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सेबी का एजेंडा
संपादकीय /  February 26, 2017

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) की स्थापना सन 1992 में की गई थी। इसके दो लक्ष्य थे: पहला, निवेशकों की रक्षा और दूसरा प्रतिभूति बाजार को विनियमित और विकसित करना। बुधवार को इस नियामक को अजय त्यागी के रूप में नया चेयरमैन मिल जाएगा। वह यूके सिन्हा का स्थान लेंगे जिनका छह साल का कार्यकाल पूरा हुआ है। यह नियामकीय इतिहास का दूसरा सबसे लंबा कार्यकाल है। पीछे मुड़कर देखें तो सिन्हा का कार्यकाल काफी घटनाप्रधान रहा। इस दौरान सेबी ने कई सराहनीय पहल कीं। इनमें निजी और सरकारी संस्थानों के लिए न्यूनतम सार्वजनिक अंशधारिता के नियम से पूंजी बाजार का दायरा बढ़ा और मूल्य निर्धारण में सुधार आया। सेबी ने कारोबारी प्रशासन का नया ढांचा पेश किया जिसने अल्पांश हिस्सेदारी वाले निवेशकों को अधिकार संपन्न बनाया। 

 
भारत ने विश्व बैंक के कारोबारी सुगमता सूचकांक में जो सुधार किया है उसमें इस क्षेत्र का अहम योगदान है। इसके तहत उनको भी समान व्यवहार मिल रहा है और बोर्ड स्तरीय गतिविधियों तथा संबद्घ पक्ष के लेनदेन में पारदर्शिता आ गई है। अधिग्रहण संहिता के नियमों का क्रियान्वयन एक और अहम घटना है। सेबी और पूर्व जिंस बाजार नियामक वायदा बाजार आयोग का विलय भी ऐसी ही घटना है। सेबी ने प्राथमिक बाजार को गतिशील बनाने का प्रयास किया। मसलन लिस्टिंग की अवधि को कम करना और ज्यादा खुदरा निवेशकों का समायोजन करना आदि। इसकी सराहना की जानी चाहिए। सिन्हा ने क्षेत्रीय स्टॉक एक्सचेंजों को बंद करने पर एकदम उचित ध्यान दिया। इन एक्सचेंज में ट्रेडिंग कम और इधर-उधर की गतिविधियां ज्यादा होती थीं। निगरानी की अपनी प्राथमिक भूमिका के अनुरूप ही सेबी ने सहारा मामले को तार्किक परिणति तक पहुंचाया। नए चेयरमैन के सामने एक अहम काम है। सेबी को बाजार को विकसित करने पर काम करना होगा। उदाहरण के लिए कहा जाता है कि बाजार में नकदी के मामले में भारत का प्रदर्शन अच्छा नहीं है। 
 
बीते दशक के दौरान बाजार की अक्षमताएं सामने आती रहीं और इसे इस बात से समझा जा सकता है कि हॉन्ग कॉन्ग, सिंगापुर और लंदन जैसे परिपक्व बाजारों में रुपये की ट्रेडिंग बढ़ती जा रही है। नए चेयरमैन को शोध और समीक्षा की क्षमताओं में भी सुधार लाना होगा। इसके अलावा प्राथमिक बाजार का नियमन भी बेहतर करना होगा। भारी भरकम प्रतिभूति दस्तावेजों पर ध्यान कम होना चाहिए और अहम उच्च गुणवत्ता वाले प्रकटीकरण पर अधिक। इसी प्रकार विलय और अधिग्रहण के मामले में लेनदेन की लागत अधिक है क्योंकि अधिग्रहण, सूचीबद्घता और सूचीबद्घता समाप्त करना कई बार विरोधाभासी मांगों के साथ सामने आता है। बाजार के प्रतिभागी भी यही कहते हैं कि सेबी को बेहतर नियमन व्यवस्था को अपनाना चाहिए। इसे अभी भी सांविधिक प्रवर्तन शक्तियों वाली संस्था माना जाता है। हालांकि सेबी के विरुद्घ अपील की गुंजाइश बरकरार है लेकिन ज्यादातर मामलों में नियामक को गलत और खुद को सही साबित करने का बोझ दोषी ठहराए गए पक्ष पर ही डाला जाता है। यही बात सेबी की विधायी शक्तियों के बारे में कही जाती है। सेबी अधिनियम उसे इजाजत देता है कि वह अनुषंगी कानून बना सके। हालांकि इसमें सार्वजनिक भागीदारी होती है लेकिन उसकी तुलना किसी भी हालत में सार्वजनिक मशविरे से नहीं की जा सकती। कुलमिलाकर नए चेयरमैन अगर बाजार प्रतिभागियों के मन का भय दूर कर पाए तो बहुत बेहतर होगा। इसके साथ ही सेबी के कई कर्मचारी भी जांच एजेंसियों की गहन और अनावश्यक जांच के शिकार हुए हैं। अगर इससे निपटा नहीं गया तो कर्मचारी संवेदनशील मसलों पर कोई निर्णय लेने से पहले दो बार सोचेंगे। सिन्हा ने सीमित तरीके से ही सही इससे निपटने की कोशिश की थी। उनके उत्तराधिकारी को इस मामले में तेजी से आगे बढऩा होगा।
Keyword: sebi, भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी),
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