बिजनेस स्टैंडर्ड - विमुद्रीकरण के लाभ लेने का आया वक्त
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विमुद्रीकरण के लाभ लेने का आया वक्त
जैमिनी भगवती /  February 21, 2017

विमुद्रीकरण बड़े बदलाव का वाहक बन सकता है बशर्ते कि उसके समर्थन में कर अनुपालन बढ़ाने संबंधी विश्वसनीय कदम उठाए जाएं। किन कदमों की है जरूरत, बता रहे हैं जैमिनी भगवती 

 
विमुद्रीकरण यानी नोटबंदी में एक बड़ा और स्थायी बदलाव लाने की संभावना है। साथ ही, अगर बजट में की गई राजनीतिक दलों के चंदे संबंधी घोषणा लागू की जा सकी तो देश को समृद्घ और समतामूलक बनाने की दिशा में हम काफी तेजी से आगे बढ़ सकेंगे। सबसे पहले बैंक खातों में आठ नवंबर से 31 दिसंबर 2016 के बीच जमा की गई राशि पर नजर डालते हैं। 
 
एक फरवरी 2017 को दिए गए बजट भाषण से पता चलता है कि इस अवधि में निजी लोगों और कंपनियों द्वारा 1.09 करोड़ खातों में कुल दो लाख से 80 लाख रुपये की राशि जमा की गई। इसका औसत पांच लाख रुपये रहा। अन्य 1.48 लाख खातों में 80 लाख रुपये से अधिक की राशि जमा की गई। यहां औसत 3.3 करोड़ रुपये रहा। क्या निजी व्यक्तियों और कंपनियों को कारोबारी जरूरत के लिए या निजी इस्तेमाल के लिए इतनी मात्रा में धन रखने की आवश्यकता होती है? 
 
इस साल जनवरी तक करीब 27 करोड़ पैन कार्ड जारी किए जा चुके थे जबकि  गत वर्ष 2.5 लाख रुपये से अधिक सालाना आय वाले केवल 2.7 करोड़ लोगों ने ही आयकर भरा। जौहरियों, पेशेवरों तथा अन्य लोगों ने ऐसी भारी धनराशि अपने खातों में जमा की जो उनकी बीते सालों की कर योग्य आय से मेल नहीं खाती। यही वजह है कि पारदर्शिता के नाते सरकार को विमुद्रीकरण के बाद जमा राशि पर श्वेतपत्र लाना चाहिए। जिन लोगों ने बड़ी धनराशि जमा की, उनके कर भुगतान पर खास ध्यान देना चाहिए। ऐसा लगता है कि कई बैंकों के अलग-अलग खातों में भारी धनराशि जमा की गई लेकिन उनका पैन नंबर एक ही है। ऐसे मामलों में नोटिस जारी किए जाएं जिनमें भारी भरकम राशि जमा की गई है और जिनका पुराना कर रिकॉर्ड उससे मेल नहीं खाता। 
 
साथ ही, यह भी जरूरी है कि वैध कारोबार करने वालों को या जरूरी वजह से बड़ी नकदी रखने वाले लोगों को कर अधिकारी किसी भी तरह परेशान नहीं करें। श्वेत पत्र लाने से होगा यह कि कर अधिकारी कर वंचना करने वालों से न तो धन ऐंठ पाएंगे और न ही उनसे साठगांठ कर पाएंगे। यह श्वेत पत्र मॉनसून सत्र की शुरुआत में संसद के समक्ष पेश कर दिया जाना चाहिए। 
 
जहां तक नकद लेनदेन की बात है तो सरकार ने तीन लाख रुपये तक की सीमा क्यों तय की? बेनामी संपत्ति वालों के अलावा क्या कोई ऐसा व्यक्ति है जो तीन लाख रुपये नकद से खरीद फरोख्त करता हो? छोटे उद्यमों को अपने उन कर्मचारियों को भुगतान के लिए नकदी की जरूरत हो सकती है जिनके पास बैंक खाते नहीं हों। लेकिन एक समय सीमा तय करके उसके भीतर तीन लाख रुपये तक के लेनदेन को घटाकर 50,000 रुपये तक लाना चाहिए। बजट भाषण में कहा गया कि आधार समर्थित भुगतान व्यवस्था का कारोबारी संस्करण आधार पे जल्द ही शुरू हो जाएगा। यह तथा अन्य डिजिटल भुगतान माध्यम आने से भारी -भरकम नकद लेनदेन की जरूरत कम होती जाएगी। 
 
आने वाले महीनों में जीएसटी लागू होने को लेकर अनिश्चितता रहेगी। इसके अलावा बैंक ऋण में बढ़ोतरी की दर धीमी रह सकती है। बड़े कारोबारी घरानों के कर देनदारी में चूक करने और इसके चलते फंसे हुए कर्ज में बढ़ोतरी के चलते सरकारी बैंक परेशान ही रहेंगे। बजट भाषण में की गई घोषणा के उलट सरकार को चाहिए कि राजनीतिक दलों को नकदी में 2,000 रुपये तक के चंदे की इजाजत भी न दे। सरकार की दलील है कि निर्वाचन आयोग ने नकद चंदे को 20,000 रुपये से घटाकर 2,000 रुपये करने का सुझाव दिया था। इस समाचार पत्र समेत तमाम अखबारों ने इस विषय पर लेख लिखे और यह कहा कि 2000 रुपये तक के नकद और बेनामी चंदे की व्यवस्था होने पर भी गड़बड़ी की आशंका पूरी तरह समाप्त नहीं होती। हर दल के लाखों समर्थक हैं जो 2,000 रुपये के हिसाब से आराम से चंदा दे सकते हैं। जाहिर सी बात है कि 2,000 रुपये तक का चंदा देने की इजाजत देने की भी कोई वजह नजर नहीं आती। 
 
बजट के पैराग्राफ 164 और 165 में पारदर्शी चुनावी फंडिंग के अधीन यह इरादा जताया गया है कि राजनीतिक चंदे के लिए बेनामी बॉन्ड की इजाजत दी जाए। ये बॉन्ड आरबीआई अधिनियम में संशोधन के बाद बैंक जारी कर सकेंगे। दलील दी गई है कि दानदाताओं ने चेक के जरिए या अन्य पारदर्शी तरीकों से चंदा देने की अनिच्छा जाहिर की है क्योंकि इससे उनकी पहचान सामने आ जाएगी जिसके उनको विपरीत परिणाम झेलने पड़ सकते हैं। यह बेतुकी दलील है कि दानदाता अपनी पहचान को लेकर चिंतित होंगे। आखिर नकारात्मक परिणाम कैसे और क्यों भुगतने पड़ेंगे और ऐसा कौन करेगा? ऐसा लगता है कि सरकार कंपनियों की ओर से दिए जाने वाले चंदे को लेकर काफी ङ्क्षचतित नजर आ रही है जिससे कि एक राजनीतिक दल को दिए गए चंदे के बारे में दूसरे दल को पता नहीं चले। अगर इन बॉन्ड का कर वंचना में इस्तेमाल होने की संभावना नहीं है तो क्या सरकार लोगों या कंपनियों को भी एक दूसरे को भुगतान के लिए इनके उपयोग की इजाजत देगी? 
 
बैंक आखिर यह कैसे सुनिश्चित करेंगे कि ये बियरर बॉन्ड केवल दलों के खातों में जमा कराने के लिए ही होंगे? यह कैसे सुनिश्चित होगा कि छद्म राजनीतिक दल अपने खाते में जमा करने के लिए इनका इस्तेमाल नहीं करेंगे? एक बार बॉन्ड के राजनीतिक दलों के खाते में जमा होने के बाद छोटी राशि के डिमांड ड्राफ्ट जारी किए जा सकते हैं और फिर इस ड्राफ्ट को कई व्यक्तिगत खातों में जमा किया जा सकता है।
 
ऐसी तमाम बातें हैं जिनको लेकर व्यापक भ्रम की स्थिति बन सकती है। बॉन्ड जारी होने के बाद से उसके अंतिम लाभार्थी का पता लगाने का काम इतना जद्दोजहद भरा है कि शायद फॉरेंसिक विशेषज्ञ भी इसे न पकड़ पाएं। अगर सरकार और कर अधिकारियों तथा कॉर्पोरेट-राजनीतिक दलों या आम लोगों के बीच किसी तरह का विवाद होता है तो फिर अदालत में दशकों लग जाएंगे। 
 
अब वक्त आ गया है कि राजनीतिक चंदे पर हर तरह की कर रियायत खत्म कर दी जाए। हम जानते हैं कि 50 फीसदी से अधिक पंजीकृत राजनीतिक दल ऐसे हैं जिन्होंने कभी चुनाव नहीं लड़ा। वे शायद केवल काला धन सफेद करने के लिए हैं। जब तक ऐसे राजनीतिक दलों की मान्यता खत्म नहीं की जाती जो कोई राजनीतिक गतिविधियां नहीं चलाते और भविष्य में भी इस तरह के दलों को बनने से नहीं रोका जाता तब तक सरकार इनको बॉन्ड के रूप में कर मुक्त चंदा हासिल करने से कैसे रोकेगी?
 
विमुद्रीकरण बड़ा बदलाव ला सकता है लेकिन उसके लिए जरूरी है कि जमा, कर चुकाने और बेनामी धन, कर रियायत वाले चुनावी चंदे आदि की दिक्कतों को ठोस तरीके से दूर किया जाए। लब्बोलुआब यह है कि विमुद्रीकरण के बाद लोगों को प्रतीक्षा है कि राजनीतिक चंदे को साफ सुथरा बनाया जाए और विमुद्रीकरण के लाभ बेहतर कर अनुपालन के साथ सामने आएं।
Keyword: विमुद्रीकरण, नोटबंदी, बजट, नकद लेनदेन,
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