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दूरसंचार बाजार में जारी है अव्वल होने की मारामारी
कारोबारी मंत्र
भूपेश भन्डारी /  February 28, 2017

रिलायंस जियो ने नया टैरिफ प्लान पेश किया है जिसके मुताबिक हर माह 303 रुपये में 30 जीबी डाटा दिया जाएगा। इसके साथ ही इस क्षेत्र में व्याप्त रहस्य तो समाप्त हो गया लेकिन मौजूदा कंपनियों की चिंता भी बढ़ गई। उनको न केवल अपने मौजूदा ग्राहकों का बड़ा हिस्सा रिलायंस जियो के हाथों गंवाना पड़ रहा है बल्कि दरों में कटौती भी करनी पड़ेगी। इसका असर उनके मुनाफे पर पड़ेगा। हालांकि इससे भारत में बड़ा बदलाव आया है लेकिन मुनाफे के साथ दूरसंचार कारोबार का रिश्ता उतार-चढ़ाव भरा रहा है। दस वर्ष से भी कम अवधि में यह मुनाफे पर तीसरा हमला है। पहला हमला वर्ष 2008-09 में हुआ था जब संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार ने नए लाइसेंस बांटे थे। वह कुख्यात पहले आओ, पहले पाओ की नीति थी। तब नई कंपनियों ने बेवकूफाना रूप से कम दरों की नीति के साथ शुरुआत की थी। तब पुरानी कंपनियों ने अपनी बाजार हिस्सेदारी बचाए रखने के लिए दरें कम कीं। 

 
इसके चलते काफी समय तक ऐसा लगता रहा कि दूरसंचार क्षेत्र अब कभी वापसी नहीं कर पाएगा। तब सर्वोच्च न्यायालय ने नए लाइसेंस रद्द किए और टैरिफ में सुधार होना शुरू हुआ। 
तब सरकार ने यह निर्णय कर लिया था कि स्पेक्ट्रम की नीलामी की जाएगी, बजाय उसका आवंटन करने के। सन 1990 के दशक के मध्य में आवंटित 20 वर्ष की लीज वाले स्पेक्ट्रम की अवधि समाप्त हो रही थी और हर माह लाखों नए ग्राहक बन रहे थे। तब नेटवर्कों के पास उस नीलामी में जोरदार बोली लगाने के अलावा कोई चारा नहीं था। आखिरकार उन सब को भारी कर्ज लेना पड़ा। उसका दबाव उन पर अब तक है। 
 
रिलायंस जियो के टैरिफ के रूप में तीसरा झटका लगा है। यह अब तक का सबसे सस्ता डाटा पैक साबित होने जा रहा है और इसका असर बाजार पर यकीनन पड़ेगा। अब तक पुराने नेटवर्क यह कह रहे थे कि रिलायंस जियो ने उनके उपभोक्ताओं में सेंध नहीं लगाई है और अधिकांश लोग रिलायंस जियो को एक अन्य सिम के साथ ही इस्तेमाल कर रहे हैं। आंकड़े जरूर बहुत रोचक हैं। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक जुलाई और अगस्त में 49.10 लाख और 51.3 लाख लोगों ने अन्य नेटवर्क में पोर्ट किया। रिलायंस जियो के आगमन के बाद भी ये आंकड़े स्थिर रहे। सितंबर में 50 लाख, अक्टूबर में 49.3 लाख, नवंबर में 47.6 लाख और दिसंबर में 56.7 लाख लोगों ने अपने नंबर पोर्ट किए। 
 
इसके साथ ही नए नंबर लेने का सिलसिला जो जुलाई और अगस्त में ऋणात्मक था वह इस अवधि में तेजी से ऊपर गया। सितंबर में 2.08 करोड़ नए नंबर लिए गए जबकि अक्टूबर में 2.86 करोड़, नवंबर में 2.1 करोड़ और दिसंबर में 2.78 करोड़ लोगों ने नए नंबर लिए। रिलायंस जियो का दावा है कि उसने अब तक 10 करोड़ से अधिक नए ग्राहक बनाए हैं। अगर ट्राई के आंकड़ों पर यकीन किया जाए तो यह माना जा सकता है कि उसके उपभोक्ताओं में से कई ने एक से अधिक नंबर रखे हैं। 
 
पुरानी कंपनियों का कहना है कि अधिकांश लोगों ने अपने पुराने नंबर बात करने के लिए रखे हैं और वे जियो का इस्तेमाल डाटा के लिए करते हैं। लेकिन इस बात से आत्मसंतुष्टï नहीं हुआ जा सकता है। शुरुआत में रिलायंस जियो की वॉयस सेवा में कुछ दिक्कत थी। उसने इसके लिए पुराने नेटवर्क को दोष दिया कि वे उसे उचित संचार नहीं मुहैया करा रहे हैं। हालांकि उन्होंने इसका जमकर खंडन भी किया। एक बार यह दिक्कत दूर हो जाने के बाद उपभोक्ताओं को दूसरे नेटवर्क की आवश्यकता नहीं होगी। चाहे जो भी हो लेकिन बाजार डाटा सेवा की ओर जा रहा है और वॉयस कॉल एक जिंस की तरह हो गई है। केवल बेहतर वॉयस कॉल के जरिये लंबे समय तक बाजार में टिके रहना मुश्किल है। 
 
अगर उनको रिलायंस जियो का मुकाबला करना है तो पुराने नेटवर्कों के पास कोई विकल्प नहीं है, बजाय कि ऐसे ही टैरिफ पेश करने के। रिलायंस जियो ने 303 रुपये वाली जो पेशकश की है वह 31 मार्च 2018 तक लागू रहेगी। तब तक इन नेटवर्कों को उसका मुकाबला करना होगा। यह उन्हें बहुत दिक्कत में डालेगा। प्रतीक्षा का दौर अब लंबा होता जा रहा है। देश में कुछ ही नेटवर्क ने धन कमाया है। जानकारी के लिए, किसी विदेशी कंपनी वोडाफोन, टेलीनॉर, मैक्सिस, डोकोमो या अन्य को भारत में मुनाफा नहीं हासिल हुआ। कुछ कंपनियों को अपना निवेश बट्टे खाते में डालना पड़ा। आने वाले कई सालों तक विदेशी निवेशकों का निवेश भारतीय दूरसंचार बाजार में फंसा ही रहेगा। जैसे-जैसे प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी इस क्षेत्र में मजबूती भी बढ़ेगी। रिलायंस कम्युनिकेशंस और एयरसेल ने कहा है कि वे विलय करेंगे। वोडाफोन और आइडिया सेल्युलर ने भी इस बात की पुष्टिï की है कि उनके बीच विलय की बातचीत चल रही है। इस बारे में जल्दी घोषणा हो सकती है। भारती एयरटेल टेलीनॉर का अधिग्रहण करने की बात कह चुकी है। 
 
इसका मतलब यह हुआ कि एक समय जहां 10 नेटवर्क थे वहीं अब आने वाले दिनों में चार या पांच मजबूत खिलाड़ी ही नजर आएंगे। विलय से इनको लागत कम करने में भी मदद मिलेगी लेकिन इससे उनको रिलायंस जियो का मुकाबला करने लायक मजबूती नहीं मिलेगी। इसके अलावा स्पेक्ट्रम स्वामित्व के मौजूदा नियम बाजार को और अधिक समावेशी नहीं बनने देंगे। इसलिए हमें देखना होगा कि दूरसंचार बाजार में आगे क्या होता है? दुनिया में कहीं भी सबसे बड़ा नेटवर्क धन कमाता है जबकि दूसरा किसी तरह चलता रहता है जबकि अन्य को नुकसान होता है। यही वजह है कि उपभोक्ताओं की संख्या के आधार पर सभी अव्वल आने की होड़ में हैं।
Keyword: telecom, jobs, दूरसंचार, रिलायंस जियो,
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