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मकान खरीदना आसान नहीं भाई... जरा ध्यान रखें एनआरआई
संजय कुमार सिंह /  February 26, 2017

पिछले कुछ सालों में यह देखा गया है कि जनवरी से मार्च के बीच भारत के भवन निर्माता पूरी दुनिया में जायदाद की प्रदर्शनी करते रहते हैं। इन प्रदर्शनियों के पीछे एक ही मकसद होता है और वह है प्रवासी भारतीयों (एनआरआई) को यहां के रियल एस्टेट क्षेत्र में निवेश के लिए आकर्षित करना। पिछले पांच साल में डॉलर के मुकाबले रुपये में करीब 26.5 फीसदी गिरावट आई है, जिससे एनआरआई के लिए जायदाद खरीदना और भी आसान हो गया है। सलाहकार कंपनी स्क्वायर याड्र्स के अनुसार भारत के शीर्ष 8 शहरों में एनआरआई ने 2016 में कुल 9.6 अरब डॉलर का निवेश किया है। कंपनी का मानना है कि 2017 में यह आंकड़ा बढ़कर 11.5 अरब डॉलर हो जाएगा।

 
भारतीय रियल एस्टेट कारोबार में एनआरआई के बढ़ते निवेश की वजह यह है कि वे यहां से रूबरू होते हैं और यहां निवेश के प्रति उत्साहित भी रहते हैं। रुपये के मुकाबले डॉलर मजबूत होने के कारण भी भारत में एनआरआई के लिए निवेश करना आसान हो जाता है। इसके साथ ही संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) जैसे देश नागरिकता नहीं देते हैं, इसलिए वहां काम करने वाले भारतीयों को मालूम है कि एक दिन उन्हें अपने देश ही लौटना है। ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देशों में भी नागरिकता प्राप्त करना मुश्किल होता जा रहा है।
 
प्रॉपटाइगर डॉट कॉम के चीफ बिजनेस ऑफिस भास्कर बागची कहते हैं, 'मजबूत आर्थिक वद्धि दर, आवास ऋण पर कम होते ब्याज और रुपये में गिरावट से भी एनआरआई का भारत के रियल एस्टेट क्षेत्र में निवेश बढ़ रहा है।' इंटरनेट, विनिर्माताओं और परियोजनाओं के बारे में सूचनाएं अब आसानी से उपलब्ध होने के कारण चीजें आसान हो गई हैं। कई विनिर्माताओं और रियल एस्टेट मार्केटिंग कंपनियों ने उन देशों में अपने कार्यालय स्थापित किए हैं, जहां एनआरआई की संख्या अधिक है। हालांकि भारतीय रियल एस्टेट कारोबार बाजार में निवेश करने वाले एनआरआई को इस परिसंपत्ति श्रेणी में निवेश से पहले जुड़े जोखिमों को अवश्य समझना चाहिए। 
 
खरीद से पहले
 
अगर जायदाद खरीदारी निवेश के उद्देश्य से हो रही है तो रियल एस्टेट बाजार में मौजूदा कमजोरी माकूल मौका देती है।  स्क्वायर याड्र्स के प्रिंसिपल पार्टनर अनुपम रस्तोगी कहते हैं, 'एनआरआई ठीक कीमतों पर जायदाद खरीद सकते हैं और निर्माताओं से मिलने वाली छूट और भुगतान योजनाओं का फायदा भी उठा सकते हैं।' लेकिन उन्हें मुनाफा चाहिए तो 7 से 10 साल इंतजार करना होगा। उन्हें एक-दो बिंदु देखने के बजाय व्यापक रुझानों पर ध्यान देना होगा। इस समय ज्यादातर शहरों में विभिन्न परियोजनाओं के तहत बड़ी संख्या में मकान बने हैं, जिनकी बिक्री नहीं हो पाई है। प्लान अहेड वेल्थ एडवाइजर्स के विशाल धवन कहते हैं, 'बड़ी संख्या में बिना बिके मकान रहने का मतलब है कि अगले कुछ सालों तक कीमतें बढऩे वाली नहीं हैं।'
 
जायदाद खरीरने की योजना बना रहे एनआरआई को किराये से प्राप्त होने वाली रकम पर भी विचार करना चाहिए। यूं तो यह रकम ज्यादा लग सकती है, लेकिन ज्यादातर शहरों में यह मकान की कीमत के 2-3 फीसदी से अधिक नहीं होती। एनआरआई को मुद्रा में आने वाले उतार-चढ़ाव का भी ध्यान रखना चाहिए।
 
खुद के लिए
 
एनआरआई भारत आने से काफी पहले ही मकान खरीद लेते हैं। जब तक लौटते हैं तब तक उनकी जरूरतें बदल सकती हैं। मसलन विदेश जाने से पहले किसी व्यक्ति ने बेंगलूरु में दो बेडरूम का मकान खरीदा होगा तो लौटने पर उसे कोलकाता में भी रहना पड़ सकता है। यदि उसकी जीवन शैली बेहतर हो गई हो तो उसे चार बेडरूम के फ्लैट की जरूरत भी हो सकती है। इसीलिए धवन की राय है कि जब आपको जरूरत हो, उससे कुछ पहले ही मकान खरीदें।
 
खरीदने में वक्त की कमी
 
जब एनआरआई भारत में आकर संपत्ति खरीदते हैं तो उनके सामने सबसे बड़ी दिक्कत यह होती है कि सौदा पूरा करने के लिए वक्त बहुत कम होता है क्योंकि वह कम वक्त के लिए ही भारत आए होते हैं। जेएलएल इंडिया के आशुतोष लिमये (राष्टï्रीय निदेशक - शोध) कहते हैं, 'इससे उनके पास जायदाद खरीदने से पहले ज्यादा पूछताछ और पड़ताल का वक्त नहीं होता।' ज्यादातर एनआरआई भारत आने से पहले इंटरनेट पर भवन निर्माताओं और परियोजनाओं के बारे में मालूमात हासिल करते हैं। लेकिन यह सब एक हद तक ही किया जा सकता है। बागची कहते हैं, 'अक्सर इंटरनेट पर यह ठीक से पता नहीं चल पाता कि भवन निर्माताओं ने पिछली परियोजनाओं में क्या किया है। ऐसे में चयन में गलती हो सकती है।' समय के अभाव के कारण एनआरआई हरेक पेशकश का बारीकी से अध्ययन नहीं कर पाते हैं। ऐसे में एनआरई को मदद करने वाली एजेंसी या व्यक्ति की विश्वसनीयता खासी अहम हो जाती है। रस्तोगी कहते हैं, 'एनआरआई को जानी मानी रियल एस्टेट मार्केटिंग कंसल्टेंट से सलाह-मशविरा करना चाहिए।'
 
खटका तो नामी को चुनें
 
लिमये कहते हैं, 'इससे चूक होने की आशंका कम हो जाती है। भारत से आने से पहले एनआरआई को निर्माता से बात करनी चाहिए और सौदा उसी से करना चाहिए, जो साफगोई से बात करे।' सौदे को अंतिम रूप देने से पहले एनआरआई को पड़ताल जरूर करनी चाहिए। उसे देखना चाहिए कि परियोजना कानूनी पचड़े में तो नहीं फंसी है, जमीन के मालिकाना हक पर विवाद तो नहीं है और भूमि के इस्तेमाल में किसी नियम का उल्लंघन तो नहीं है। बेंगलूरु की क्राइस्ट यूनिवर्सिटी में वेल्थ मैनेजमेंट पढ़ाने वाले एस जी राजा कहते हैं, 'मालिकाना हक के दस्तावेज मांगने के साथ ही स्थानीय वकील की मदद भी लेनी चाहिए।' 
 
निर्माता ने सारे उपनियमों का ध्यान रखा हो और इमारत से जुड़ी सभी मंजूरी उसके पास हों। समय पर परियोजना पूरी करने और गुणवत्ता बरकरार रखने के वायदे उसने पिछली परियोजनाओं में कितने पूरे किए हैं, इसकी जांच भी होनी चाहिए। यह भी देखना चाहिए कि निर्माता की माली हालत कैसी है। राष्टï्रीय राजधानी क्षेत्र की एक परियोजना में निवेश करने वाले ओमान निवासी एनआरआई अमित मिश्रा ने कहा, 'निर्माता पर अधिक कर्ज नहीं होना चाहिए नहीं तो वह समय पर परियोजना पूरी नहीं कर पाएगा।' मिश्रा ने बताया कि उनकी परियोजना में तीन साल की देर हो गई थी। ऐसे में पहले से तैयार या रेडी-टु-मूव संपत्ति पर दांव लगाना ज्यादा सुरक्षित होता है। लेकिन वहां भी एनआरआई को बाजार मूल्य का सही अंदाजा होना चाहिए और बाजार में चल रही छूट योजनाओं का भी पता होना चाहिए। एक और नया जोखिम यह खड़ा हो गया है कि कुछ विनिर्माता रियल एस्टेट की पैकेजिंग एक वित्तीय योजना के तौर पर कर रहे हैं और निश्चित प्रतिफल की गारंटी भी दे रहे हैं। 
 
खरीदारी के बाद देखभाल
 
अच्छी जायदाद प्रबंधन कंपनियों की कमी देखते हुए यह एक आसान काम नहीं है। अगर आप जायदाद के प्रबंधन के लिए परिवार के किसी बुजुर्ग सदस्य पर निर्भर हैं तो वह बढ़ती उम्र के कारण कुछ समय बाद ऐसा नहीं कर पाएंगे। धवन कहते हैं, 'परिसंपत्ति के प्रबंधन के रूप में कम से कम दो विकल्प होने चाहिए।' रियल एस्टेट में खरीद-बिक्री उतनी जल्दी नहीं होती है, खासकर कमजोर बाजार में दिक्कतें और बढ़ जाती हैं। छूट की पेशकश करने के बाद भी एनआरआई के लिए घर बेचना मुश्किल हो जाता है।
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