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रक्षा उत्पादन को देना होगा बड़ा प्रोत्साहन
ज्योति मुकुल /  February 24, 2017

केंद्र की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार के 'मेक इन इंडिया' अभियान के केंद्र में रक्षा उत्पादन रहा है, लेकिन करीब से देखने पर पता चलता है कि इस दिशा में जमीन पर काम होना अभी बाकी है। रक्षा क्षेत्र में इस साल सरकार का पूंजीगत व्यय वित्त वर्ष 2015-16 के 71,675 करोड़ रुपये के मुकाबले केवल 75 करोड़ रुपये अधिक रहने का अनुमान है। इससे स्पष्ट है कि रक्षा खरीद और निर्माण गतिविधियां अभी जोर नहीं पकड़ पाई हैं। 

 
ऐसा नहीं है कि रक्षा मामलों में नीतिगत पहल नहीं हुई है या उसमें देरी की जा रही है। मार्च, 2016 में रक्षा मंत्रालय ने रक्षा खरीद की प्रक्रिया तय की थी, जिसमें वैश्विक उत्पादों की खरीद को अंतिम प्राथमिकता देने को कहा गया था। उसमें भारत में ही स्वदेशी स्तर पर डिजाइन, विकसित और विनिर्मित रक्षा उत्पादों की खरीद को पहली प्राथमिकता देने की बात कही गई थी। इस श्रेणी के तहत पहला करार भारतीय नौसेना ने पिछले हफ्ते कर लिया है। नौसेना ने टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड की पूर्ण स्वामित्व वाली अनुषंगी इकाई नोवा इंटीग्रेटेड लिमिटेड के साथ 200 करोड़ रुपये का करार किया है, जिसके तहत सतह पर निगरानी रखने वाले रडार बनाए जाएंगे। ये रडार भारत में ही डेनमार्क की कंपनी टर्मा के सहयोग से बनाए जाएंगे। हालांकि नई रक्षा खरीद नीति में एक अजीबोगरीब बदलाव कर दिया गया था। पहले 300 करोड़ रुपये वाले सौदे में भी अनिवार्य रूप से घरेलू खरीद का प्रावधान होता था, लेकिन अब उस सीमा को बढ़ाकर 2,000 करोड़ रुपये कर दिया गया है। इसका मतलब है कि अब 2,000 करोड़ रुपये से कम मूल्य वाले रक्षा सौदों के लिए घरेलू स्तर पर खरीद अनिवार्य नहीं रह गई है। रक्षा कंपनियों के लिए भारत में उपकरणों की खरीद कर पाना मुश्किल होने से यह बदलाव किया गया है। 
 
हालांकि अब भी किसी रक्षा सौदे के 30 फीसदी पुर्जों या उपकरणों को घरेलू बाजार से खरीदना जरूरी है। सरकार का अनुमान है कि रक्षा सौदे पर लगी इस बाध्यता से अगले पांच-छह वर्षों में 29,500 करोड़ रुपये का कारोबार घरेलू स्तर पर पैदा होगा। इससे भारत में रक्षा उपकरणों के निर्माण को प्रोत्साहन मिलेगा। अभी तक रक्षा उपकरणों का कारोबार मूलत: आयात पर ही आश्रित रहा है।  
 
वित्त वर्ष 2017-18 के बजट में पेंशन को छोड़कर रक्षा क्षेत्र का कुल बजट 274,114 करोड़ रुपये रखा गया है जो पिछले बजट में किए गए आवंटन से केवल 6.2 फीसदी अधिक है। इस बजट आवंटन में से 86,488 करोड़ रुपये रक्षा उपकरणों की खरीद के लिए निर्धारित हैं। सेवानिवृत्त ग्रुप कैप्टन विनय कौशल का कहना है कि रक्षा खरीद के लिए आवंटित राशि पिछले चार वर्षों से अमूमन 80,000 करोड़ रुपये के आसपास ही है और इसमें कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। इस समय नई दिल्ली के रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान में फेलो के रूप में जुड़े कौशल कहते हैं कि वर्ष 2007 से ही सरकारी स्तर पर अपनाई गई नीति सीबीआरपी के तहत पूंजीगत आवंटन में गिरावट का रुख देखा जा रहा है। उनका मानना है कि इस नीति की वजह से नए उपकरणों की खरीद बाधित हो रही है और पुरानी सामग्री के रखरखाव की लागत बढ़ रही है। मरम्मत की लागत बढऩे से रक्षा बजट का एक बड़ा हिस्सा उसी में खर्च हो जाता है और आधुनिकीकरण की प्रक्रिया बाधित होती है। इस स्थिति में नई रक्षा खरीद नीति ने भारत की बड़ी इंजीनियरिंग और ढांचागत क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों को विदेश की बड़ी रक्षा कंपनियों के साथ मिलकर काम करने के लिए प्रोत्साहित किया है। लार्सन ऐंड टुब्रो (एलऐंडटी), टाटा, महिंद्रा, रिलायंस इन्फ्रास्ट्रक्चर या कल्याणी समूह जैसी कंपनियों ने रक्षा उत्पादन के लिए विदेशी कंपनियों के साथ करार किया है।
 
हालांकि ग्रुप कैप्टन कौशल का मानना है कि रक्षा उत्पादन में हो रहा निवेश नए संयंत्रों की शक्ल में नहीं आ रहा है। रक्षा उत्पादन कारोबार के एक अनुमान के मुताबिक अधिकांश कंपनियों ने उत्पादन सुविधाओं के विकास में 1,000 करोड़ रुपये से भी कम राशि निवेश की है। एलऐंडटी ने हाल ही में दुनिया की सबसे बड़ी मिसाइल प्रणाली निर्माता कंपनी एमबीडीए के साथ करार किया है। एलऐंडटी अपनी नौ निर्माण इकाइयों का इस्तेमाल रक्षा उपकरणों के लिए कर रही है। एलऐंडटी के रक्षा एवं अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी प्रमुख जयंत डी पाटिल कहते हैं, 'हम अपने दो और कारखानों में रक्षा उत्पादन पर विचार कर रहे हैं। इसके अलावा एक और कारखाने की भी संभावना दिख रही है।' एलऐंडटी ने अपने रक्षा कारोबार में पिछले पांच वर्षों में करीब 8,000 करोड़ रुपये का निवेश किया है। उसे सरकार से गन के निर्माण का ठेका मिला है। इसके अलावा कंपनी जहाज निर्माण, पनडुब्बी, मिसाइल की लॉन्चिंग और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में भी संभावनाएं तलाश रही है। पाटिल बताते हैं कि उनकी कंपनी ने वर्ष 2021 तक अपना रक्षा कारोबार 10,000 करोड़ रुपये तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है।
Keyword: defense, india, budget,,
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