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देश के परिवहन संबंधी नियमन में हैं खामियां ही खामियां
मुद्रा मंत्र
सुबीर रॉय /  February 26, 2017

देश में मोटर वाहन परिवहन के नियमन की स्थिति बहुत बेहतर नहीं है। इसका असर नियामकों की विश्वसनीयता पर ही पड़ता है। राजीव बजाज ने अपनी चिरपरिचित शैली में एक बार फिर इस ओर ध्यान आकृष्टï किया है कि कैसे क्वाड्रिसाइकिल को देश की सड़कों पर किसी अन्य चार पहिया वाहन की तरह उतरने नहीं दिया जा रहा है। ऐसा तब है जब क्यूट ब्रांड नाम वाला यह वाहन तुर्की, फिनलैंड, बांग्लादेश, घाना, इंडोनेशिया, थाईलैंड, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका और रूस जैसे 20 देशों में निर्यात किया जा रहा है। बजाज ने आरोप लगाया कि प्रतिस्पर्धी कंपनियां मारुति सुजूकी, टाटा मोटर्स और टीवीएस मोटर्स उनके खिलाफ एकजुट हो गई हैं। उन्होंने मारुति सुजूकी के चेयरमैन आर सी भार्गव को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा, 'भार्गव कहते हैं कि उनको क्वाड्रिसाइकिल के बतौर टैक्सी इस्तेमाल होने से कोई दिक्कत नहीं है क्योंकि इससे मारुति सुजूकी पर असर नहीं होगा। अगर आप बतौर यात्री एक क्वाड्रिसाइकिल से  यात्रा करें तो ठीक है लेकिन आप उसी वाहन को खरीद कर सफर नहीं कर सकते क्योंकि तब वह अचानक असुरक्षित हो जाता है।'

 
इस नए उत्पाद का विरोध करने वालों का कहना है कि चौथा पहिया लग जाने से इस वाहन की गति में इजाफा होगा और ओवर लोडिंग की घटनाएं बढ़ जाएंगी। चूंकि यह वाहन यूरोप में बिक रहा है तो उसके बारे में कहा जा रहा है कि वहां क्वाड्रिसाइकिल का इस्तेमाल या तो बुजुर्ग लोग करते हैं या फिर ऐसे युवा जिनको कार चलाने का लाइसेंस नहीं मिला होता। आलोचकों का एक और बिंदु यह है कि सड़कों पर और अधिक तादाद में कारें उतारने का कोई मतलब नहीं है बल्कि उसके स्थान पर सार्वजनिक परिवहन को मजबूत बनाया जाना चाहिए। यह बात सच है लेकिन यह भी उतना ही सच है कि कार निर्माता कंपनियों पर भी उत्पादन की सीमा तय करने का किसी तरह का कोई दबाव नहीं है। 
 
क्वाड्रिसाइकिल कारों की तुलना में धीमे चलेगी और ईंधन के मामले में भी वह अधिक किफायती है। इस तरह यह शहरी सड़कों के लिए सुरक्षित भी है और कम प्रदूषण पैदा करने वाली भी। यह एक अच्छा नवाचारी उत्पाद है और इसमें जिन लोगों ने अपने धन, समय आदि का निवेश किया है उनको अपना उत्पाद बाजार में उतारने और अपनी किस्मत आजमाने की इजाजत मिलनी ही चाहिए। 
 
नियमन के साथ जुड़ी समस्या ई-रिक्शा के संचालन के समय भी सामने आई थी। ई-रिक्शा के साथ भी अच्छी बात यह है कि यह प्रदूषण नहीं फैलाता। उनकी गति भी ऑटो की तुलना में निहायत कम होती है। जाहिर है उनको बढ़ावा दिया जाना चाहिए ताकि ऑटो से होने वाले प्रदूषण पर रोक लगाई जा सके और देश के शहरों में सड़क दुर्घटनाओं को कम किया जा सके। तार्किक बात यह है कि ऑटो रिक्शा को चरणबद्घ ढंग से चलन से बाहर किया जाए और उनकी जगह ई-रिक्शा को बढ़ावा दिया जाए। शुरुआत में ई-रिक्शा का नियमन नहीं था। बाद में दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2014 में इन पर प्रतिबंध लगा दिया। तब केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने इनके नियमन की विस्तृत योजना पेश की। 
 
अगले वर्ष संसद ने एक कानून पारित कर ई-रिक्शा को वैध बना दिया और अब वे देश के कई शहरों में पंजीकृत और बीमित होकर काम कर रहे हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि परिवहन नियामक ने तब तक काम नहीं किया जब तक अदालत ने आदेश नहीं दिया। दिल्ली में गैस को ईंधन के रूप में अपनाते वक्त भी यही हुआ था। गत वर्ष सड़क परिवहन मंत्रालय ने ई-रिक्शा और ई-कार्ट को परिचालन के लिए परमिट हासिल करने की जरूरत से मुक्त कर दिया था। परंतु जमीनी हकीकत यह है कि अभी भी काफी हद तक कागजी कार्रवाई करनी होती है और इसके लिए लाइन लगानी होती है। अधिसूचना के तहत राज्य सरकारों को यह इजाजत भी है कि वे इन वाहनों को कुछ खास इलाकों या खास सड़कों पर चलाने के लिए उचित परिवहन नियम बनाएं। ई-रिक्शा के परिचालन का नियमन करने का काम नगर निकायों को सौंपा गया। ई-रिक्शा का इस्तेमाल भी अलग-अलग राज्य में अलग-अलग है। त्रिपुरा में इनका इस्तेमाल शुरुआती दौर में ही हो गया था। शहरी इलाकों की बात करें तो कोलकाता के बाहरी इलाकों में इसका जमकर इस्तेमाल होता है लेकिन शहर में नहीं। 
 
हमें नियमन के दो तरीके देखने को मिले। पहले में नियामक के हाथ कारोबारी प्रतिद्वंद्विता से बंधे नजर आए। जबकि दूसरे में नियमन तो हुआ लेकिन कुछ नियामकीय दिक्कतें शेष रह गईं। बात करते हैं परिवहन के ऐसे तरीके की जो पूरी तरह नवाचारी और जरूरत के मुताबिक लेकिन पूरी तरह नियंत्रणहीन है। इस वाहन पर किसी तरह की नंबर प्लेट भी नहीं होती। यह एक तरह का मैकेनाइज्ड वैन रिक्शा है जिसे 'वानो' भी कहा जाता है। यह वाहन अद्र्घशहरी इलाकों में चलता है और ग्रामीण सड़कों पर भी। इसमें एक मोटर बाइक के दोपहियों पर लकड़ी का ढांचा खड़ा किया जाता है। इस पर आसानी से सात-आठ लोग बैठ जाते हैं। इसका इंजन किसी चीनी कृषि पंप से बना हुआ हो सकता है। यह डीजल से चलता है और खूब धुआं और शोर पैदा करता है। इसका टैंक किसी मोटरसाइकिल से लेकर लगाया जाता है। सबसे अहम बात जो इसे अत्यधिक खतरनाक बनाती है वह यह कि इसमें समुचित ब्रेक की व्यवस्था नहीं होती है और न ही गति को कम करने के लिए बेल्ट की व्यवस्था होती है। इसे केवल गति कम करके ही रोका जा सकता है। कम लागत के चलते यह लोकप्रिय है। यह गरीबों के लिए आदर्श माध्यम है। परंतु नियमन के अभाव में यह दुर्घटना के जोखिम वाला है और साथ ही खूब प्रदूषण भी फैलाता है। सन 2014 में अदालत ने इन वाहनों पर प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया था लेकिन दूरदराज इलाकों में उनका संचालन जारी है। एक अनुमान के मुताबिक पश्चिम बंगाल में दो लाख लोग इसकी बदौलत रोजगार पा रहे हैं।
Keyword: transport,मोटर वाहन परिवहन के नियमन,
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