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'महाराजा' की राह
संपादकीय /  February 21, 2017

हाल ही में नागरिक उड्डयन मंत्री अशोक गजपति राजू से जब सरकारी विमानन कंपनी एयर इंडिया के भविष्य के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि सरकार इस एयरलाइन का वजूद बनाए रखने के पक्ष में है। साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इसका संचालन कौन करता है? उन्होंने अपनी बात के पक्ष में तर्क रखा कि आम करदाता के पैसे से इस एयरलाइन को हमेशा नहीं चलाया जा सकता है। इन सभी बातों को एक साथ रखकर देखें तो यह स्वागतयोग्य होने के साथ ही निराशाजनक भी है। एक तरफ तो यह बयान यह संकेत देता है कि एयर इंडिया भविष्य में आंशिक तौर पर निजी क्षेत्र के हवाले भी हो सकती है। दूसरी तरफ यह बयान बाजार में भरोसे की कमी और विमानन क्षेत्र के संचालन के बारे में समुचित जागरूकता की कमी भी उजागर करता है। अगर एयर इंडिया को बने रहना है तो इसका फैसला यात्रियों की पसंद और बाजार के मूलभूत सिद्धांतों के आधार पर होना चाहिए।

 
अगर सरकार मानती है कि करदाताओं के पैसे का इस्तेमाल एयर इंडिया के लिए हमेशा नहीं किया जा सकता है तो फिर उसे इस धारणा पर काम करते हुए दिखना भी चाहिए। ऐसी रिपोर्ट आ रही हैं कि एयर इंडिया कुछ और ड्रीमलाइनर विमानों को खरीदने या पट्टïे पर लेने के बारे में सोच रही है। इसी तरह एयर इंडिया में रणनीतिक निवेश के लिए कुछ सार्वजनिक बैंकों के इच्छुक होने की भी खबरें हैं। इसके बाद इस सरकारी विमानन कंपनी को सूचीबद्ध कराने की भी बात है। ऐसी चर्चाओं से एयर इंडिया को लेकर काफी संदेह का वातावरण बना है जो चिंताजनक है। पहले से ही संकट से जूझ रहे सार्वजनिक बैंकों को इस सफेद हाथी के पालन-पोषण का जिम्मा सौंपे जाने का विचार ही अपने आप में समस्यापरक है। इतने अधिक कर्ज के बोझ तले दबी किसी एयरलाइन के शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने की पात्रता को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं है।
 
मूलभूत समस्या अब भी यही है कि सरकार एयर इंडिया पर अपना नियंत्रण बनाए रखना चाहती है और उसकी नजर में ऐसा किया जाना राष्ट्रीय हित के लिहाज से महत्त्वपूर्ण भी है। लेकिन सरल शब्दों में कहें तो ऐसी कोई बात नहीं है। अतीत में यह एयरलाइन भले ही अहम रही हो और कई दशकों में इसके प्रबंधन में चाहे जो भी गलतियां की गई हों, एयर इंडिया सुचारु रूप से चल रहे विमानन क्षेत्र के लिए अब जरूरी नहीं रह गई है। असलियत यह है कि यह पूरे विमानन क्षेत्र को झटका देता है। अपनी गलतियों, अक्षमता और गलत कीमत स्तर की भरपाई के लिए सरकारी कोष से धन जुटाने की क्षमता रखने वाले एक प्रतिद्वंद्वी के होने का मतलब है कि अन्य विमानन कंपनियों को एक तरह से दंडित किया जा रहा है। ऐसे में यह निष्कर्ष निकालना लाजिमी है कि नौकरशाह और राजनेता ही चाहते हैं कि सरकार की तरफ से एक विमानन कंपनी चलती रहे। उनका सरोकार यह नहीं है कि ऐसा करने से देश को या करदाताओं को कोई लाभ होता है या नहीं।  एयर इंडिया के निजीकरण से कम कोई भी समाधान कारगर नहीं होगा। अगर इसके लिए कुछ गतिविधियों को बंद करना पड़े तो भी उसे अंजाम दिया जाए। इसे निजी हाथों में सौंपने का विचार सुनने में अच्छा लगता है लेकिन जब तक इसे मुश्किल से उबारने के लिए सरकारी मदद मौजूद होगी तब तक एयर इंडिया के निजी ऑपरेटर के पास भी इसे मुनाफा लायक स्थिति में पहुंचाने की कोई खास प्रेरणा नहीं होगी। इसी तरह एयर इंडिया को शेयर बाजार में सूचीबद्ध कर देने से ही उसमें बाजार का अनुशासन नहीं आ जाएगा। हाल में पता चला है कि इस एयरलाइन के निजीकरण की एक योजना को लगभग अंतिम रूप दे दिया गया था लेकिन अंतिम समय में उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। अगर सरकार वाकईचाहती है कि आम करदाताओं के पैसे को एयर इंडिया में नहीं लगाया जाए तो फिर उसे निजीकरण के प्रस्ताव पर दोबारा विचार करना चाहिए।
Keyword: नागरिक, उड्डयन, मंत्री, अशोक गजपति राजू, सरकारी, विमानन, कंपनी, एयर इंडिया,
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