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मध्यस्थों के चयन के लिए हों अधिक विकल्प
अदालत से
एम जे एंटनी /  February 26, 2017

स्वतंत्र एवं निष्पक्ष मध्यस्थों का मसला विरोधी पक्षों के लिए लंबे समय से विवाद का विषय रहा है। यह मामला उस समय और गंभीर रूप ले लेता है जब सरकार या उससे जुड़े प्रतिष्ठान विरोधी पक्षों को अपनी पसंद का मध्यस्थ रखने के लिए बाध्य करने की कोशिश करते हैं। हालांकि दस साल पहले मध्यस्थता की प्रक्रिया में शुरुआती बाधा डालने वाले इन मुद्दों के समाधान के लिए मध्यस्थता एवं मेलमिलाप अधिनियम में संशोधन किया गया था। इस अधिनियम में उन लोगों की एक सूची है जो मध्यस्थ नियुक्त किए जाने के अयोग्य ठहराए गए हैं। इनमें हितों के टकराव से जुड़े अधिकारियों को मध्यस्थ नियुक्त करने पर रोक लगाई गई है। इसके बावजूद विवादों के समाधान के लिए अपनी पसंद का मध्यस्थ नियुक्त करने का मसला अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। 

 
उच्चतम न्यायालय ने वोस्टल्पाइन शीनेन बनाम दिल्ली मेट्रो रेल निगम मामले पर सुनाए गए फैसले में इस पर स्थिति साफ करने की कोशिश की है। रेल पटरियों की आपूर्ति को लेकर विवाद होने के बाद दोनों पक्ष मध्यस्थता के लिए सहमत हुए लेकिन ऑस्ट्रिया की कंपनी ने दिल्ली मेट्रो की तरफ से सुझाए गए नामों की तटस्थता पर सवाल उठाते हुए कहा कि इनमें से अधिकतर लोग सरकार या उसके संस्थानों से ही सेवानिवृत्त हुए इंजीनियर या अधिकारी हैं। इस पर न्यायालय ने कहा कि केवल किसी सरकारी प्रतिष्ठान में कभी काम करने के आधार पर किसी मध्यस्थ की निष्पक्षता पर सवाल नहीं उठाए जा सकते हैं। न्यायालय ने कहा कि अगर किसी मध्यस्थ के भेदभाव बरतने की आशंका उसे सही लगी तो वह खुद अपनी तरफ से मध्यस्थ नियुक्त कर सकता है लेकिन इस मामले में ऐसी कोई स्थिति नहीं है। हालांकि न्यायालय ने यह जरूर कहा कि मध्यस्थों के चयन के लिए अधिक नाम सुझाए जाने चाहिए। उसने दिल्ली मेट्रो से निजी क्षेत्र के अलावा कानूनी एवं अकाउंटेंसी क्षेत्र से जुड़े नाम भी सुझाने को कहा है।  
 
उप-अनुबंध को हस्तांतरित नहीं होंगे लाभ 
 
जब किसी अनुबंध के खास हिस्सों का जिम्मा किसी अन्य फर्म को उप-अनुबंध के तहत सौंपा जाता है तो मुख्य अनुबंध में होने वाले बदलाव उप-अनुबंध पर प्रभावी नहीं होंगे। उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि हरेक समझौता अपने आप में अलग होता है और किसी अन्य समझौते के प्रावधान दूसरे समझौते के लिए बाध्यकारी नहीं हो सकते हैं। उच्चतम न्यायालय ने शर्मा एसोसिएट्स बनाम प्रोग्रेसिव कंस्ट्रक्शंस लिमिटेड (पीसीएल) मामले में अपना फैसला सुनाते हुए यह टिप्पणी की है। यह मामला नैशनल हाइड्रो इलेक्ट्रिक पॉवर कॉर्पोरेशन और एचएससीएल के बीच नैनीताल में एक परियोजना के निर्माण के लिए हुए करार से संबंधित है। एचएससीएल ने बाद में उस परियोजना के एक हिस्से का जिम्मा पीसीएल को दे दिया जिसने उप-अनुबंध कर छोटा हिस्सा शर्मा एसोसिएट्स को दे दिया। बाद में पीसीएल और शर्मा एसोसिएट्स के बीच भुगतान को लेकर विवाद हो गया और वह मामला मध्यस्थ को सौंप दिया गया जिसने कहा कि मुख्य अनुबंध के दोनों पक्षों के बीच काम की दर में बदलाव पर सहमति होने के बाद उसके लाभ उप-अनुबंध वाली फर्म को भी दिए जाने चाहिए। लेकिन उच्च न्यायालय ने उसे पलट दिया था और अब उच्चतम न्यायालय ने भी उस पर मुहर लगा दी है। उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि किसी करार से जुड़े मुख्य पक्षों के बीच काम की दरों में बदलाव होने पर होने वाला लाभ उप-अनुबंध वाली फर्म को स्थानांतरित नहीं किया जा सकता है। इसकी वजह यह है कि उप-अनुबंध की शर्तों में दर संशोधन का लाभ स्थानांतरित होने का कोई प्रावधान नहीं था। न्यायालय ने यह भी कहा है कि मध्यस्थ को अनुबंध की शर्तों के मुताबिक ही फैसला सुनाना चाहिए।
 
नए कानून के तहत ही 'बीमार कंपनी' 
 
उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि जब कोई कंपनी अब खत्म किए जा चुके बीमार उद्योग अधिनियम के तहत खुद को बीमार घोषित करने के लिए अर्जी लगाती है तो रजिस्ट्रार या विभिन्न प्राधिकरणों के सचिव इस आधार पर उसके आवेदन को खारिज नहीं कर सकते हैं कि वह कोई 'औद्योगिक कंपनी' नहीं है। बैंक ऑफ न्यूयॉर्क मेलन बनाम जेनिथ इन्फोटेक लिमिटेड मामले में दिए गए फैसले में न्यायालय ने कहा कि इस बारे में फैसला करने का अधिकार औद्योगिक एवं वित्तीय पुनर्गठन बोर्ड (बीआईएफआर) के पास ही है। जेनिथ ने बोर्ड के पास अपील कर खुद को बीमार कंपनी घोषित करने की मांग की थी लेकिन बोर्ड के अधिकारियों ने उसके औद्योगिक कंपनी नहीं होने की वजह से उसकी अपील खारिज कर दी थी। इस बीच वर्ष 2016 में बीमार कंपनियों के लिए दिवालिया कानून लागू हो गया। न्यायालय ने कहा कि दिवालिया कानून के तहत गठित नए बोर्ड के पास यह मामला उठाया जाना चाहिए। 
 
सीबीआई को जब्त सीडी लौटाने के निर्देश
 
उच्चतम न्यायालय ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम एवं कॉपीराइट अधिनियम के उल्लंघन के आरोप में दर्ज आपराधिक मामले के संदर्भ में जब्त की गई सीडी को वापस लौटाने का केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को दिया है। तरुण त्यागी बनाम सीबीआई मामला एक आईटी कंपनी की तरफ से दर्ज कराई गई शिकायत से जुड़ा हुआ है। कंपनी का कहना था कि उसके एक पूर्व कर्मचारी ने डेटा रिकवरी सॉफ्टवेयर चोरी कर अपनी कंपनी शुरू कर ली है। केस दर्ज होने के बाद आरोपी के ठिकाने की तलाशी ली गई तो कई सीडी भी बरामद की गईं। सुनवाई के दौरान त्यागी ने सीडी वापस लौटाने की मांग रखी जिसका सीबीआई ने यह कहते हुए विरोध किया कि वह सामग्री से छेड़छाड़ कर सकता है। उच्चतम न्यायालय ने इस पर कहा कि निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है कि जब्त सीडी वापस कर दी जाएं। हालांकि सीडी लौटाने के पहले दोनों पक्षों की मौजूदगी में उसकी कॉपी बना लेने को भी कहा गया है।
 
बिना नोटिस नहीं लगा सकते रोक 
 
दिल्ली उच्च न्यायालय ने नोटिस दिए बगैर किसी कंपनी पर रोक लगाने को गैरकानूनी ठहराया है। न्यायालय ने कहा कि रोक लगाने के पहले संबंधित कंपनी को अपना रखने का मौका जरूर दिया जाना चाहिए। सीडीएम स्मिथ इंडिया लिमिटेड बनाम राष्ट्रीय राजमार्ग एवं ढांचागत विकास निगम मामले में फर्म ने आरोप लगाया था कि निगम ने न केवल उसके करार को रद्द कर दिया बल्कि भविष्य के लिए उसे अनिश्चिकाल के लिए प्रतिबंधित भी कर दिया गया है। उसने कहा कि ऐसा करने के पहले उसे कोई वजह भी नहीं बताई गई थी। न्यायालय ने कहा कि निगम को कोई भी फैसला करने के पहले फर्म को अपनी बात रखने का एक मौका जरूर दिया जाना चाहिए। 
Keyword: supreme court, high court,,
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