम पर मौजूद है। इसे हुगली घाट और गरीफा स्टेशन के बीच मौजूद पुल के रूप में दर्ज किया गया है। मुझे इस बारे में पता नहीं है कि लोहे का पुल के नाम से चर्चित दिल्ली का यमुना पुल इस विरासती सूची में शामिल किया गया है या नहीं। यह भी बहुत पुराना पुल है। इसका निर्माण 1863 से 1866 के दरमियान किया गया। इसके साथ के बने पुलों में नैनी का यमुना पुल 1865 में खोला गया था। उसका नाम भारतीय रेल की विरासती सूची में है। मुझे शक है कि दिल्ली के पुल का नाम इसलिए बाहर है क्योंकि विरासत की व्याख्या भारतीय रेल ने की है। इसमें विरासती जगह का निर्धारण संबंधित रेलवे जोन द्वारा किया जाना है। दिल्ली में रेलगाडिय़ों के लिए एक नया यमुना पुल बनाया जा रहा है। परंतु जुबली पुल की तरह पुराने यमुना पुल को नष्टï कर उसकी नीलामी नहीं की जाएगी। इसका इस्तेमाल सड़क यातायात के लिए किया जाएगा। 
 
हालांकि पुराने पुलों का आंकड़ा भारतीय रेल के पास मौजूद अवश्य होगा लेकिन इसे हासिल कर पाना आसान नहीं है। इसका सबसे बढिय़ा जरिया है सीएजी। ताजातरीन रिपोर्ट यानी रेलवे संबंधी वर्ष 2015 की ऑडिट रिपोर्ट क्रमांक 24 के मुताबिक देश में कुल 136,728 पुल हैं। इनमें से 36,470 पुल 100 वर्ष से अधिक पुराने हैं और 6,680 पुल 140 साल से ज्यादा पुराने हो चुके हैं। सन 1905 से पहले बने पुलों में स्टील में सल्फर की मात्रा अधिक होती थी इसलिए वे जल्दी जोखिम भरे हो गए। इन पुलों को तकनीकी तौर पर अप्रचलित करार दिया जा चुका है। कॉर्पोरेट सेफ्टी प्लान (सीएसपी) ने कहा कि इन सभी शुरुआती दौर के बने पुलों को चरणबद्घ तरीके से चलन से बाहर कर दिया जाएगा। इस दौरान इन पुलों के सुधार-पुनर्निर्माण की प्राथमिकता तय की जाएगी। लेकिन ऑडिट में पाया गया कि रेलवे बोर्ड ने प्रचलन से बाहर हो चुके पुलों को बंद करने के लिए कोई समय सीमा तय नहीं की है। 
 
मेरा मानना है कि ऐसा आंकड़ा होना चाहिए। इससे पहले वर्ष 2003 में सीएजी की तीन नंबर की रिपोर्ट में भी पुलों का उल्लेख किया गया था। वह आंकड़ा कहीं अधिक बेहतर था। बहरहाल, इसमें यह भी कहा गया था कि रेलवे प्रशासन के पास रेलवे पुलों से संबंधित समुचित रिकॉर्ड नहीं हैं। पुलों के काम की निगरानी के लिए यह आवश्यक है कि पुलों के निर्माण का समुचित रिकॉर्ड रखा जाए। यह भी देखा गया कि करीब 5,883 पुलों के निर्माण का वर्ष भी उल्लिखित नहीं था। इनमें से 1,850 पुल मध्य रेलवे के और 4,033 पुल पूर्वोत्तर रेलवे के थे। इसके अलावा भी रिकॉर्ड में तमाम कमियां थीं। 
 
सीएजी की दोनों रिपोर्ट पुराने पुलों के पुनर्वास में देरी की बात कहती हैं। वर्ष 2003 की कॉर्पोरेट सुरक्षा योजना में वादा किया गया था कि 2013 तक 2,700 पुराने पुलों को सुधारने या दोबारा बनाने का काम कर लिया जाएगा। इसके अलावा कहा गया कि अगले चार साल में 600 पुराने पुलों का पुनर्निर्माण और अगले 10 वर्ष में 19,000 तकनीकी रूप से पुराने पुलों का पुनस्र्थापन किया जाएगा। भारतीय रेल इस समय सीमा का पालन नहीं कर सकी। देश का सबसे पुराना रेलवे पुल कौन सा है? जानकारी के मुताबिक सन 1858 में बना डापोरी वायडक्ट सबसे पुराना पुल होना चाहिए। इसका निर्माण ग्रेट इंडियन पेनिसुलर रेलवे ने किया था। लेकिन इस प्रश्न से बच निकलने की भी एक राह मौजूद है। कबीनी (नंजनगढ़)का पुल 1735 में बना था और वह एक विरासती पुल है। पहले इसका इस्तेमाल सड़क परिवहन के लिए किया जाता था। जब वहां एक मीटरगेज लाइन बनी तो रेलवे ने भी उसका इस्तेमाल शुरू कर दिया। यह सन 1889 की बात है। इसे बड़ी लाइन में बदलने के बाद ट्रेनें एक अलग पुल का इस्तेमाल करती हैं। बहरहाल काबिनी पुल अभी भी मौजूद है। सन 1735 की निर्माण तिथि इसे दुनिया के सबसे पुराने पुलों में से एक के करीब ले जाती है। दुनिया का सबसे पुराना पुल इंगलैंड का कॉजी आर्क है जो सन 1725-26 में बना था। इसका निर्माण कोयला ढोने के लिए किया गया था। 
 
(लेखक नीति आयोग के सदस्य हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं)
Keyword: railway, नई रेल लाइन, पुराने रेलवे पुल,
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