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मुद्रास्फीति का दबाव आरबीआई का रुख
अभीक बरुआ /  February 28, 2017

आरबीआई से दरों में कटौती की उम्मीद करने वालों को अब यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि अधिक नियम आधारित मॉडल अपनाने की कीमत ऊंची दरों के रूप में चुकानी पड़ रही है। बता रहे हैं अभीक बरुआ

 
बाजार की दरों में कटौती की अपेक्षाओं के बीच पिछले दिनों नीतिगत दरों को पुराने स्तर पर बरकरार रखने के भारतीय रिजर्व बैंक के निर्णय ने बॉन्ड बाजार में जबरदस्त बिकवाली की राह आसान की। यह इस बाजार के पिछले कुछ महीने के प्रदर्शन से एकदम उलट था। 10 वर्ष का मानक बॉन्ड प्रतिफल मौद्रिक नीति की घोषणा के बाद से करीब आधा फीसदी ऊपर गया है। इसके अलावा उसके इस प्रदर्शन के लिए एक बात और उत्तरदायी रही। वह यह कि केंद्रीय बैंक ने अपने नीतिगत रुख में समायोजन के बजाय निष्पक्षता को स्थान दिया। इसके आधार पर मोटेतौर पर यही अनुमान लगता है कि निकट भविष्य में दरों में कटौती की कोई संभावना नजर नहीं आती। 
 
अगर आरबीआई के प्रति निष्पक्ष राय रखी जाए तो कहा जा सकता है कि हम सभी को इस कदम की अपेक्षा थी। जो लोग दरों में कटौती की मांग कर रहे थे उनका दांव इस बात पर आधारित था कि आरबीआई और सरकार एक दूसरे की जरूरत का ध्यान रखेंगे। यानी दरों में कटौती के बदले राजकोषीय सुधार। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। तमाम अन्य लोगों को डर था कि नोटबंदी वृद्धि को प्रभावित कर रही होगी लेकिन आरबीआई ने संकेत दिया कि वह इसे अस्थायी मानता है। हमें खाद्य और ईंधन महंगाई से इतर मूल मुद्रास्फीति पर भी ध्यान देना होगा जो काफी समय से पांच फीसदी के इर्दगिर्द टिके हुए हैं। हाल के दिनों में हमने खुदरा महंगाई में जो कमी देखी है वह मोटे तौर पर सब्जियों और दाल की कीमतों में आई गिरावट की वजह से है और उसमें दोबारा इजाफा हो सकता है। बहुचर्चित आधार प्रभाव ने मुद्रास्फीति को कम बनाए रखा लेकिन हालात बदल सकते हैं और मुद्रास्फीति में दोबारा इजाफा हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत और जिंसों की कीमतें मजबूत हुई हैं और अगर अमेरिका ने राजकोषीय प्रोत्साहन को अपनाया तो इसमें आगे और अधिक इजाफा देखने को मिल सकता है। आरबीआई ने रुपये की अस्थिरता को लेकर भी चिंता जताई है और कहा है कि अगर अमेरिका में ब्याज दरों में इजाफा होने से डॉलर बाहर गया तो यह गिरावट और बढ़ेगी। रुपये का सस्ता होना आयात को महंगा बनाएगा। 
 
इस प्रकार प्रथम दृष्टया आरबीआई के कदम सही प्रतीत होते हैं। बहरहाल फिलहाल हमारा देश अपनी क्षमताओं से कमतर प्रदर्शन कर रहा है। एक ओर जहां मुद्रास्फीति का दबाव बरकरार है, वहीं वृद्धि और रोजगार दोनों मोर्चों पर हम और बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं। इसमें मजबूती लाने का एक तरीका तो यह है कि हम जीडीपी वृद्धि जैसे आंकड़ों से परे उन क्षेत्रों पर नजर डालें जहां मांग आपूर्ति पर भारी है। व्यापक और छोटे पैमाने पर होने वाले विनिर्माण की बात करें  तो ये दोनों क्षेत्र जरूरत से अधिक क्षमता और कमजोर मांग से जूझ रहे हैं। कुशल सेवाओं मसलन स्वास्थ्य और शिक्षा आदि के बाजार में अतिरिक्त मांग और कम आपूर्ति की स्थिति बनी हुई है। आवास बाजार के बारे में भी ठीक यही बात कही जा सकती है जहां मांग पर किसी भी तरह का ऊपरी दबाव किरायों और मकानों की कीमतों में भारी बढ़ोतरी की वजह बन सकता है। 
 
ऐसे में दो सवाल लाजिमी हैं। अगर औद्योगिक क्षेत्र वास्तव में अतिरिक्त क्षमता से जूझ रहा है तो क्या आयातित कच्चे माल की कीमतों में इजाफा तैयार उत्पाद की कीमतों में तेजी के रूप में सामान्य मुद्रास्फीति लेकर नहीं आएगा? थोक मूल्य महंगाई के आंकड़ों पर गौर करें तो जनवरी में शीर्ष मुद्रास्फीति 5.2 फीसदी के चेतावनी देने वाले स्तर तक बढ़ी। उस वक्त मैंने ध्यान दिया कि सारा दबाव कच्चे माल की कीमतों से आ रहा है जबकि तैयार उत्पाद की कीमत स्थिर है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो मार्जिन लगातार कम हो रहा है और अगर यही हाल रहा तो कंपनियां पूंजीगत व्यय पर नियंत्रण कर सकती हैं। अगर ऐसा हुआ तो यह अपस्फीतिकारी होगा। 
 
दूसरा प्रश्न इस बात से संबंधित है कि केंद्रीय बैंक को आपूर्ति की कमी की दिक्कत को दूर करने का प्रयास करना चाहिए या नहीं। गौरतलब है कि इस कमी की वजह से सेवा क्षेत्र में महंगाई बढ़ रही है। चिकित्सकों के शुल्क, शिक्षण शुल्क आदि इसका उदाहरण हैं। क्या उसे दरों से जुड़ा निर्णय लेते वक्त इस बात पर ध्यान देना चाहिए? ऐसा होने से उस स्थिति से बचा जा सकेगा जहां कीमतों से जुड़े इस दबाव पर पडऩे वाला असर बढ़ी ब्याज दर के असर की तुलना में नगण्य होगा। क्योंकि बढ़ी हुई ईएमआई उपभोक्ताओं की शक्ति को सीमित करेगी। जबकि पूंजी की बढ़ी हुई लागत निवेश को प्रभावित करेगी। कुल मिलाकर मांग में कमी और ज्यादा होगी। इन सवालों के जवाब तलाश करना कठिन है। खासतौर पर यह देखते हुए कि आरबीआई ने मुद्रास्फीति को 6 फीसदी से नीचे रखने को लक्ष्य बना लिया है। बल्कि मध्यम अवधि में वह इसे 4 फीसदी तक लाने के लिए प्रयासरत है। मुझ समेत जिन लोगों की यह चाह थी कि आरबीआई को नीतिगत दरों में कटौती करनी चाहिए, अब उन्हें शायद यह स्वीकार करना ही होगा कि ऊंची दरें विवेकाधीन नीतिगत व्यवस्था से अधिक नियम आधारित मॉडल की ओर प्रस्थान की लागत हैं। 
 
बहरहाल फिलहाल तो आरबीआई को ऋण लेने वालों पर इसके असर के बारे में बहुत अधिक चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है। विमुद्रीकरण के चलते बैंकों में खूब राशि जमा हुई है और साथ ही ऋण की मांग भी तैयार हो गई है। बीते तीन महीनों में बैंकों का ऋण-जमा अनुपात पांच फीसदी तक गिरा है। ऐसे में बिना नीतिगत दरों में कटौती के भी बैंकों पर एक किस्म का आंतरिक दबाव है कि वे दरों में कमी करें। हकीकत में आरबीआई को लग रहा है कि ऋण सस्ता होने पर मांग में इजाफा होगा जो मुद्रास्फीति में बढ़ोतरी की वजह बन सकता है। 
 
अगर ऐसा हुआ भी तो वह एकबारगी होगा और जरूरी नहीं कि यह सिलसिला लंबा खिंचे। वर्ष 2017 एक उलझाऊ वर्ष साबित हो सकता है। वैश्विक मोर्चे पर बड़े बदलाव हो सकते हैं क्योंकि अमेरिका का ट्रंप प्रशासन संरक्षणवाद को बढ़ावा दे रहा है। इस बीच फेडरल रिजर्व ने भी ब्याज दरों पर से रोक खत्म कर दी है। इस पर आरबीआई एक किताबी प्रतिक्रिया दे सकता है जो शायद पूरी तरह घरेलू अर्थव्यवस्था के पक्ष में न हो। ऐसे में शायद वक्त आ गया है कि कुछ हद तक विवेकाधीन कदम उठाए जाएं। 
Keyword: मुद्रास्फीति आरबीआई,
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