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यूरोप पर फिर छा रहे अनिश्चितता के बादल
क्लॉड समद्जा /  February 22, 2017

यह विडंबना ही है कि उत्तरी अटलांंटिक इलाका राजनीतिक जोखिम का केंद्र बन चुका है। यूरोप के आसन्न संकट के बारे में विस्तार से बता रहे हैं क्लॉड समद्जा

 
कुछ प्रमुख संकेतक ऐसे भी हैं जो यूरो क्षेत्र के लिए अधिक बेहतर पूर्वानुमान सामने रख रहे हैं। मिसाल के तौर पर कुल बेरोजगारी में कमी और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर के इस वर्ष और अगले वर्ष 1.5 फीसदी रहने का अनुमान। परंतु इस बीच आशंका के नए बादल भी छाने लगे हैं। यह वर्ष यूरोप के लिए पर्याप्त जोखिम भरा है। नीदरलैंड में ताजा चुनावों से यह संकेत मिल रहा है। दक्षिणपंथी दल पार्टी फॉर फ्रीडम के गीयर्ट विल्डर्स आगामी मार्च में होने वाले चुनाव में अधिकतम सीटों पर जीत हासिल कर सकते हैं। हालांकि हो सकता है कि उन्हें बहुमत नहीं मिल पाए। विल्डर्स ने कहा है कि अगर वह सत्ता में आए तो नीदरलैंड को यूरो क्षेत्र और यूरो के चलन से बाहर निकालेंगे। चूंकि कोई और दल पार्टी फॉर फ्रीडम के साथ गठबंधन नहीं करेगा, इसलिए विल्डर्स के प्रधानमंत्री बनने की कोई संभावना नहीं है। लेकिन दो पारंपरिक दल- मध्य-दक्षिण रुख वाली और सोशल डेमोक्रेट शाखा में जबरदस्त गिरावट आ रही है। इन दोनों ने 2012 से गठबंधन सरकार चलाई है। यानी नीदरलैंड राजनीतिक अस्थिरता की ओर बढ़ रहा है। जो भी सरकार आएगी, उसे दक्षिणपंथ का जबरदस्त दबाव झेलना होगा। 
 
फ्रांस में राष्ट्रपति चुनाव आगामी मई माह में होने हैं। उसके बाद वहां संसदीय चुनाव होंगे। यहां भी पूरी तरह अनिश्चितता का माहौल है। वाम और दक्षिण के स्थापित प्रत्याशी नजर नहीं आ रहे। दक्षिणपंथी राष्ट्रपति प्रत्याशी पूर्व प्रधानमंत्री फ्रांस्वा फिलों हरे संकट में हैं। उन पर पैसे से जुड़े स्कैंडल का आरोप है। संभावना यही है कि धुर दक्षिणपंथी नेता मैरीन ली पेन पहले चरण के मतदान में शीर्ष पर रहेंगे और उनका मुकाबला इमैनुएल मैक्रॉन से होगा। मैक्रॉन आर्थिक मामलों के पूर्व मंत्री हैं। मैक्रॉन की जीत की संभावना जताई जा रही है हालांकि ली पेन की चकित करने वाली जीत की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे चाहे जो भी हों लेकिन संसदीय चुनाव के नतीजे स्थिर और विश्वसनीय बहुमत वाले होंगे, ऐसा लगता नहीं। जर्मनी में आगामी सितंबर में होने वाले चुनाव को लेकर भी हर कोई अटकल लगा रहा है। 
 
संभावना यही जताई जा रही है कि एंजेला मर्केल बतौर चांसलर चौथी बार जीत सकती हैं, लेकिन दो कारक उनकी राह में बाधा बन सकते हैं। पहली बात तो यह कि जर्मनी के लोग बीते दो साल में 12 लाख से अधिक शरणार्थियों और आर्थिक प्रवासियों के आगमन से काफी परेशान हैं। अब यह स्पष्ट हो गया है कि उनकी देखरेख का आर्थिक बोझ जर्मनी के करदाताओं को ही उठाना होगा। सरकारी संस्थान गवर्नमेंट इंस्टीट्यूट ऑफ इंप्लॉयमेंट रिसर्च के सर्वाधिक आशावादी अनुमानों के मुताबिक भी केवल 50 फीसदी प्रवासी ही अगले पांच साल तक अपने दम पर टिक पाएंगे। इस बीच इन प्रवासियों में घुस आए आतंकियों की हरकतों के कारण असुरक्षा का माहौल भी लगातार बढ़ रहा है। क्रिसमस के दौरान बर्लिन के बाजार में हुए ऐसे ही एक हमले में 12 लोग मारे गए और 48 अन्य घायल हो गए। धुर दक्षिणपंथी दल अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी की जीत की संभावना जताई जा रही है। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पहली दफा ऐसा होने की आशंका है कि कोई चरमपंथी दल जर्मनी की संसद का प्रतिनिधित्व करेगा। 
 
दूसरा कारक है यूरोपीय संसद के पूर्व अध्यक्ष मार्टिन शुल्ज को सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी का नया अध्यक्ष बनाया जाना। वह पहले ही मर्केल के लिए कड़ी चुनौती साबित हो चुके हैं। इस माह हुए चुनाव में उन्हें 50 फीसदी जबकि मर्केल को 34 फीसदी मत हासिल हुए। इटली में हालंाकि 2018 के पहले चुनाव होने की संभावना नहीं दिख रही है लेकिन किसी को यह नहीं पता कि मौजूदा सरकार कब तक चलेगी? देश की आर्थिक स्थिति लगातार खराब बनी हुई है और इस वर्ष अर्थव्यवस्था के बमुश्किल एक फीसदी की दर से बढऩे की संभावना है। इतना ही नहीं उसे दक्षिणपंथी फाइव स्टार आंदोलन से भी जमकर चुनौती मिल रही है। पूर्व प्रधानमंत्री मातेयो रेंजी भी अपनी वापसी की तैयारियों में लगे हैं। उन्होंने गत वर्ष दिसंबर में संवैधानिक मत संग्रह में पराजय के बाद इस्तीफा दे दिया था। आने वाले महीनों में काफी कुछ हो सकता है और जरूरी नहीं है कि निराश करने वाली घटनाएं ही सामने आएं। बहरहाल, खास राष्ट्रीय समयसीमाओं से परे यूरो क्षेत्र में चेतावनी का दौर चल रहा है। यूरोपीय संघ और लंदन के बीच ब्रेक्सिट वार्ता बहुत सुखद नहीं रहने वाली है। यूरोपीय संघ के कुछ सदस्य यूके को गत जून में किए गए ब्रेक्सिट संबंधी मतदान के लिए दंडित करना चाहते हैं जो ठीक नहीं है। ऐसे में जो कुछ होगा वह न केवल यूरोपीय संघ के लिए बल्कि ब्रिटेन के लिए भी उतना ही कष्टप्रद होगा। 
 
लेकिन यह भी संभव है कि ब्रेक्सिट शायद यूरोप और यूरो क्षेत्र के सामने आने वाले दिनों की सबसे बड़ी चुनौती न हो। कुछ प्रमुख संकेतकों में सुधार के बावजूद चारों ओर तूफान घिरते नजर आ रहे हैं। फ्रांस एक बार फिर बजट घाटे को जीडीपी के तीन फीसदी के दायरे में रखने में नाकाम नजर आ रहा है। यही बात इटली पर भी लागू होती है। जीडीपी के मुकाबले उसका कर्ज बढ़ता जा रहा है। यूरो क्षेत्र में फंसा हुआ कर्ज एक अरब यूरो के स्तर तक बढ़ चुका है। इसका एक तिहाई तो इटली के खाते में है। फ्रांस के आगामी चुनाव को लेकर व्याप्त अनिश्चितता और जोखिम वित्तीय बाजारों को परेशान कर रहे हैं। 
 
ग्रीस का ऋण संकट भी फिर सिर उठा रहा है। ग्रीस को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष कोष से सात अरब यूरो का ऋण मिलेगा या नहीं, इस पर भारी अनिश्चितता है। जबकि उसे इस राशि की जबरदस्त आवश्यकता है। आईएमएफ और यूरो क्षेत्र के मंत्री इस मसले पर एकमत नहीं हैं। जर्मनी और नीदरलैंड इसके सख्त खिलाफ हैं। ऐसे में ग्रीस के यूरो क्षेत्र से बाहर होने की खबर एक बार फिर सुर्खियां बन सकती है। इटली की सदस्यता को लेकर भी कयासों का दौर जारी रहेगा कि आखिर वह कब तक यूरो क्षेत्र में बना रह सकता है। उभरते बाजारों में राजनीतिक जोखिम कई वर्षों से अमेरिका और यूरोप के लिए चिंता का विषय बने रहे हैं। यह विडंबना ही है कि अब उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र वैश्विक स्तर पर राजनीतिक जोखिम का केंद्र बन गया है।
 
(नोट: लेखक समद्जा ऐंड समद्जा नामक सामरिक सलाहकार फर्म के प्रमुख हैं।)
Keyword: GDP, सकल घरेलू उत्पाद,
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