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वैश्वीकरण की नई सूरत में कहां रहे भारत
नितिन देसाई /  02 27, 2017

भारत को अपनी नीतियां इस अनुमान के आधार पर बनानी चाहिए कि वैश्विक स्तर पर दक्षिणपंथी उभार का सिलसिला चलता रहेगा और पश्चिमी देश स्वयं को आर्थिक गढ़ में सुरक्षित कर लेंगे। बता रहे हैं नितिन देसाई 

 
डॉनल्ड ट्रंप को अमेरिका का राष्ट्रपति बने एक माह हो गया है और इस अवधि ने उनकी जीत के बाद उत्पन्न हुई आशंकाओं की पुष्टिï की है। उनके कदम उनके विचारों की ही तरह चरमपंथी हैं। वह अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था में मौजूदा रोकथाम के उपायों की बदौलत रोके जा सके हैं। यूरोप में भी दक्षिणपंथ उभार पर है और नीदरलैंड व फ्रांस में आगामी चुनाव में उसके जीतने की अपेक्षा जताई जा रही है। कनाडा जैसे अपवाद कम ही देखने को मिलेंगे। 
 
जैसा कि एक माह पहले इस स्तंभ में दावा किया गया था कट्टïर दक्षिणपंथ का उभार कोई संयोग नहीं बल्कि बीते तीन दशकों में वैश्वीकरण की प्रगति का अनिवार्य परिणाम है। ऐसे में समझदारी का तकाजा यही है कि भारत में हम अपनी नीतियां इन अनुमानों को ध्यान में रखते हुए तैयार करें। यानी दक्षिणपंथ का उभार जारी रहने और पश्चिमी देशों में आर्थिक और सुरक्षा संबंधी तैयारी तगड़ी रहने का अनुमान। 
 
आर्थिक मोर्चे पर इससे तीन चुनौतियां निकलती हैं। बढ़ते संरक्षणवाद और कम होते एफडीआई से निपटना, घरेलू मांग वृद्घि में तेजी लाना और बौद्घिक पूंजी तैयार करना आदि शामिल हैं। पश्चिमी दुनिया में घरेलू स्तर पर रोजगार संरक्षण करना दक्षिणपंथी राजनीतिक विचार के मूल में है। इसके साथ ही साथ स्वचालन और 3डी प्रिंटिंग जैसी तकनीक भी स्थानीयकरण को प्रोत्साहन दे रही हैं। इसलिए हो सकता है हमें चीन की तरह फायदा नहीं हो। चीन ने कारोबारी वृद्धि और आउटसोर्सिंग के साथ वैश्विक मूल्य शृंखला के विकास से बहुत लाभ कमाया। पश्चिमी देशों के शेयर बाजार इसे और बल देंगे क्योंकि हाल के दिनों में उन कंपनियों का प्रदर्शन कहीं बेहतर रहा है जो वैश्वीकृत नहीं हैं। 
 
व्यापार और निवेश में उदारीकरण के सात दशक का चक्र अब उलट सकता है। बैंकिंग, बीमा और कारोबारी सेवा क्षेत्र मे उदारीकरण की मांग जरूर बरकरार रह सकती है। हमें सूचना प्रौद्योगिकी और इंजीनियरिंग सेवाओं को इसमें शामिल करने पर जोर देना चाहिए जहां इस समय चुनौती और जोखिम बढ़े हुए हैं। देखा जाए तो उच्च वृद्धि का हर दौर तेज निर्यात वृद्धि पर निर्भर रहा है। शायद हमें 7 फीसदी की वृद्धि के लक्ष्य को स्वीकार करना पड़े और घरेलू मांग पर हमारी निर्भरता बढ़ जाए बजाय कि निर्यात के। लेकिन इसके लिए आय का व्यवस्थित वितरण आरंभ करना होगा। कुछ वस्तुओं की खपत का रुझान ऐसा होता है कि कम आय वर्ग के स्तर पर उनकी खपत कम होती है, जैसे-जैसे आय बढ़ती है खपत में इजाफा होता जाता है और एक स्तर पर जाकर उसमें पूर्णता की स्थिति आ जाती है। अगर अमीर और अमीर होते चले गए तो ऐसी वस्तुओं की मांग में कमी आएगी क्योंकि एक तरह की स्थिरता का माहौल होगा। उनकी खपत की प्राथमिकता में तब्दीली आ सकती है। हो सकता है वे विदेशी वस्तुओं मसलन विदेशों में अवकाश आदि का विचार बनाएं। वहीं दूसरी ओर मध्यम और निम्र आय वर्ग समूहों में आय के वितरण में तब्दीली आएगी। इससे बेहतर आवास, बेहतर स्वास्थ्य, उच्च शिक्षा और टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं का बाजार मजबूत हो सकता है। विश्वयुद्घ के पश्चात पश्चिम में जो तेजी आई वह ऐसे ही पुनर्वितरण पर आधारित था। कल के दिनों की उपभोक्ता जरूरतें आने वाले दिनों की अनिवार्य आवश्यकता बन सकती हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि आय के वितरण का पूंजीवादी दायरा कारोबारियों के अनुकूल नीति निर्माण में ध्यान रखेगा। 
 
घरेलू मांग पर अत्यधिक निर्भरता कड़ी प्रतिस्पर्धा और घरेलू निवेश को नए सिरे से बल देती है। चूंकि बुनियादी ढांचा विकास में हम काफी पीछे हैं इसलिए भौतिक संरचना तैयार करने में निवेश आगे भी नीतिगत मुद्दों का केंद्र बना रहेगा। परंतु जन नीति और कॉर्पोरेट नीति की बात करें तो तो उसे यह समझना होगा कि आर्थिक प्रतिफल में सुधार का सिलसिला भौतिक पूंजी से बौद्घिक संपदा की ओर स्थानांतरित होना जारी रहेगा। इसके लिए मूलभूत शोध क्षमता व्यापक शोध क्षमताएं विकसित करनी होंगी। कुछ उस तरह की जिनको नवाचारी इंजीनियरिंग आदि के लिए नोबेल पुरस्कार मिलता है।  इसके अलावा वेंचर फाइनैंसिंग और उच्च शिक्षा में बदलाव के लिए रचनात्मक सोच अपनानी होगी। इन तमाम उपायों की मदद से ही हम एक स्वतंत्र देश के रूप में कहीं अधिक बेहतर हो सकते हैं। 
 
पयार्वरण संबंधी कूटनीति की बात करें तो पश्चिमी देशों ने जो दुर्ग तैयार किया है उसमें मजबूती कम और शोरगुल ज्यादा है। समान लेकिन अलहदा जिम्मेदारी और प्रदूषक ही भुगतान करेगा जैसे सिद्घांतों को लेकर उन्होंने जुबानी जमाखर्च ज्यादा किया है। अब अधिक खुलकर यह कहा जाएगा कि भारत और चीन को अधिक कार्रवाई करनी चाहिए। ऐसे में चुनौती का संबंध जनसंपर्क से ज्यादा प्रतीत हो रहा है। लेकिन तेजी से हो रही घरेलू खपत वृद्घि के चलते उत्पन्न पर्यावरण प्रबंधन के लिए जरूरी कदम नहीं उठाने की यह कोई वजह नहीं है। 
 
सुरक्षा नीति के लिए उत्पन्न होने वाली चुनौती भी अनिश्चित है। फिलहाल हमें कोई विश्व व्यवस्था नजर नहीं आ रही है। मध्य एशिया के तेल पर अमेरिकी निर्भरता कम हो रही है और इसलिए आने वाले दिनों में इस इलाके में उसकी सैन्य मौजूदगी कम हो सकती है। ऐसे में तेल आपूर्ति की राह बनाए रखने के मामले में भारत की भूमिका चीन की तुलना में अहम होगी। अमेरिकी संरक्षणवाद और यूरोप की अंतर्मुखी दृष्टि के चलते मध्य एशिया चीन और रूस के हवाले रह गया है। चीन वैश्विक वित्तीय जगत में अपनी छाप छोड़ रहा है, वह विकासशील देशों में जमकर निवेश कर रहा है। अगर चीन अपनी अर्थव्यवस्था को खोलता है तो वैश्विक अर्थव्यवस्था में उसकी भूमिका और मजबूत होगी। क्या हम इसके लिए तैयार हैं? 
कठिन प्रश्न यह है कि अमेरिका के संरक्षणवादी रुख से कैसे निपटा जाए। इस संबंध में कोई भी द्विपक्षीय समझौता आईपीआर, सेवाओं की बाजार पहुंच और निवेशक संरक्षण को प्रभावित करेगी। टं्रप भले ही सौदेबाजी में उस्ताद हों लेकिन उनके अतीत में टूटे सौदे और दिवालियापन भी शामिल हैं। 
 
लेनदेन पर आधारित रिश्ते टिकाऊ नहीं होते। उनका ध्यान तात्कालिक लाभ पर होता है। लंबी अवधि के रिश्तों के लिए सामरिक दृष्टि का होना आवश्यक है। अमेरिका के मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान में शायद बुश और ओबामा की नीति जारी न रहे। इसलिए हमें अमेरिका के साथ मजबूत रिश्तों और सहयोग के लिए कांगे्रस के समर्थन पर भरोसा करना होगा। आपसी लेनदेन के रिश्तों में तार्किकता की आवश्यकता होती है जो तथ्यों पर और समझौते की भावना पर आधरित होते हैं। फिलहाल जो वैश्विक परिदृश्य है उसमें सबसे बड़ी चुनौती वैश्वीकरण से दूरी के रूप में नहीं सामने आ रही है बल्कि यह उदारवाद पर हमले और विज्ञान एवं आधुनिकता को खारिज किए जाने से संबंधित है। दक्षिणपंथी उभार में यह जोखिम भी है। 
Keyword: डॉनल्ड ट्रंप, अमेरिका राष्ट्रपति,
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