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मुंबई को बदल पाएगी भाजपा?
साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  February 24, 2017

खबर और उस पर की गई टिप्पणियों के बावजूद उस मूल सवाल का कोई जवाब नहीं मिल पाया है कि आखिर बदला क्या है? मुंबई स्थानीय चुनाव खत्म होने के बाद यह सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए। इस चुनाव ने मुंबई की सबसे बड़ी सियासी ताकत शिवसेना को झकझोरने के साथ ही कामयाबी के रथ पर सवार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को एक और सफलता दिलाई है। इसके साथ ही एक और जगह कांग्रेस की प्रासंगिकता को लेकर सवाल उठने लगे हैं। निश्चित तौर पर इन स्थानीय चुनावों की राजनीतिक अहमियत है और कुछ हद तक राष्ट्रीय स्तर पर भी इसकी गूंज सुनाई दे सकती है। लेकिन इस सबसे असलियत में बदला क्या है? 

 
चुनाव के दौरान भाजपा ने अपने पूर्व (और संभवत: भावी) सहयोगी पार्टी के बारे में कुछ अपमानजनक टिप्पणियां की थीं। भाजपा नेताओं ने मुंबई के शासन की तुलना पटना से करने के साथ ही बृहन्मुंबई महानगर पालिका (बीएमसी) में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के भी आरोप लगाए थे। बीएमसी के खातों की पिछले सात साल से जांच ही नहीं हुई है। क्या यह सब बदल जाएगा? जानकार लोगों का कहना है कि बीएमसी परिषद में विभिन्न दलों के प्रतिनिधित्व के आधार पर उन्हें आनुपातिक हिस्सा मिल जाता है (और यही वजह है कि अधिकांश फैसले सर्वसहमति से लिए जाते हैं)। अगर यही व्यवस्था बनी रहती है तो अब एक पार्टी को पहले से अधिक बड़ा हिस्सा मिलेगा और दूसरों का हिस्सा कम हो जाएगा।
 
देश के कई छोटे राज्यों से अधिक करीब 37,000 करोड़ रुपये का बजट रखने वाले बीएमसी का प्रशासन महाराष्ट्र सरकार की तरफ से नियुक्त नौकरशाह के सुपुर्द करना काफी बेतुका है। इसी तरह पूरे बजट का दो-तिहाई हिस्सा वेतन एवं पेंशन पर खर्च करने को भी सही नहीं ठहराया जा सकता है। शहर की यातायात व्यवस्था समुचित ढांचे के अभाव में चरमरा रही है। मुंबई की कुल आबादी का 60 फीसदी से भी अधिक हिस्सा झुग्गी-झोपडिय़ों में रहता है और यह संख्या हरेक दशक में दोगुनी रफ्तार से बढ़ रही है। क्या मुंबई के किसी भी व्यक्ति को इसमें बदलाव की उम्मीद है? अगर ऐसा नहीं है तो फिर यह हलचल किस बात की है? कोई भी शहर तभी उन्नति करता है जब वहां एक ऐसी प्रभावी स्थानीय सरकार हो जो अपने निवासियों की जरूरत के प्रति संवेदनशील हो। किसी ने कहा भी है कि समस्त राजनीति मूलत: स्थानीय होती है।
 
लिहाजा, शहरों के प्रशासक अक्सर राष्ट्रीय राजनीति में भी करियर बनाने की कोशिश करते हैं। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान के कई नेता पहले महापौर रह चुके थे। इनमें सुभाष चंद्र बोस भी शामिल थे। इसी तरह पेरिस, बर्लिन, लंदन और न्यूयॉर्क के महापौर भी राष्ट्रीय राजनीति में दस्तक देते रहे हैं। नई दिल्ली के महापौर को तो मुख्यमंत्री कहा जाता है और वह भी अपनी पार्टी को राष्ट्रीय स्तर देने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन मुंबई के महापौर की कोई अलग पहचान नहीं है। अगर इसमें बदलाव नहीं होता है तो फिर कुछ भी नहीं बदलेगा। समस्या यह है कि मुंबई का राजनीतिक इतिहास बीएमसी को राज्य सरकार से स्वतंत्र रख पाना खासा मुश्किल बना देता है। उस राजनीतिक पहलू पर भी ध्यान देना जरूरी है और उसके बगैर मुंबई पतन की ही ओर अग्रसर रहेगी। कई और सुधारों की भी दरकार है। 
 
बीएमसी के राजस्व का बड़ा हिस्सा चुंगी से आता है लेकिन देश में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू होते ही वह कर खत्म हो जाएगा। फिर चुंगी की जगह कौन लेगा? क्या उससे राज्य सरकार पर बीएमसी की निर्भरता नहीं बढ़ेगी? मुंबई की संपत्ति कर प्रणाली की उस निरर्थकता का क्या होगा जो पड़ोस की दो इमारतों में इस आधार पर विभेद करती है कि कौन पुरानी है? अलग-अलग अधिकरणों को एक ही तरह का काम सौंपने से पैदा होने वाले असमंजस को दूर कैसे किया जाएगा? शिवसेना ने बीएमसी पर नियंत्रण रखने के दौरान इन पर कम ही ध्यान दिया। उसे लगता था कि पहचान पर आधारित अपनी सख्त-मिजाज राजनीति के जरिये वह इस शहर पर अपना दबदबा कायम रखेगी। वैसे अब भी यह साफ नहीं है कि मुंबई की कमान कौन संभालेगा? जो भी हो, क्या वह इस शहर को रहने लायक बनाने के लिए अपरिहार्य संस्थागत बदलावों को लागू करेगा? अब गेंद भाजपा के पाले में है। उसने बीएमसी को अधिक पारदर्शी बनाने के नाम पर चुनाव अभियान चलाया था। अब बीएमसी के संचालन में उसकी अहमियत बढऩे जा रही है और राज्य में भी उसी की सरकार है। ऐसे में क्या वह संस्थागत सुधारों की पहल करेगी? अगर नहीं तो फिर मुंबई के लोगों के पास जश्न मनाने की कोई वजह नहीं है।
Keyword: mumbai, बृहन्मुंबई महानगरपालिका, बीएमसी, चुनाव, प्रचार,
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