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नीतियों का छलावा प्रदूषण फैलाने वाले ईंधन को बढ़ावा
जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  February 20, 2017

नीतियां विपरीत असर वाली भी हो सकती हैं। ऐसा सोचना मुश्किल है लेकिन मैं पहले भी यह बात कह चुकी हूं। मैं एक बार फिर अपनी बात दोहराना चाहती हूं और इसके लिए मेरे पास वजह भी है। पहले मैंने यह बात इस संदर्भ में लिखी थी कि कैसे नीतियां अंतत: दिल्ली और उसके आसपास के इलाके में गंदे और निहायत प्रदूषणकारी ईंधन को बढ़ावा देती हैं। भले ही हम दिल्ली के प्राणघातक वायु प्रदूषण को लेकर कितनी भी बातें क्यों न करें, परंतु यह नीतिगत दोष का पूरा परिदृश्य नहीं है। इसके अलावा भी बहुत कुछ है। लेकिन पहले एक संक्षिप्त नजर डालते हैं। 

 
बीते कुछ महीनों से हम अपने शहरों में बढ़ते वायु प्रदूषण को लेकर खासे चिंतित हैं। इस दौरान मेरा ध्यान वायु उत्सर्जन के संभावित स्रोतों पर था। हमारी जांच से पता चला कि ज्यादा सल्फर वाले ईंधन (फर्नेस ऑयल और पेट कोक) का राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में व्यापक तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। ऐसा इसलिए कि यह अन्य उपलब्ध विकल्पों मसलन प्राकृतिक गैस और बिजली की तुलना में खासा सस्ता है। ऐसा करने में नीतियां मददगार साबित हुईं। नीतियों ने इसे संभव बनाया। प्राकृतिक गैस पर कर लगाया गया जबकि फर्नेस ऑयल कर मुक्त था। पेट कोक में 70,000 पीपीएम से अधिक सल्फर होता है जबकि डीजल में 50 पीपीएम। लेकिन उसका आयात और इस्तेमाल भी नि:शुल्क है। यह प्रदूषण का कारोबार है।
 
हमने यह भी पाया कि दिल्ली में स्वीकार्य ईंधन को लेकर एक अधिसूचना जारी की गई। इसके जरिये तकनीकी रूप से उच्च सल्फर वाले ईंधन पर रोक लगा दी गई। लेकिन एनसीआर में ऐसा नहीं किया गया और वहां सल्फरयुक्त ईंधन के प्रयोग से प्रदूषण फैलना जारी रहा। दिल्ली के आसपास के 1,000 किलोमीटर के दायरे में 8,588 मेगावॉट की स्थापित क्षमता वाले कोयला और गैस आधारित बिजली संयंत्र हैं। इतनी बिजली इस इलाके के उद्योग धंधों के लिए पर्याप्त है। एक ओर जहां कोयला आधारित संयंत्र प्राकृतिक गैस आधारित संयंत्रों की तुलना में बहुत अधिक प्रदूषण फैलाते हैं वहीं वे फर्नेस ऑयल और पेट कोल की तुलना में कहीं अधिक स्वच्छ भी होते हैं। ऐसे में दिल्ली, उत्तर प्रदेश के दादरी और हरियाणा के झज्जर में पांच कोयला आधारित बिजली संयंत्रों से होने वाले उत्सर्जन को रोकना तकनीकी रूप से संभव भी है और व्यवहार्य भी। तो फिर समस्या क्या है?
 
तथ्य यह है कि ये बिजली संयंत्र अपनी कुल क्षमता का बमुश्किल 20 फीसदी ही इस्तेमाल कर रहे हैं। जी हां, आपने बिल्कुल सही पढ़ा। इस क्षेत्र में इतनी अधिक स्थापित क्षमता है कि यहां कभी बिजली नहीं गुल होनी चाहिए और खराब ईंधन का इस्तेमाल करने की आवश्यकता भी नहीं होनी चाहिए। यही वजह है कि हमें नीति संचालित प्रदूषण को समझने की आवश्यकता है। 
 
कोयला आधारित बिजली फर्नेस ऑयल या पेट कोक से बेहतर है। दिल्ली के आसपास 5,345 मेगावॉट की स्थापित क्षमता है। इसमें से केवल 19 फीसदी का इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे भी बुरी बात यह है कि इनमें से सबसे पुराने और सबसे अधिक प्रदूषण फैलाने वाले संयंत्र चलाए जा रहे हैं क्योंकि सरकार की मौजूदा नीति के तहत सबसे सस्ती बिजली की आपूर्ति सबसे पहले की जाती है। इसका मतलब पुराने संयंत्र, जिनकी पूंजी का अवमूल्यन हुआ है उनकी निर्धारित बिजली लागत सबसे कम है। इसी चीज की बिक्री होती है। स्टेशन हीट रेट (एसएचआर) यह जानने का बेहतर तरीका है कि बिजली संयंत्रों में प्रदूषण की क्या क्षमता है? यह किफायत जांचने के लिए बेहतर है क्योंकि न्यूनतम ताप दर का अर्थ होता है कम ईंधन खपत करके समान ऊर्जा हासिल करना। दिल्ली के बदरपुर संयंत्र (30 साल पुराना) का एसएचआर 2,750 किलो कैलोरी किलोवॉट आवर है जबकि दादरी के 20 साल पुराने संयंत्र में यह 2,450 किलो कैलोरी किलोवॉट आवर है। इससे इतर तीन अपेक्षाकृत नए कोयला आधारित संयंत्रों, दादरी-2, एनटीपीसी अरावली पावर और चाइना लाइट ऐंड पावर (दोनों झज्जर) में यह करीब 23,00 किलो कैलोरी किलोवॉट है।
 
मौजूदा नीति के अधीन स्वच्छ संयंत्रों को कोई प्रोत्साहन हासिल नहीं है। अगर ये संयंत्र कम कोयला भी जलाएं और कम उत्सर्जन करें तब भी उनकी तयशुदा लागत मामूली तौर पर ज्यादा है। इसलिए इन संयंत्रों को चलाया नहीं जाता। पहली बात तो यह कि गंदा फर्नेस ऑयल और पेट कोक स्वच्छ ऊर्जा पर पहले से ही बढ़त बनाए हुए है। दूसरा, गंदे कोयले से बनने वाली बिजली को स्वच्छ कोयले से बनने वाली बिजली पर वरीयता है। तीसरी बात, नीति कुछ इस तरह की है कि गंदे कोयले को स्वच्छ प्राकृतिक गैस पर वरीयता दी जाती है। अब जरा प्राकृतिक गैस आधारित दिल्ली के बवाना संयंत्र पर नजर डालते हैं। बदरपुर के 2,750 किलो कैलोरी किलोवॉट प्रति घंटे की तुलना में बवाना संयंत्र महज 1,845 किलो कैलोरी किलोवॉट उत्सर्जन करता है। जाहिर है यह बदरपुर से काफी बेहतर है और सबसे स्वच्छ ईंधन आधारित बिजली संयंत्र भी। उत्सर्जन मानक पर देखें तो गैस संयंत्रों में प्रदूषण कम होता है। 
 
इसके बावजूद बवाना संयंत्र शायद ही चलता हो। या तो गैस उपलब्ध नहीं रहती है या फिर इसकी कीमत अधिक होती है। इसके अलावा गंदा ईंधन इतनी अधिक मात्रा में उपलब्ध रहता है कि गैस का इस्तेमाल ही नहीं किया जाता। नीतियां बनी ही कुछ ऐसी हैं। फर्नेस ऑयल या पेट कोक पर कर नहीं लगता। पेट कोक पर कोयला उपकर नहीं लगता है और न ही कोई राज्य वैट या कर जबकि गैस पर तमाम कर लगाए जाते हैं। ईंधन जितना गंदा होता है प्रोत्साहन उतना ज्यादा। काश कोई मुझे गलत साबित कर देता। 
Keyword: pollution, प्रदूषण, ईंधन, वायु, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, एनसीआर,
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