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सुधारों के अमल पर टिकी सेबी के लिए आगे की राह
अजय शाह /  February 26, 2017

प्रतिभूति बाजार की नियामक संस्था के मूलभूत लक्ष्यों की पूर्ति के लिए इसमें व्यापक स्तर पर सुधार किए जाने की जरूरत है। इस बारे में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं अजय शाह

 
अजय त्यागी भारत की कुछ सबसे अच्छी विनियामक संस्थाओं में से एक के सर्वेसर्वा बने हैं। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) का मुख्य कार्य भारत के वित्तीय बाजार में तरलता सुनिश्चित करने के साथ ही इसे अधिक सक्षम बनाना भी रहा है। सेबी का रिपोर्ट कार्ड बताता है कि इसे देश के सबसे बड़े वित्तीय उत्पादों की विदेश में होने वाली खरीद-फरोख्त, निफ्टी और रुपये की बढ़ती अहमियत को लेकर भी संजीदा रुख अपनाना होगा। इस मकसद को हासिल करने के लिए सेबी के भीतर बड़े पैमाने पर सुधार करने होंगे।
 
भारत के वित्तीय सुधारों का सबसे सफल अवयव इक्विटी बाजार रहा है। सेबी, एनएसई और एनएसडीएल के गठन से इक्विटी बाजार के डिजाइन और नियामकीय प्रणाली में जबरदस्त सुधार देखने को मिला है। बीएसई और एनएसई में सूचीबद्धता के बगैर डिम्युचुअलाइजेशन की सुविधा ने एक्सचेंजों के लिए शीर्ष नियामकों के बीच संघर्ष की संभावना को कम कर दिया है। इस मामले में भारत नीतिगत सुधारों के मामले में बाकी दुनिया से आगे रहा है और इस दिशा में उठाए गए कदम भी समय के साथ सही साबित हुए हैं।
 
इस क्षेत्र के बारे में अच्छी बात यह है कि उठाए गए कदमों के असर को आंकड़ों के रूप में मापा जा सकता है। बड़ी कंपनियों के लिए बाजार की तरलता का सबसे अच्छा पैमाना इम्पैक्ट कॉस्ट रहा है। निफ्टी में 10 करोड़ रुपये की पूंजी से खरीदे जा सकने वाले  सभी शेयरों की आनुपातिक संख्या से इम्पैक्ट कॉस्ट का आकलन किया जाता है। वैश्विक मानदंड के हिसाब से भारत इस मामले में काफी निचले पायदान पर नजर आता है। अगला मानदंड निफ्टी जूनियर सूचकांक में शामिल कंपनियों के शेयरों की खरीद से संबंधित इम्पैक्ट कॉस्ट है। उससे पता चलता है कि कम कीमत वाले शेयरों के कारोबार में उतरने पर तरलता कम होती जाती है। अगर विकसित देशों से तुलना करें तो भारत इस मामले में काफी खराब स्थिति में नजर आता है। नैसडेक में सूचीबद्ध किसी समान आकार वाली कंपनी की तुलना में एनएसई और बीएसई में सूचीबद्ध छोटी कंपनी का प्रदर्शन खराब ही रहने की आशंका है। डेरिवेटिव्स बाजार के आधार पर किसी बाजार के सक्षमता स्तर का आकलन किया जा सकता है। वायदा एवं विकल्प बाजार के कीमत स्तर में कितना बड़ा अंतर मौजूद है? अगर भारत एक तरल और सक्षम बाजार के स्तर तक पहुंचने में सफल रहता है तो डेरिवेटिव्स के मूल्य निर्धारण की समस्या केवल कभी-कभार ही खड़ी होगी और अगर ऐसा होता है तो भी  बाजार तेजी से उन सौदों को दुरुस्त कर लेगा। गलत मूल्य-निर्धारण के आकार और उसकी स्थिरता को मापे जाने के साथ ही उसकी निगरानी भी की जा सकती है।
 
भारतीय वित्त बाजार के सामने आसन्न खतरा वित्तीय प्रणाली के लोप हो जाने का है। निफ्टी और रुपया भारतीय वित्त व्यवस्था के दो सबसे बड़े उत्पाद हैं। हमें वित्तीय बाजार की नीति, नियामकीय खतरे, कराधान में खामियां और पूंजीगत नियंत्रण की कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। कई मायनों में ये समस्याएं पिछले एक दशक में और भी गंभीर हुई हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि निफ्टी और रुपये का कारोबार हॉन्ग कॉन्ग, सिंगापुर और लंदन जैसे विदेशी स्थानों की तरफ स्थानांतरित हो गया है। दस साल पहले भारत के इन उत्पादों के कारोबार में करीब 100 फीसदी हिस्सेदारी थी जो आज घटकर केवल 66 फीसदी रह गई है। अगर भारत निफ्टी और रुपये के कारोबार में फिर से प्रमुखता हासिल कर ले तो हमारे वित्तीय बाजार अधिक तरलता हासिल कर लेंगे। बाजार हिस्सेदारी गंवाने के कारण भारतीय खजाने को करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये या जीडीपी का करीब एक फीसदी निर्यात राजस्व का नुकसान हर साल हो रहा है। वित्त मंत्रालय और सेबी को इन उपायों के लिए एक समूह का गठन करना चाहिए जो पिछले आंकड़ों को देखे और हरेक महीने उसे अद्यतन भी किया जाए। इससे वित्तीय बाजारों की तरल और सक्षम व्यवस्था बनाने के सेबी की प्रगति का अंदाज मिलता रहेगा।
 
सेबी तरलता, दक्षता और भारतीय वित्तीय बाजारों की अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पद्र्धा के लिए उत्तरदायी है। ऐसे में हमें वांछनीय उद्देश्य हासिल करने में अधिक दिक्कत क्यों होनी चाहिए? इसका जवाब सेबी के कामकाज और लोक प्रशासन में मिलता है। सेबी एक नियामक के तौर पर राज्य की तीनों शाखाओं- कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका से जुड़ा हुआ है। इसके भीतर बड़े पैमाने पर शक्तियों का संकेंद्रण है। इसके चलते सेबी के लिए गलती करना काफी आसान है और वित्तीय संस्थाएं उसे चुनौती देने की हालत में भी नहीं होती हैं। विधि का शासन और सहभागी शासन के मसले सेबी के संदर्भ में खास तौर पर अहम बन जाते हैं। इनके बगैर सेबी राजनीतिक और व्यक्तिगत मंतव्यों से संचालित होने वाला एक निकाय बनकर रह जाएगा जहां अपनी शक्तियों का मनमाने तरीके से इस्तेमाल किया जाता है। सेबी के निदेशक मंडल में स्वतंत्र निदेशकों की कमी है जो उसके कामकाज पर विपरीत असर डाल सकती है।
 
सेबी के भीतर विधायी प्रक्रिया काफी खराब हालत में है। सेबी बार-बार ऐसे नियम जारी करता रहता है जिनका इक्विटी बाजार की समस्या से सीधे तौर पर कोई संबंध ही नहीं होता है, जो बाजार की नाकामी के खतरे से सीधे तौर नहीं जुड़े होते हैं और वैज्ञानिक सबूतों का भी अभाव होता है। सेबी कभी-कभी अपने दिशा-निर्देशों के बारे में सार्वजनिक राय भी आमंत्रित करता है लेकिन मैंने ऐसा एक भी वाकया नहीं देखा है जब लोगों की राय के आधार पर मसौदे में कोई भी बदलाव किया गया हो। बर्मन ऐंड जवेरी ने प्रमुख नियामकों की तरफ से बनाए जाने वाले कायदे-कानूनों की प्रक्रिया के आधार पर 2016 में किए गए एक आकलन में सेबी को 10 में से 1.1 अंक, आरबीआई को 0.2, ट्राई को 4.57 और एईआरए को 2.41 अंक दिए थे।  
 
जहां तक जांच और आदेशों का सवाल है तो सेबी की प्रक्रिया में काफी गुंजाइश नजर आती है। सेबी कई बार समुचित जांच और सुनवाई के बगैर ही आरोपी कंपनी को दोषी ठहराकर जुर्माना लगा देता है। आरोपी कंपनी को वित्तीय बाजार में शिरकत करने पर रोक लगाने का दंड देना कई कंपनियों के लिए कई तरह के खर्चे बढ़ाने वाला साबित होता है। यह सेबी के अधिकारियों के लिए नुकसान के आकलन पर ध्यान दिए बगैर दंड सुनाने का एक आलसी नजरिया भी दिखाता है। एक परिपक्व एवं उदारवादी लोकतंत्र बनने की राह में सेबी का मनमाने तरीके से अपने कार्यकारी और अद्र्ध-न्यायिक अधिकारों का इस्तेमाल करना एक बड़े रोड़े की तरह दिखता है।
 
सेबी की गलत नियम-निर्माण प्रक्रिया ने वित्तीय बाजार की नीतियों में कई गड़बडिय़ां पैदा की हैं और इससे कंपनियों की नजर में जोखिम भरा माहौल भी बना है। सेबी के दोषपूर्ण कार्यकारी और अद्र्ध-न्यायिक कार्यों के चलते कंपनियों के सामने नियामकीय खतरे पैदा हुए हैं। इस माहौल में वित्तीय कंपनियों के कामकाज पर विपरीत असर पड़ा है जिससे हॉन्ग कॉन्ग, सिंगापुर और लंदन जैसे विदेशी बाजार में ये गतिविधियां स्थानांतरित हो रही हैं। बहरहाल सेबी के शीर्ष पर अजय त्यागी और एनएसई के प्रमुख के रूप में विक्रम लिमये के आने से वित्तीय बाजारों में बड़े सुधारों का मसला एक बार फिर चर्चा में आया है। उनके लिए आगे की राह मुश्किल होने वाली है लेकिन हम सभी को उनके साथ खड़े होना होगा। 
 
(लेखक नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस ऐंड पॉलिसी, नई दिल्ली में प्रोफेसर हैं) 
Keyword: sebi, भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी),
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