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बुनियादी क्षेत्र में निजी निवेश पर जरूरी है नीतिगत परिवेश
विनायक चटर्जी /  February 23, 2017

अब वक्त आ गया है कि बुनियादी ढांचा विकास में निजी क्षेत्र के निवेश को बढ़ावा देने के लिए नीतिगत माहौल तैयार किया जाए। कैसे किया जा सकता है यह काम, बता रहे हैं विनायक चटर्जी 

 
संसद का शीतकालीन सत्र नीतियों के लिहाज से काफी अहम है। आर्थिक समीक्षा और आम बजट इसी सत्र में पेश किया जाता है और अर्थव्यवस्था को लेकर तमाम चर्चाएं भी इस दौरान होती हैं। इन सब में बुनियादी ढांचा क्षेत्र के लिए एक ही निष्कर्ष निकलता है: बुनियादी ढांचा क्षेत्र में निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए जमीनी हालात को दुरुस्त करना। स्पष्टï है कि सार्वजनिक व्यय की मदद से बुनियादी विकास को बढ़ावा देना वर्ष 2014 की गर्मियों तक एकदम उचित माना जाता रहा। यही वह दौर था जब मौजूदा सरकार सत्ता में आई। दरअसल उस वक्त निजी क्षेत्र का उत्साह कमजोर पड़ रहा था और बैंकिंग क्षेत्र की हालत भी हमेशा की तरह पतली थी। ऐसे में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार के पास इसके सिवा विकल्प ही क्या था? यही वजह थी कि नीतिगत आधार पर इस क्षेत्र में अच्छा खासा आवंटन किया गया। परंतु राजकोषीय घाटे से जुड़ी बाधा के कारण अब यह स्थिर है। इसके अलावा क्रियान्वयन क्षमताओं का सीमित होना भी इसके लिए जिम्मेदार है। सरकारी उद्यमों की क्षमता भी घट रही है। रेलवे का परिचालन अनुपात इस बारे में हमें बेहतर जानकारी देता है। 
 
वित्त मंत्री ने बुनियादी ढांचा विकास के लिए कुल बजटीय आवंटन का 18.5 फीसदी यानी 21. 47 लाख करोड़ रुपये में से 3.96 लाख करोड़ रुपया आवंटित कर पहले ही बहुत कुछ कर दिया है। परंतु क्या इस नीति को जारी रखने से कुछ फायदा होने वाला है? 12वीं पंचवर्षीय योजना (अप्रैल 2012 से मार्च 2017 के बीच) के दौरान करीब 12 लाख करोड़ रुपये मूल्य की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की जरूरत जताई गई थी। ऐसे में यह मानना उचित ही होगा कि अगर 13वीं पंचवर्षीय योजना जैसा कुछ होता तो इसमें सालाना जरूरत 15 लाख करोड़ रुपये के इर्दगिर्द होती। वर्ष 2017-18 के आम बजट में इस क्षेत्र में 3.96 लाख करोड़ रुपये के निवेश की बात कही गई है। मान लेते हैं कि राज्यों, मंत्रियों, सरकारी कंपनियों और विभाागों के बजटेत्तर स्रोतों से इसे 100 फीसदी पूरा किया जा सकता है। इसके बाद अगर सरकारी फंडिंग क्षमता में करीब आठ लाख करोड़ रुपये का इजाफा कर दिया जाए तो भी यह जरूरत का आधा ही होगा। बकाया सात लाख करोड़ रुपये सालाना की राशि की भरपाई तो निजी पूंजी से ही करनी होगी। दुर्भाग्यवश मौजूदा माहौल में इतनी बड़ी निजी पूंजी जुटा पाना मुश्किल है। आर्थिक समीक्षा कहती है कि राजनीतिक माहौल कुछ ऐसा है जहां निजी क्षेत्र को लेकर एक हद तक दुविधा का माहौल है। यह अपने आप में बड़ी चुनौती है। मेरे पास नौ ऐसे सुझाव हैं जिनकी मदद से एक बार फिर निजी क्षेत्र में जोश पैदा किया जा सकता है।
 
दोहरी बैलेंस शीट की समस्या का हल: आर्थिक समीक्षा में दोहरी बैलेंस शीट की समस्या को उजागर किया गया है। बैंकों के फंसे हुए कर्ज के बढ़ते स्तर और कर्ज के बोझ में दबे निजी क्षेत्र की बैलेंस शीट इसका उदाहरण हैं। इसका हल पब्लिक सेक्टर असेट रिहैबिलिटेशन एजेंसी (पारा) के रूप में सुझाया गया है ताकि हालात में सुधार हो सके। इसमें कहा गया है कि इस मुद्दे पर शीघ्र उच्चस्तरीय राजनीतिक हस्तक्षेप की जरूरत है। 
 
सार्वजनिक संपत्ति का पुनर्चक्रण: दीर्घावधि वाले संस्थागत विदेशी निवेशकों में भारत के बुनियादी ढांचा क्षेत्र में निवेश की भूख है। लेकिन वे नई परियोजनाओं के बजाय उन परियोजनाओं में काम कर रहे हैं जो पुराने औद्योगिक ठिकानों पर विकसित की जा रही हैं। सरकार परिचालन इकाइयों की सबसे बड़ी मालिक है। ऐसे में  सरकार और सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों को कर तथा अन्य माध्यमों से प्रोत्साहित किया जा सकता है। ताकि वे अपने कोष का पुनर्चक्रण कर उसे नई परियोजनाओं में लगा सकें। 
 
भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम में संशोधन: कई बार अच्छे नौकरशाह भी उचित वाणिज्यिक निर्णय नहीं ले पाते। उनको भय होता है कि जांच एजेंसियां उनके निर्णयों पर सवाल खड़े करेंगी और इसका असर उनके करियर तथा सेवानिवृत्ति पर पड़ेगा। ऐसे में भ्रष्टïाचार निरोधक अधिनियम, 1988 में संशोधन आवश्यक है। 
 
विवाद निस्तारण: सार्वजनिक अनुबंध (विवाद निस्तारण) विधेयक, 2015 के मुताबिक एक अधिकार प्राप्त पंचाट की परिकल्पना की गई जिसे सरकारी अनुबंधों से संबंधित विवाद निपटाने थे। एक विशेषज्ञ समिति का गठन भी किया गया जिसका काम था विशिष्टï राहत अधिनियम 1963 में संशोधनों की समीक्षा करना। इसने 20 जून 2016 को अपनी रिपोर्ट दे दी। वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में इसका जिक्र किया। 
 
मध्यस्थता संबंधी निर्णयों में फंसी राशि को जारी करना:  अगस्त 2016 में एक साहसी कदम उठाते हुए यह निर्णय किया गया कि निजी क्षेत्र के मध्यस्थता संबंधी मामलों में फंसी राशि का 75 फीसदी हिस्सा उनके हक में जारी किया जाएगा। इस कदम का क्रियान्वयन बहुत प्रसन्न होने की वजह नहीं देता। नौकरशाही व्यवस्था ने इस प्रक्रिया को ही बाधित किया। इस बैंक गारंटी की शर्त भी शामिल है। ऐसे में अगर सरकार राशि को 100 प्रतिशत बिना शर्त जारी करने की बात सोचती तो अच्छा होता क्योंकि  वैसे भी मध्यस्थता निर्णय के मामले में राज्य अन्यथा तो परास्त ही हो चुका है। 
 
3 पी इंडिया: यह राजग सरकार का ही विचार है कि निजी-सरकारी उद्यमों को मदद देने के लिए एक विश्वस्तरीय संस्थान गठित हो। इसकी घोषणा जुलाई 2014 के बजट में की गई थी और इसमें 500 करोड़ रुपये का कोष बनाया गया। इसे निजी सार्वजनिक उद्यम क्षेत्र को गति देने वाली एक अहम पहल माना गया। 
 
राष्ट्रीय निवेश एवं बुनियादी ढांचा कोष (एनआईआईएफ): एनआईआईएफ निश्चित रूप से बड़ी निजी फंडिंग को सुसंगत बनाने की नवाचारी पहल है। अब जबकि इसका सीईओ पदस्थ कर दिया गया है तो उम्मीद है कि आगामी वर्ष में यह निजी पूंजी की आवक को बुिनयादी ढांचा क्षेत्र से कारगर ढंग से जोड़ेगा। 
 
स्मार्ट सिटी और म्युनिसिपल बॉन्ड: इस क्षेत्र में आपूर्ति के लिए निजी पूंजी के संचारण को अहम माना गया है। इसके लिए म्युनिसिपल बॉन्ड बाजार में कई उपाय अपनाने होंगे। प्रधानमंत्री ने हाल में अपने एक भाषण में कहा था कि भारतीय पूंजी बाजार के कारोबारियों ने इस क्षेत्र को समुचित तवज्जो नहीं दी है। 
 
स्वतंत्र नियमन: नीति आयोग से कहा गया था कि वह नियामकीय सुधार विधेयक को अंतिम रूप दे। इसकी घोषणा वित्त मंत्री के 2015 के बजट में की गई थी। स्वतंत्र नियमन पीपीपी को गति देने के लिए अहम शर्त है। नियामकीय अनिश्चितता और अनुमान का न लग पाना एक बड़ा जोखिम बना हुआ है। इन उपायों के साथ देश में बुनियादी ढांचा क्षेत्र को एक बार फिर गति दी जा सकती है। देश के बुनियादी ढांचा क्षेत्र में निजी निवेश आकर्षित करने के लिए ये कुछ अहम उपाय हैं। 
 
Keyword: infra, बुनियादी ढांचा विकास,
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