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संस्थापकों के दबाव में कंपनियों में बढ़ता जा रहा उलझाव
जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  February 23, 2017

एक दफा प्रबंधन पर नियंत्रण का काम छोड़ देने के बाद प्रवर्तकों की भूमिका कभी इतना सवालों के घेरे में नहीं रही जितनी कि दो हालिया मामलों में। ये मामले हैं रतन टाटा और साइरस मिस्त्री तथा इन्फोसिस के संस्थापक बनाम विशाल सिक्का। इनमें से पहला विवाद बिना जवाबदेही के ताकत से जुड़ा हुआ है। हालांकि अब एन चंद्रशेखरन जैसे सक्षम अधिकारी को 103.51 अरब डॉलर के ताकतवर समूह की होल्डिंग कंपनी टाटा संस का चेयरमैन बना दिया गया है लेकिन विवाद का हल होना अभी बाकी है। दूसरा मामला बिना ताकत के जवाबदेही का है। यह मुद्दा विशाल सिक्का और एन नारायणमूर्ति के नेतृत्त्व में नाखुश इन्फोसिस संस्थापक समूह के बीच है। 

 
मौजूदा कारोबारी प्रशासन संबंधी बहस यही बताती है कि प्रवर्तकों के लिए बेहतर है कि वे एक खास उम्र के बाद प्रबंधन से बाहर निकल जाएं और गरिमापूर्ण ढंग से काम को पेशेवर प्रबंधकों को सौंप दें। वे अपना बचा हुआ समय परोपकारी कामों में लगा सकते हैं और अपने निजी इक्विटी कारोबार को आगे बढ़ा सकते हैं। टाटा और इन्फोसिस का विवाद बताता है कि आमतौर पर ऐसा होता नहीं है।
 
प्रवर्तक सेवानिवृत्ति की उम्र के बाद अपनी कार्यकारी भूमिका का त्याग करके अच्छा करते हैं लेकिन उनसे यह अपेक्षा रखना सही नहीं है कि वे अपनी ही कंपनियों में अपने हितों को एकदम से त्याग बैठेंगे। ऐसा त्याग तभी संभव है जब उन्होंने संस्थान के साथ कुछ बेहद अजीब कर दिया हो मसलन याहू के जेरी यांग, या फिर वह सत्यम के रामलिंगा राजू की तरह भ्रष्ट हो। यदि ऐसा नहीं है तो प्रवर्तकों का प्रबंधन में शामिल रहना समझ में आता है। 
 
न तो टाटा और न ही मूर्ति व अन्य लोग टाटा संस अथवा इन्फोसिस के बोर्ड में शामिल हैं, लेकिन दोनों ही कार्यकारी प्रबंधन के प्रदर्शन और प्रशासन को चुनौती देते रहे। अगर वे प्रत्यक्ष तौर पर शामिल होते तो संभव है कि ऐसे विवाद इस कदर खुलकर सामने आते ही नहीं। इन्फोसिस और टाटा में उपजे विवाद सामने आए क्योंकि उनके स्वामित्व का ढांचा अपेक्षाकृत नया है। उदारीकरण के बाद की कई कंपनियों में उनसे समानता तलाशी जा सकती है। टाटा समूह को समस्या का सामना करना पड़ा क्योंकि प्रवर्तक परिवार का दायरा सिमटता जा रहा था और उसका अप्रत्यक्ष नियंत्रण भी जो वह 100 से अधिक कंपनियों के लिए बने परोपकारी न्यासों के जरिए अपने पास रखे था। इन न्यास के माध्यम से रतन टाटा सबसे बड़े प्रवर्तक-अंशधारक बने हैं। कंपनी अधिनियम की परिभाषा के मुताबिक भी वह प्रवर्तक हैं। 
 
अधिनियम की धारा दो (69) के उपबंध ब और स उनके सेवानिवृत्ति के बाद के काम को परिभाषित करते हैं। इसके अतिरिक्त भी चूंकि समूह में खुद उनका नाम शामिल है इसलिए वह खुद को इससे पूरी तरह चाहकर भी अलग नहीं कर सकते। इसी तरह मिस्त्री में भी प्रवर्तक होने की पूरी काबिलियत है क्योंकि उनके परिवार के पास टाटा संस की 18 फीसदी हिस्सेदारी है। लेकिन उन्होंने उपरोक्त दो उपबंधों की बदौलत टाटा के समूह में निरंतर हस्तक्षेपों के बारे में नाटकीय खुलासे किए। जाहिर सी बात है टाटा, जिन्होंने 21 साल तक समूह की अध्यक्षता की और उसे लाइसेंस राज से उदारीकरण के बाद तक ले आए, उन्होंने शायद कभी सोचा भी नहीं होगा कि उन्हें चुनिंदा बोर्ड प्राधिकारियों की मदद से एक दर्शक की भूमिका निभानी पड़ सकती है। 
 
इसी तरह उनकी विरासत पर सवाल किए गए। उन्होंने बड़े अधिग्रहण किए, दूरसंचार सौदे किए और समूह भारी कर्ज में भी रहा। कहा गया कि उनको दूर से खड़े होकर मामलों में हस्तक्षेप करने के बजाय टाटा संस के बोर्ड में शामिल होना चाहिए था। गौरतलब है कि उन्होंने कई निदेशकों को तैनात करने हटाने तथा खुद चेयरमैन को हटाने में अहम भूमिका निभाई। 
 
चंद्रशेखरन को टाटा संस का चेयरमैन बनाने भर से ढांचागत कमजोरी हल नहीं होने वाली है। बतौर एक पूर्व कर्मचारी वह टाटा को चुनौती दे पाएंगे इसकी कोई खास संभावना नजर नहीं आती। वहीं इन्फोसिस की समस्या कहीं अधिक जटिल है क्योंकि वह सूचीबद्ध समूह है। कंपनी को कारोबारी लोकतंत्र की अप्रत्याशित भावना से संचालित करने के बाद प्रवर्तक पीछे हट गए। पिछले संस्थापक सीईओ डी शिबुलाल के कार्यकाल में कंपनी के खराब प्रदर्शन के बाद मूर्ति को कुछ वक्त कमान संभालनी पड़ी। उसके बाद विशाल सिक्का मूर्ति के उत्तराधिकारी बने और सालाना आम बैठक में मूर्ति के पैर छूकर उन्होंने इस रिश्ते को सार्वजनिक मजबूती प्रदान की। इसके पश्चात प्रवर्तक समूह जिसके पास परिवार समेत कुल मिलाकर 12.74 फीसदी हिस्सेदारी है ने बतौर सामान्य अंशधारक पुनर्वर्गीकरण का अनुरोध किया लेकिन उनसे कहा गया कि वे ब्रांड इक्विटी के हित में प्रवर्तक बने रहें।
 
प्रभावी तौर पर देखें तो प्रर्वतकों को भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड के नियमों के तहत दायित्व सौंपा गया। इसमें अनुपालन की एक पूरी सूची शामिल थी। प्रर्वतकों के पुनर्वर्गीकरण के नियम फिलहाल सेबी के पास विचाराधीन हैं लेकिन मसौदा बताता है कि उनसे इन्फोसिस प्रवर्तकों को शायद ही कोई मदद मिलती। बोर्ड में प्रतिनिधित्व के बिना संस्थापकों के पास जवाबदेही तो थी लेकिन उनके पास ऐसी कोई शक्ति नहीं थी कि वे अहम फैसलों पर कोई सवाल खड़ा कर सकें। इन्फोसिस का दूसरा सबसे बड़ा अधिग्रहण यानी पनाया खरीद ऐसा ही फैसला है। मूर्ति तथा उनके साथी और सिक्का अगर बोर्ड में निरंतर बदलाव की व्यवस्था रखते तो कहीं अधिक बेहतर होता। आखिरकार बिहार और अफ्रीका में गहराई से काम कर रहे बिल गेट्स ने भी अपने लिए माइक्रोसॉफट में तकनीकी सलाहकार के रूप में बोर्ड सदस्यता बरकरार रखी है। 
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