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सार्वजनिक चर्चा के लिए प्रस्तुत करें विशेषज्ञ समितियों की रिपोर्ट
दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  February 16, 2017

सरकार अक्सर प्रमुख नीतिगत मुद्दों की व्याख्या के लिए विशेषज्ञ समिति का गठन करती है। ये समितियां अपनी अनुशंसाएं संबंधित मंत्रालयों को भेजती हैं। इस मामले में मोदी सरकार भी अलग नहीं है। गत 32 महीनों में इसने इतनी ही समितियां गठित की हैं और इनमें से कई ने अपनी रिपोर्ट भी पेश की है। लेकिन एक अंतर है। सरकार इन समितियों के निष्कर्षों को जिस तरह बरत रही है वह पारदर्शी नहीं है। हालांकि इन रिपोर्ट के मामले में सरकार का विशेषाधिकार है लेकिन उसकी प्रतिक्रिया की अस्पष्टïता उसके प्रशासन की शैली की कमजोरी ही दिखाता है। उदाहरण के लिए पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रमण्यन की अध्यक्षता वाली शिक्षा समिति के निष्कर्ष को ही लें। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने इसका गठन देश की शिक्षा व्यवस्था की खामियां चिह्निïत करने के लिए किया था।

 
लेकिन गत मई में रिपोर्ट जमा होते ही विवाद उत्पन्न हो गया। पहले तो सरकार इसके निष्कर्ष जारी करने की इच्छुक ही नहीं नजर आ रही थी। बाद में  यह भी सुनने में आया कि सुब्रमण्यन ने खुद ही रिपोर्ट जारी करने की तैयारी कर ली है। आखिरकार शर्मिंदगी से बचने के लिए मंत्रालय ने प्रमुख निष्कर्ष घोषित किए। सुब्रमण्यन ने कहा कि केवल चुनिंदा अनुशंसाएं सार्वजनिक की गई हैं। 
 
मोदी सरकार को सुब्रमण्यन समिति की पूरी रिपोर्ट जारी नहीं करने से आखिर क्या फायदा हुआ? रिपोर्ट के कई हिस्से अब उपलब्ध हैं और उसमें की गई अनुशंसाओं पर मीडिया में व्यापक चर्चा भी हो रही है। यह अलग बात है कि सरकार अब एक नई समिति बनाना चाह रही है ताकि शिक्षा नीति में बदलाव पर अनुशंसाएं आमंत्रित की जा सकें। संभव है सरकार को सुब्रमण्यन समिति के विश्लेषण नई शिक्षा नीति में शामिल करने लायक न लगे हों और उसे दोबारा राय आमंत्रित करनी पड़ी हो। आखिरकार निर्वाचित सरकार के पास अलग-अलग विचारों को खंगालने का अधिकार तो है ही। ताकि वह समझबूझ कर अंतिम निर्णय ले सके। लेकिन किसी समिति की चुनिंदा अनुशंसाओं को सामने लाने के पीछे की दलील को समझ पाना या सराह पाना मुश्किल है। कोई भी सरकार अगर किसी विशेषज्ञ समिति की अनुशंसाओं की प्रतिपुष्टिï और उन पर टिप्पणी के लिए तैयार रहती है तो इससे उसकी वैधता या संप्रभुता को कोई खतरा नहीं पैदा होता। इसके विपरीत किसी रिपोर्ट को पूरी तरह सार्वजनिक न करने का निर्णय जरूर सरकार को विशेषज्ञों की राय और उस पर व्यापक अंशधारकों की टिप्पणियों से वंचित कर देता है। बड़ी चिंता का विषय यह है कि विशेषज्ञ समितियों अथवा उनकी अनुशंसाओं से पारदर्शी तरीके से नहीं निपटने का असर वित्त मंत्रालय पर भी पड़ता है जो अन्यथा नीतिगत मसलों पर खुली बहस की व्यवस्था रखता है। उदाहरण के लिए जरा इस बात पर विचार कीजिए कि कैसे वित्त मंत्रालय ने बजट के ऐन पहले तमाम आर्थिक नीति संबंधी विकल्पों की चर्चा सालाना दस्तावेज यानी आर्थिक समीक्षा के जरिये होने दी। 
 
वित्त मंत्रालय को भले ही बीते कुछ वर्षों की आर्थिक समीक्षा पर चर्चा से निकले नीतिगत विकल्पों के मामले में सफलता नहीं मिली हो लेकिन इसकी निर्णय क्षमता को अवश्य लाभ हुआ है क्योंकि आर्थिक समीक्षा में उठाए गए मुद्दों पर सरकार के भीतरी और बाहरी विशेषज्ञ बाकायदा चर्चा करते हैं। इसलिए यह बात थोड़ी समझ से परे है कि आखिर वित्त मंत्रालय कुछ अन्य विशेषज्ञ समिति रिपोर्ट से निपटते समय वही दिमागी खुलापन क्यों नहीं दिखा पाता? 
 
उदाहरण के लिए मोदी सरकार के पहले बजट में सरकारी व्यय में सुधार की प्रतिबद्घता जताई गई थी। घोषणा की गई थी कि इसके लिए व्यय प्रबंधन आयोग का गठन किया जाएगा। विचार यह था कि आयोग की अनुशंसाओं की मदद से कई बेकार होने वाले सरकारी व्यय कम किए जाएंगे। यह उद्देश्य सराहनीय था और वित्त मंत्रालय ने आरबीआई के पूर्व गवर्नर बिमल जालान के नेतृत्व में समिति गठित भी कर दी। आयोग ने वित्त मंत्रालय को दो रिपोर्ट सौंपकर अपना काम पूरा कर लिया। लेकिन मंत्रालय ने उनमें से किसी भी रिपोर्ट या उसके निष्कर्ष को सार्वजनिक नहीं किया है। 
 
वित्त मंत्रालय कह सकता है कि सरकार ने रिपोर्ट पर विचार किया और उनकी कुछ अनुशंसाओं को लागू भी किया। लेकिन रिपोर्ट को चर्चा के लिए जारी क्यों नहीं किया गया? लोगों को सरकारी व्यय की कमी के मसले पर आयोग का विचार जानने का अवसर क्यों नहीं दिया गया? अगर रिपोर्ट सार्वजनिक की जाती तो लोगों को यह आकलन करने का मौका मिलता कि सरकार अपने व्यय में कटौती को लेकर कितनी समझदारी दिखा रही है। आर्थिक समीक्षा में विचारों के प्रसार ने वित्त मंत्रालय को एक मुक्त समझ वाले संस्थान की छवि प्रदान की। ऐसे में व्यय प्रबंधन आयोग की रिपोर्ट जारी करने से भी कोई समस्या नहीं आनी चाहिए थी। 
 
यह प्रश्न दो अन्य विशेषज्ञ समिति रिपोर्टों के प्रकाश में अहम हो उठता है। ये रिपोर्ट पिछले कुछ माह में सम्मिलित की गईं और वित्त मंत्रालय का इनको सार्वजनिक करने का कोई इरादा नहीं दिखता। पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार शंकर आचार्य की अध्यक्षता वाली समिति ने इस बात पर रिपोर्ट पेश की कि क्या सरकार को वित्त वर्ष बदलने की आवश्यकता है? पूर्व राजस्व सचिव एन के सिंह की अध्यक्षता वाली एक अन्य समिति ने सरकार के राजकोषीय सुदृढ़ीकरण संबंधी मार्ग पर अपनी रिपोर्ट पेश की। इस दलील में कोई दम नहीं है कि इन रिपोर्ट को सार्वजनिक करने से सरकारी जानकारियों को गलत समझा जा सकता है और सरकार को इसके लिए जवाबदेह ठहराया जा सकता है। वित्त मंत्रालय अगर उनको शीघ्र सार्वजनिक करके उन पर एक स्वस्थ सार्वजनिक बहस आमंत्रित करे तो बेहतर होगा। बड़ा सवाल यह है कि इन रिपोर्ट को रोक कौन रहा है- वित्त मंत्रालय या फिर प्रधानमंत्री कार्यालय के आदेश पर ऐसा किया जा रहा है?
Keyword: narendra modi, cabinet, minister,,
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