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रियल एस्टेट और तेल एवं गैस क्षेत्र पर कैसा रहेगा प्रभाव
सायन घोषाल /  February 26, 2017

जीएसटी से किस प्रकार प्रभावित होगा रियल एस्टेट?
 
रियल एस्टेट क्षेत्र में पूरी तरह निर्मित एवं निर्माणाधीन संपत्तियों की बिक्री संबंधी गतिविधियां शामिल हैं। वर्तमान कर ढांचे के तहत पूरी तरह निर्मित प्रॉपर्टी की बिक्री पर केवल स्टाम्प शुल्क देय है जबकि निर्माणाधीन प्रॉपर्टी स्टाम्प शुल्क, वैट और केंद्रीय सेवाकर के दायरे में होती है। वैट की दरें विभिन्न राज्यों में अलग-अलग होती हैं जबकि केंद्रीय सेवाकर एक कमी योजना (2,000 वर्गफुट से कम क्षेत्रफल और 1 करोड़ रुपये से कम की बिक्री पर 3.5 फीसदी अन्यथा 4.5 फीसदी) के तहत वसूला जाता है। इसके अलावा निर्माणाधीन प्रॉपर्टी उत्पाद शुल्क एवं सीमा शुल्क जैसे करों के दायरे में भी होती है। मॉडल जीएसटी कानून के तहत सेवाओं की परिभाषा काफी व्यापक है। इसलिए इसके दायरे में रियल एस्टेट से जुड़ी कई अन्य गतिविधियां भी कराधान के दायरे में आ सकती हैं। हालांकि अभी यह स्पष्टï नहीं है कि इस प्रकार के लेनदेन के लिए कर की दरें क्या होंगी और किन शुल्कों को जीएसटी में शामिल किया जाएगा। विशेषज्ञों का कहना है कि भूमि का मूल्य और स्टाम्प शुल्क जीएसटी के दायरे से बाहर होंगे जबकि अन्य शुल्कों को इसके दायरे में समाहित किया जाएगा।
 
क्या जीएसटी के बाद लेनदेन पर कर दरों में इजाफा होगा?
 
हालांकि यह मामला अभी भी स्पष्टï नहीं है कि निर्माणाधीन संपत्तियों की बिक्री 12 या 18 फीसदी कर के दायरे में होगी अथवा नहीं। लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण मुद्दा यह है कि रियल एस्टेट के लेनदेन पर वर्तमान मेंं लागू कमी योजना आगे भी जारी रहेगी अथवा नहीं। कमी योजना को खत्म किए जाने पर निर्माणाधीन प्रॉपर्टी पर कराधान में उल्लेखनीय इजाफा हो सकता है। इससे आवासीय मकानों की लागत काफी बढ़ जाएगी। दूसरी ओर, अनुकूल कमी योजना के जारी रहने और कर की दरें कम रहने से प्रॉपर्टी की बिक्री बढ़ेगी जिससे पूरी अर्थव्यवस्था को फायदा मिलेगा। जोंस लैंग लसॉल के राष्ट्रीय निदेशक (अनुसंधान) आशुतोष लिमये के अनुसार, जीएसटी लागू होने से पहले और बाद में कराधान की मात्रा लगभग बराबर होनी चाहिए ताकि रियल एस्टेट क्षेत्र की गतिविधियों को बरकरार रखा जा सके। इनपुट उधारी के मामले में भी भ्रम की स्थिति बनी हुई है जिसका इस क्षेत्र को अंतत: सामना करना पड़ेगा। हालांकि एकीकृत कर व्यवस्था से निश्चित तौर पर आने वाले दिनों में कर प्रबंधन, अनुपालन और मुकदमेबाजी पर उद्योग का खर्च घटेगा।
 
तेल एवं गैस
 
जीएसटी से किस प्रकार प्रभावित होगा तेल एवं गैस क्षेत्र?
 
यह एक ऐसा क्षेत्र है जिसे काफी हद तक आगामी जीएसटी व्यवस्था से बाहर रखा गया है। पीडब्ल्यूसी इंडिया के पार्टनर पुलक शाह के अनुसार, पांच प्रमुख उत्पादों को - पेट्रोलियम क्रूड, हाई-स्पीड डीजल, विमान ईंधन, प्राकृतिक गैस और मोटर स्प्रिट (प्रेट्रोल) - को शुरुआती दो साल के लिए जीएसटी के दायरे से बाहर रखा गया है। इन उत्पादों को बाद में शामिल किया जाएगा। तेल एवं गैस उद्योग में इन पांच उत्पादों की हिस्सेदारी 80 फीसदी से भी अधिक है।
ओएनजीसी के पूर्व चेयरमैन आरएस शर्मा के अनुसार, पूरी तरह जीएसटी व्यवस्था में शामिल होने की इच्छा रखने वाले इस उद्योग की कंपनियों की प्रमुख चिंता यह है कि सेनवैट क्रेडिट की गणना किस प्रकार की जाएगी।
 
जीएसटी को लेकर क्यों उत्सुक हैं तेल एवं गैस क्षेत्र की कंपनियां?
 
अन्य उद्योगों के विपरीत तेल एवं गैस क्षेत्र जीएसटी व्यवस्था के दायरे में आने के लिए काफी उत्सुक दिख रहा है और इसकी मुख्य वजह कर की दरों में जबरदस्त कमी है। वर्तमान में इस उद्योग को राज्यवार कराधान का सामना करना पड़ता है जो अक्सर 30 फीसदी से भी अधिक होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि राज्य तेल एवं गैस क्षेत्र को जीएसटी व्यवस्था से बाहर रखना चाहते हैं। इसके अलावा एकीकृत कर व्यवस्था के तहत अनुपालन एवं कर प्रबंधन की लागत कम होने से भी तेल एवं गैस क्षेत्र की कंपनियां जीएसटी व्यवस्था के तहत आने के लिए उत्सुक हैं। ईवाई इंडिया के कर पार्टनर अभिषेक जैन कहते हैं, 'वर्तमान में जीएसटी के दायरे से बाहर रखे जाने वाले उत्पादों को इसमें शामिल करने के लिए उद्योग के प्रयास में काफी तेजी आनी चाहिए। उद्योग को बाहर किए गए इन उत्पादों की शून्य रेटिंग के लिए भी सरकार से बातचीत करनी चाहिए।'
Keyword: real estate, propoerty,,
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