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'आप' के दो साल
साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  February 17, 2017

आम आदमी पार्टी (आप) की दिल्ली सरकार के दो साल पूरे हो गए हैं। अगले महीने आने वाले चुनाव नतीजों में आप के पंजाब में अच्छे प्रदर्शन की भी उम्मीद है। अगर कुछ जनमत सर्वेक्षणों पर यकीन करें तो आप पंजाब में सरकार बनाने की स्थिति में पहुंच सकती है। पार्टी ने अभी से गुजरात विधानसभा चुनावों के लिए भी अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं। हालांकि गुजरात में 10 महीने बाद चुनाव होने वाले हैं। उसके बाद पार्टी के एजेंडे पर राजस्थान भी है जहां अगले साल चुनाव होंगे। पंजाब की ही तरह इन दोनों पश्चिमी राज्यों में भी आप भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से इतर मतों का बंटवारा करेगी जिससे आखिरकार भाजपा को ही फायदा होगा।  

 
इन सबसे बेअसर आप के इकलौते आलाकमान अरविंद केजरीवाल राष्ट्रीय राजधानी से बाहर अपनी पार्टी के विस्तार में लगे हुए हैं। केजरीवाल अपने मकसद में नाकाम हो सकते हैं लेकिन एक क्षेत्रीय ताकत बनने की उनकी प्रतिबद्धता राहुल गांधी के ठीक उलट है जो एक के बाद एक राज्य में कनिष्ठ सहयोगी बनने के लिए तैयार दिख रहे हैं। बिहार और पश्चिम बंगाल के बाद अब उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस कनिष्ठ दल है। अगर पंजाब में आप जीत जाती है तो यह क्षत्रपों के अपने प्रभाव वाले राज्यों से बाहर विस्तार करने में नीतीश कुमार, मुलायम सिंह, मायावती या ममता बनर्जी को मिली नाकामी के उलट होगा।
 
आप अब उदारवादियों और जनहित याचिकाओं के जरिये व्यवस्था बदलने का मंसूबा पालने वाले लोगों की पार्टी नहीं है। असल में, पार्टी ने गैर-भाजपा और गैर-कांग्रेस विकल्प का सपना देखने वाले ऐसे लोगों को उसी तरह बाहर कर दिया है जिस तरह अन्ना हजारे को किनारे किया गया था। आप के भीतर अब ऐसे ही आम लोगों का समूह बचा हुआ है जो लगातार गलत वजहों से चर्चा में रहे हैं। कभी आप की पहली सरकार के अचानक इस्तीफा देने, कभी पार्टी पर वर्चस्व को लेकर छिड़े सत्ता संघर्ष, कभी पार्टी के विधायकों की गिरफ्तारी के सिलसिले (कुल 67 विधायकों में से 11 की गिरफ्तारी), कभी फर्जी डिग्री और महिलाओं के साथ ज्यादती और इनके 'मैक्सिमम लीडर' के हमेशा लड़ाकू अंदाज में रहने, अपनी सीमा लांघने और मुकदमों को दावत देने के चलते आप लगातार विवादों में रही है।
 
कोई अचरज नहीं होना चाहिए कि ऐसे राजनीतिक समूह के आर्थिक वादे घनघोर लोकप्रियतावादी रहे हैं। दिल्ली में बिजली दरों को आधा करना और मुफ्त पानी देने जैसे कदम इसकी बानगी हैं। पंजाब के लिए जारी घोषणापत्र में भी आप ने वेतन और पेंशन बढ़ाने, मुफ्त में लैपटॉप और वाई-फाई देने, कम कीमत में भोजन देने और दिल्ली की तर्ज पर मुफ्त स्वास्थ्य सेवा देने और मोहल्ला क्लिनिक जैसे वादे किए हैं। पार्टी ने दलितों के लिए खास पैकेज की भी बात कही है। पंजाब के कुल मतदाताओं में दलितों की आबादी करीब एक तिहाई है जो देश के किसी भी राज्य से ज्यादा है। आप की पूरी कोशिश आम आदमी के इर्दगिर्द ही अपना चुनावी अभियान चलाने की रही है।
 
अगर यह पार्टी एक क्षेत्रीय ताकत बनने में सफल होती है तो दिल्ली में इसका प्रदर्शन काफी प्रासंगिक हो जाता है। सवाल है कि क्या दिल्ली में आप सरकार अपने वादों पर खरा उतरी है? जवाब हां और ना दोनों है। आप ने बिजली की दरें कम की हैं और पानी भी मुफ्त कर दिया है। आप सरकार के बजट का एक बड़ा हिस्सा शिक्षा का है जिससे सरकारी स्कूलों की स्थिति पर फर्क पड़ेगा। लेकिन यह एक लंबी प्रक्रिया है और अभी लंबा सफर तय करना है। आप ने एक हजार मोहल्ला क्लिनिक खोलने की बात कही थी लेकिन अभी तक उसका दसवां हिस्सा ही पूरा किया जा सका है। वैसे इन क्लिनिक पर लगने वाली भीड़ बताती है कि समाज के निचले हिस्से को इसकी कितनी दरकार है। 
 
अब इसकी नाकामियों की चर्चा करते हैं। इसने कई हजार बसों को दिल्ली की सड़कों पर उतारने का वादा किया था लेकिन बसों के बेड़े में कमी ही आई है। पुणे और अहमदाबाद में बीआरटी कॉरिडोर अच्छी तरह चल रहे हैं लेकिन दिल्ली ने उसे नकार दिया है। दिल्ली के लोगों को साफ हवा मुहैया करा पाने में भी यह सरकार नाकाम रही है। झुग्गियों और अनधिकृत बस्तियों के मामले में भी प्रगति काफी कम रही है। इस अधूरे रिकॉर्ड के बावजूद सवाल है कि क्या भाजपा और कांग्रेस उससे बेहतर काम करती?
Keyword: आम आदमी पार्टी , आप, दिल्ली सरकार,,
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