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चुनौतियों की पटरी पर रेल बजट की गठरी
सुबीर रॉय /  February 20, 2017

भारतीय रेल के सामने कई तरह की चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हैं। उनका हल केवल साझा रेल बजट नहीं हो सकता। क्या हों इससे निपटने के उपाय, बता रहे हैं सुबीर रॉय 

 
रेलवे के लिए अलग बजट की व्यवस्था समाप्त कर उसे आम बजट में शामिल करने के लिए यह बहुत अनुचित अवसर था। इसकी कई वजह हैं। पहली बात तो यह कि रेलवे की वित्तीय स्थिति खासी खस्ता है। उसका परिचालन अनुपात (कुल परिचालन व्यय और सकल आय का अनुपात) चालू वित्त वर्ष में 94.9 फीसदी के निचले स्तर पर जा सकता है। यानी रेलवे को जो भी आय होती है वह लगभग पूरी ही उसके परिचालन खर्च में चली जाती है। यानी निवेश के लिए उसके पास कुछ नहीं बचता। रेलवे के खर्च में इसलिए भी इजाफा हुआ है क्योंकि सरकार ने सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें भी इसी वित्त वर्ष में लागू करने का निर्णय लिया है। 
 
एक वेतन आयोग की स्थापना एक दशक में कमोबेश एक ही बार होती है। इस तरह यह व्यय में एकबारगी बढ़ोतरी की वजह बनता है। इस दृष्टि आय में स्थिर वृद्धि का क्रम चलना चाहिए। इस मोर्चे पर हालत सबसे अधिक खराब है। इतिहास में पहली बार, रेलवे इस वर्ष न केवल माल ढुलाई में तय लक्ष्य से पीछे रह जाएगा बल्किइसकी माल ढुलाई पिछले साल के 110.10 करोड़  टन से घटकर 109.3 करोड़ टन पर आ जाएगी। इसका असर उसकी आय पर पड़ेगा। आय में तय लक्ष्य से 9 फीसदी यादी करीब 17,000 करोड़ रुपये की कमी आएगी। रेलवे की आय का यह रुझान निराश करने वाला है। आने वाले वित्त वर्ष में भी रेलवे के प्रदर्शन में सुधार की कोई आशा किसी को नहीं है। आगामी वर्ष के लिए परिचालन अनुपात 94.6 फीसदी रहने का अनुमान है जो इस वर्ष के समान ही है। 
 
इस बदलाव के लिए वक्त इसलिए भी सही नहीं है क्योंकि हाल के दिनों में कई रेल दुर्घटनाएं हुई हैं। ऐसे में चीजों को दुरुस्त करने के लिए आवश्यकता यह है कि वित्तीय संसाधनों और प्रबंधन के स्तर पर थोड़ा ध्यान दिया जाए। इन दुर्घटनाओं के लिए मोटे तौर पर गाडिय़ों का बेपटरी होना उत्तरदायी है। रेल पटरियां खासी पुरानी पड़ चुकी हैं और उनको समय पर बदला नहीं जा रहा है। पिछली बार सरकार ने पटरियों में सुधार के लिए विशेष रेल सुरक्षा निधि (एसआरएसएफ) का गठन करने का फैसला किया था। वर्ष 2001 में यह कथित कोष बनाया गया और इसमें 17,000 करोड़ रुपये की राशि का आवंटन भी किया गया। इसमें केंद्र सरकार ने 12,000 करोड़ रुपये का योगदान किया था जबकि 5,000 करोड़ रुपये रेलवे ने सुरक्षा उपकर लगाकर जुटाए थे। 
 
सुरक्षा और नवीनीकरण का ध्यान रखते हुए सरकार ने बजट में कहा कि एक लाख करोड़ रुपये की लागत से राष्ट्रीय रेल संरक्षा कोष की स्थापना की जाएगी और इस राशि को पांच साल में खर्च किया जाएगा। यह आंकड़ा दिलचस्प है लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए इसके कागजी बने रहने की आशंका अधिक है। इसलिए कि सरकार इसमें केवल शुरुआती पूंजी मुहैया कराएगी जबकि शेष राशि रेलवे को अपने संसाधनों से जुटानी होगी। रेलवे के पास अपने संसाधन हैं ही नहीं। खुद रेलवे के अनुमानों के मुताबिक परिचालन व्यय के चलते उसके पास आगे भी संसाधन होने का अनुमान नहीं है। ऋण के जरिए कुछ संसाधन आ सकते हैं लेकिन वे महंगे पड़ेंगे। बाद में उसकी लागत बहुत बढ़ जाएगी। एक तरीका यह हो सकता है कि सुरक्षा उपकर लगाया जाए लेकिन वह किराया बढ़ाने जैसा ही है। यात्री किराया अथवा माल ढुलाई किराया बढ़ाने की गुंजाइश नहीं है। 
 
दरअसल यात्रियों की संख्या में कमी और माल ढुलाई में कमी इसलिए आई है क्योंकि रेलवे जरूरी सुधारों को अंजाम नहीं दे सका। इसके चलते वह बाजार में आ रहे बदलावों के साथ भी कदमताल नहीं कर सका। भारतीय रेल को अब वह पुराना तरीका बदलना होगा जिसके तहत वह कोयला, लौह अयस्क, इस्पात और अन्न जैसी जिंसों की ढुलाई करता था। कई दशक पहले थोक ढुलाई का लाभ लेने के लिए रेलवे ने अलग से जिंसों के लिए पूरा रैक बुक करने की परंपरा की शुरुआत की थी। इसका असर वैगन संचालन पर भी पड़ा। एक खास किस्म के माल की ढुलाई के लिए किए जाने बदलाव ने उनकी महत्ता कम की। 
 
आज जरूरत है कि पार्सल जैसे छोटे वजन वाले कारोबार पर ध्यान दिया जाए। इसे भेजने वाले की जगह से उठाकर ग्राहक के ठिकाने तक पहुंचाया जाए। इसके लिए न केवल यार्ड की प्राथमिकता तय करनी होगी बल्कि लॉजिस्टिक्स पार्क भी स्थापित करने होंगे जहां रास्ते में वस्तुओं का भंडारण किया जा सके। सरकार ने इस संबंध में जरूरी संदेश को समझा तो है लेकिन आधा-अधूरा। 
 
बजट भाषण में परिवहन को लेकर समग्र हल मुहैया कराने पर जोर दिया गया है जो कि उचित ही है लेकिन आगे चुनिंदा जिंसों का जिक्र है जो ध्येय को पूरा नहीं होने देगा। खराब होने वाली वस्तुओं की ढुलाई के लिए अलग सुविधा का जिक्र है। इसमें भी संशय है। विपणन के बिंदु भी स्पष्टï नहीं हैं और प्रबंधन की कमी की ओर इंगित करते हैं। बुनियादी ढांचा और ट्रैक्शन जैसे तकनीकी कामों के अलावा वस्तु और यात्रियों जैसे ग्राहकों से जुड़े क्षेत्र में भी रेलवे बोर्ड सदस्य अहम भूमिका निभा सकते थे। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। वास्तव में रेलवे के लिए सबसे बड़ी जरूरत तो यह है कि विभिन्न अधिकारियों के कैडर खत्म करके भारतीय रेल सेवा जैसी एकीकृत व्यवस्था अपनाए। अगर ऐसा किया जा सका तो यह बेहतर होगा। 
 
इससे रेलवे बोर्ड चेयरमैन की ताकत भी कम होगी। अलग अलग हितों वाले बोर्ड सदस्यों के कारण मामला लंबा खिंचता है। ऐसे में चेयरमैन को किसी कंपनी के सीईओ की तरह काम करना चाहिए जो जरूरी फैसले ले सके। मौजूदा हालात में यह संभव नहीं। ऐसे में प्रबंधन की कमी अहम मुद्दा है। रेलवे बजट के खात्मे ने वरिष्ठï रेल अधिकारियों को निराश किया है। उन्हें लग रहा है कि उनकी महत्ता कम हो गई। रेल बजट खत्म करने के बाद अगर उसका निगमीकरण किया जाता तो भी बात समझ में आती। आखिर भारतीय इस्पात प्राधिकरण या भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स के तर्ज पर भारतीय रेल काम क्यों नहीं कर सकता? ये कंपनियां तिमाही नतीजे घोषित करती हैं और अंशधारकों के प्रति जवाबदेह हैं। निगमीकरण से इसमें पेशेवर रुख आता। रेलवे बजट के खात्मे ने इसके बारे में जानकारियों का दायरा और सीमित कर दिया है। पारंपरिक रेल बजट में जो जानकारियां सामने आती थीं, उन्हें अभी भी देने का वादा किया गया था लेकिन ऐसा अब तक नहीं किया गया। जैसा कि रेलवे के एक पुराने कर्मचारी ने टिप्पणी की थी, 'शायद छिपाने के लिए बहुत कुछ है।' लब्बोलुआब यह कि राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के चलते एक बड़ी सार्वजनिक परिसपंत्ति का क्षरण हो रहा है। इस बीच दुर्घटनाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है।
Keyword: रेलवे, आम बजट, वेतन आयोग,,
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